केरल के कन्नूर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने दिल्ली से घरेलू सामान भेजने वाले एक ग्राहक को उसका सामान डिलीवर न करने पर हरियाणा की एक पैकर्स एंड मूवर्स कंपनी पर कुल 58,450 रुपये का जुर्माना लगाया है। आयोग ने इंडिया शिफ्टिंग सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड को आदेश दिया है कि वह शिकायतकर्ता को उनके खोए हुए सामान की कीमत लौटाए और साथ ही मानसिक प्रताड़ना व कानूनी खर्च के लिए मुआवजा भी दे। आयोग ने यह फैसला कंपनी के उपस्थित न होने के बाद एकतरफा (एक्स-पार्टी) सुनवाई के आधार पर लिया है।
आयोग के अध्यक्ष रवि सुशा और सदस्य मौली कुट्टी मैथ्यू व सजीश के. पी. की पीठ ने 30 जून को यह आदेश जारी किया। इस आदेश के तहत, हरियाणा स्थित पैकर्स कंपनी को शिकायतकर्ता नितिन टी. ए. को उनके खोए हुए सामान के बदले 38,450 रुपये वापस करने होंगे। इस सामान में 32,000 रुपये की एक साइकिल और 6,450 रुपये के बिजली के अन्य उपकरण शामिल हैं। इसके अलावा, आयोग ने सेवा में कमी के लिए 15,000 रुपये का मुआवजा और अदालती खर्च के रूप में 5,000 रुपये का भुगतान करने को कहा है। इन सभी भुगतानों को एक महीने के भीतर पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं।
मनमाने चार्ज और झूठे वादे से शुरू हुआ विवाद
यह मामला तब शुरू हुआ जब नितिन ने दिल्ली से केरल के कन्नूर तक अपना खुद का पैक किया हुआ सामान भेजने के लिए इंडिया शिफ्टिंग सॉल्यूशंस को काम सौंपा। इस सामान में उनकी एक साइकिल, मिक्सर ग्राइंडर, वैक्यूम क्लीनर और कुछ अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान शामिल थे।
शिकायत के अनुसार, कंपनी ने शुरुआत में इस काम के लिए टैक्स और बीमा को छोड़कर 2,700 रुपये का एस्टीमेट दिया था। हालांकि, दो दिन बाद कंपनी ने अचानक नितिन को 6,900 रुपये का भारी-भरकम बिल भेज दिया। बातचीत के बाद, दोनों पक्षों के बीच 5,300 रुपये का किराया तय हुआ, जिसे नितिन ने जीपे (GPay) के जरिए ट्रांसफर कर दिया। कंपनी ने नितिन को भरोसा दिया था कि उनका सामान चार दिनों के भीतर पहुंच जाएगा, लेकिन भुगतान मिलने के बाद सामान कभी डिलीवर नहीं किया गया। जब नितिन ने कंपनी से संपर्क करने की कोशिश की, तो उन्होंने नितिन का फोन उठाना भी बंद कर दिया, जिसके बाद पीड़ित ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
कंपनी के गैर-हाजिर रहने पर एकतरफा फैसला
मामले की सुनवाई के दौरान उपभोक्ता आयोग ने पाया कि कंपनी को दो बार नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन उसने आयोग के सामने पेश होने या अपनी सफाई देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। इस वजह से आयोग ने मामले की एकतरफा सुनवाई करने का निर्णय लिया।
पीठ ने शिकायतकर्ता के हलफनामे, पेमेंट रसीद, इनवॉइस और कोटेशन जैसे सभी दस्तावेजों की जांच की। आयोग ने कहा कि चूंकि कंपनी ने अदालत में हाजिर होकर आरोपों का विरोध नहीं किया, इसलिए शिकायतकर्ता के आरोप पूरी तरह सच साबित होते हैं। सबूतों के आधार पर आयोग ने माना कि कंपनी की सेवा में गंभीर कमी थी, और इसी वजह से शिकायतकर्ता को पूरी राहत पाने का हकदार माना गया।

