देश की अदालतों को यौन अपराधों से पीड़ित लोगों के प्रति अधिक संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA) द्वारा तैयार की गई विस्तृत गाइडलाइंस को देश भर में प्रसारित और लागू करने का निर्देश दिया।
प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्या कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने निर्देश दिया कि इस रिपोर्ट को देश के सभी हाईकोर्ट, जिला अदालतों, राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरणों (SLSA), राज्य कानून विभागों और अभियोजन निदेशालयों को भेजा जाए।
पुलिस और अभियोजन प्रणाली में सुधार
शीर्ष अदालत ने अभियोजन निदेशालयों को विशेष रूप से निर्देश दिया कि वे सुनिश्चित करें कि ये दिशानिर्देश सभी संबंधित विभागों तक पहुंचे। इसके साथ ही, पुलिस कर्मियों को यौन अपराध के मामलों में एफआईआर (FIR) दर्ज करने और चार्जशीट दाखिल करने के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों के प्रति संवेदनशील बनाने की बात कही गई।
चीफ जस्टिस सूर्या कांत ने भोपाल स्थित नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति के काम की सराहना की। उन्होंने इस रिपोर्ट को एक शानदार प्रयास बताया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद शुरू हुई थी प्रक्रिया
यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा साल 2025 में स्वतः संज्ञान लिए जाने के बाद शुरू हुआ था। दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले की देश भर में तीखी आलोचना हुई थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि एक नाबालिग लड़की के स्तनों को पकड़ना और उसके सलवार की नाड़ी खोलने की कोशिश करना केवल बलात्कार की “तैयारी” माना जाएगा, न कि “बलात्कार का प्रयास”।
बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन’ ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट का वह फैसला पूरी तरह गलत और स्थापित आपराधिक न्यायशास्त्र के सिद्धांतों के खिलाफ था। इसके बाद शीर्ष अदालत ने आरोपी के खिलाफ पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत बलात्कार के प्रयास का आरोप बहाल कर दिया था।
अदालती भाषा को संवेदनशील बनाने की पहल
इसके अलावा, पिछले साल 26 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों, खासकर महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों में अदालती आदेशों के भीतर इस्तेमाल होने वाली असंवेदनशील भाषा पर स्वतः संज्ञान लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी को अदालती संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए तीन महीने के भीतर एक व्यापक दिशा-निर्देश रिपोर्ट तैयार करने को कहा था।
संस्था की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील एच. एस. फूलका ने कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि ऐसे दिशा-निर्देशों की लंबे समय से आवश्यकता थी और इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणियों के बाद तो यह बेहद जरूरी हो गए थे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यौन शोषण और हिंसा झेलने वाली महिलाओं और बच्चों को गरिमा के साथ न्याय दिलाने के लिए इन गाइडलाइंस को पूरी तरह लागू किया जाना चाहिए।

