बुलडोजर कार्रवाई पर अवमानना याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट भेजीं, अंतरिम राहत रहेगी बरकरार

सुप्रीम कोर्ट ने बिना कानूनी प्रक्रिया के घर और संपत्तियों को गिराने (बुलडोजर कार्रवाई) के खिलाफ दायर अवमानना याचिकाओं पर सीधे सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने इन मामलों से जुड़े सभी पक्षों को संबंधित राज्यों के हाईकोर्ट जाने का निर्देश दिया है, ताकि वहां तथ्यों से जुड़े जमीनी विवादों का निपटारा किया जा सके।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय बेंच ने इन सभी मामलों से जुड़े दस्तावेजों को संबंधित हाईकोर्ट्स को भेजने का फैसला किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संबंधित हाईकोर्ट जरूरत पड़ने पर जिला अदालतों की मदद से सबूत जुटाएं और इन मामलों की हकीकत का पता लगाएं।

अदालत ने यह स्पष्ट किया कि उसने फिलहाल मामलों के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पहले जो अंतरिम सुरक्षा प्रदान की थी, वह हाईकोर्ट में सुनवाई जारी रहने तक बरकरार रहेगी। बेंच ने सभी हाईकोर्ट्स से इन मामलों का निपटारा अधिमानतः चार महीने के भीतर करने का आग्रह किया है। इसके साथ ही, पक्षकारों को यह छूट दी गई है कि वे जरूरत पड़ने पर अंतरिम आदेश में बदलाव के लिए हाईकोर्ट में आवेदन कर सकते हैं।

सोमनाथ और महाराष्ट्र के मामलों में वकीलों की दलीलें

सुनवाई के दौरान सोमनाथ में मस्जिदों को गिराए जाने के मामले में याचिकाकर्ताओं के वकील हुज़ेफा अहमदी ने दलील दी कि विवादित जमीन पर कोई सरकारी अतिक्रमण नहीं था। उन्होंने स्थानीय प्रशासन पर सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देशों की खुलेआम अनदेखी करने का आरोप लगाया।

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इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि मुख्य विवाद इस बात को लेकर है कि क्या तय प्रक्रिया का पालन किया गया था या नहीं। प्रशासन का दावा है कि नियमों का पालन हुआ है, जबकि पीड़ित पक्ष इससे इनकार कर रहा है। ऐसे में वर्तमान स्थिति (यथास्थिति) बनाए रखने का आदेश देकर मामले को हाईकोर्ट भेजना ही सबसे उचित विकल्प है।

महाराष्ट्र के एक अन्य मामले में वरिष्ठ वकील सीयू सिंह ने आरोप लगाया कि कई जगहों पर स्थानीय नेताओं के बयानों के बाद बदले की भावना से बुलडोजर चला दिया जाता है। उन्होंने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट अपने ही फैसलों का सम्मान नहीं करा पाएगा, तो न्यायिक प्रक्रिया पर से लोगों का भरोसा उठ जाएगा।

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इस टिप्पणी पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि अदालत के किसी भी फैसले को किसी कठोर कानून की तरह नहीं पढ़ा जाना चाहिए, बल्कि ये निर्देश लोगों के वैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए होते हैं। उन्होंने कहा कि साल 2024 का फैसला अदालत की अंतरात्मा को ठेस पहुंचने और आरोपी को निर्दोष मानने के बुनियादी सिद्धांत के तहत लिया गया था।

जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि जब भ्रष्ट अधिकारियों और अवैध कब्जा करने वालों के गठजोड़ के कारण कानून का उल्लंघन हो रहा हो, तब बुलडोजर का इस्तेमाल जरूरी हो जाता है। लेकिन कानून लागू करने के नाम पर किसी खास व्यक्ति को निशाना बनाना पूरी तरह गलत है। उन्होंने कहा कि मुख्य सवाल यही है कि क्या अधिकारियों के पास तोड़फोड़ की वैध अनुमति थी और क्या उन्होंने तय कानूनी प्रक्रिया अपनाई थी।

बुलडोजर न्याय पर साल 2024 के कड़े दिशा-निर्देश

यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा 13 नवंबर 2024 को जारी की गई देशव्यापी गाइडलाइंस की अनदेखी से जुड़ा है। उस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ‘बुलडोजर न्याय’ की कड़ी आलोचना करते हुए साफ कहा था कि कार्यपालिका खुद जज की भूमिका में नहीं आ सकती। कोई भी अधिकारी किसी आरोपी को खुद दोषी घोषित कर उसका घर नहीं गिरा सकता।

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अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि किसी भी व्यक्ति का घर सिर्फ इसलिए गिराना पूरी तरह असंवैधानिक है क्योंकि वह किसी अपराध का आरोपी या दोषी है। इन दिशा-निर्देशों के तहत, बिना पूर्व कारण बताओ नोटिस (शो-कॉज नोटिस) जारी किए कोई भी तोड़फोड़ नहीं की जा सकती। यह नोटिस स्थानीय नगरपालिका नियमों के तहत तय समय सीमा या नोटिस मिलने के 15 दिनों के भीतर (दोनों में से जो भी अधिक हो) जवाब देने के लिए होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी अनिवार्य किया था कि तोड़फोड़ का आदेश जारी होने के बाद भी प्रभावित लोगों को उसके खिलाफ अपील करने का पूरा मौका मिलना चाहिए। यदि पीड़ित पक्ष अदालत नहीं भी जाना चाहता, तब भी उसे अपना सामान सुरक्षित स्थान पर ले जाने और वैकल्पिक व्यवस्था करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।

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