आयातित चीनी पर सेल्स टैक्स में पूर्वव्यापी संशोधन वैध, लेकिन राज्य पिछले समय के लिए जुर्माना या ब्याज नहीं लगा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि राज्य विधायिका के पास सेल्स टैक्स छूट को पूर्वव्यापी (रिट्रोस्पेक्टिव) प्रभाव से वापस लेने या सीमित करने की संवैधानिक शक्ति है, लेकिन वह उन पुराने लेन-देन पर जुर्माना और ब्याज जैसी दंडात्मक कार्रवाई नहीं कर सकती जहां डीलरों ने उस समय के कानून के अनुसार काम किया था। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने कर्नाटक सेल्स टैक्स एक्ट, 1957 के तहत ‘चीनी’ पर सेल्स टैक्स छूट को पूर्वव्यापी रूप से सीमित करने से जुड़ी अपीलों पर यह संतुलित निर्णय दिया। कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट की डिविजन बेंच के फैसले में संशोधन करते हुए राज्य को पुनर्मूल्यांकन (री-असेसमेंट) से केवल मूल टैक्स राशि वसूलने की अनुमति दी, जबकि करदाताओं को संशोधन-पूर्व की अवधि के लिए जुर्माने और ब्याज से पूरी तरह बचा लिया।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह विवाद कर्नाटक सेल्स टैक्स एक्ट, 1957 (KST एक्ट) के तहत शुरू हुआ था। एक्ट की धारा 8 पांचवीं अनुसूची में निर्दिष्ट वस्तुओं पर सेल्स टैक्स से छूट देती थी। ऐतिहासिक रूप से, इस छूट प्रविष्टि (पहले प्रविष्टि 31-बी, बाद में प्रविष्टि 51) में सामान्य रूप से “चीनी” को टैक्स-मुक्त रखा गया था। वर्ष 1986 और 1992 में हुए संशोधनों के माध्यम से चीनी की परिभाषा को और स्पष्ट किया गया और इसे एडिशनल ड्यूटीज ऑफ एक्साइज (गुड्स ऑफ स्पेशल इम्पोर्टेंस) एक्ट, 1957 की पहली अनुसूची के विवरण से जोड़ा गया, लेकिन इसमें देश या मूल स्थान से जुड़ी कोई सीमा नहीं थी।

इस छूट के आधार पर एशिया शुगर एंड केमिकल कंपनी और मेसर्स इंडियन शुगर एंड जनरल एक्सपोर्ट इम्पोर्ट कॉर्पोरेशन लिमिटेड जैसे डीलरों ने विदेशों से चीनी का आयात किया और इसे कर्नाटक या अंतर-राज्यीय व्यापार के तहत बेचा। यह मानते हुए कि आयातित चीनी पर छूट लागू है, उन्होंने खरीदारों से सेल्स टैक्स नहीं वसूला। टैक्स विभाग ने भी शुरुआत में इसे स्वीकार कर लिया और सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ केरल एंड अनदर बनाम स्टेट ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (1999) मामले के फैसले के आधार पर छूट देते हुए असेसमेंट पूरा कर दिया।

लेकिन, कर्नाटक विधायिका ने कर्नाटक अधिनियम संख्या 5 ऑफ 2001 पारित किया। इसके तहत एक पूर्वव्यापी क्लॉज के जरिए चीनी शब्द के बाद “भारत में उत्पादित या निर्मित” शब्द जोड़ दिए गए। इस संशोधन ने पिछले वर्षों के लिए आयातित चीनी को टैक्स छूट से बाहर कर दिया। इसके बाद टैक्स विभाग ने अपीलों के खिलाफ री-असेसमेंट की कार्यवाही शुरू कर दी और 1990 के दशक के मध्य के लेन-देन के लिए भारी टैक्स, ब्याज और जुर्माना की मांग की।

करदाताओं ने इस पूर्वव्यापी संशोधन को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी। सिंगल जज ने पूर्वव्यापी प्रभाव को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लंघन मानते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट का तर्क था कि यह उन डीलरों पर अप्रत्याशित और अनुचित वित्तीय बोझ डालता है जिन्होंने खरीदारों से टैक्स नहीं वसूला था। राज्य की अपील पर हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने इस फैसले को पलट दिया और संशोधन को पूरी तरह से वैध ठहराते हुए री-असेसमेंट कार्यवाही बहाल कर दी।

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दोनों पक्षों की दलीलें

करदाताओं की ओर से: करदाताओं के वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि 2001 से पहले की छूट प्रविष्टि में सामान्य रूप से “चीनी” शामिल थी। एडिशनल ड्यूटीज ऑफ एक्साइज एक्ट का संदर्भ केवल वस्तु की पहचान के लिए था, न कि भौगोलिक सीमाएं लागू करने के लिए। उन्होंने कहा कि विभाग ने खुद मूल असेसमेंट में छूट दी थी। हालांकि टैक्स से जुड़े पूर्वव्यापी कानून वैध होते हैं, लेकिन पूरे हो चुके लेन-देन पर टैक्स लगाना, जहां डीलर ने टैक्स नहीं वसूला, एक अप्रत्यक्ष टैक्स को अत्यधिक दमनकारी प्रत्यक्ष बोझ में बदल देता है, जो संवैधानिक निष्पक्षता के खिलाफ है। इसके अलावा, उन्होंने सेंट्रल सेल्स टैक्स एक्ट, 1956 की धारा 8(2) की अनदेखी कर अंतर-राज्यीय बिक्री पर 10 प्रतिशत की दर से टैक्स लगाने पर भी आपत्ति जताई।

कर्नाटक राज्य की ओर से: राज्य के वकील ने दलील दी कि विधायिका के पास छूट को पूर्वव्यापी रूप से वापस लेने की शक्ति है और किसी भी डीलर को टैक्स रियायत का स्थायी अधिकार नहीं है। राज्य ने तर्क दिया कि चीनी पर छूट का उद्देश्य हमेशा एडिशनल एक्साइज ड्यूटी व्यवस्था से मेल खाना था, जो केवल घरेलू चीनी पर लागू होती है। एक बार जब पूर्वव्यापी कानूनी कल्पना (लीगल फिक्शन) बना दी जाती है, तो अदालतों को इसे पूरा प्रभाव देना चाहिए। करदाता की कठिनाई किसी टैक्स कानून को रद्द करने का आधार नहीं हो सकती।

कोर्ट का विश्लेषण और तर्क

सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद की तीन मुख्य बिंदुओं पर जांच की:

1. 2001 से पहले छूट की प्रविष्टि का दायरा कोर्ट ने सबसे पहले यह देखा कि क्या 2001 के संशोधन से पहले आयातित चीनी छूट के दायरे में थी। करदाताओं की दलील से सहमत होते हुए कोर्ट ने माना कि किसी अन्य अधिनियम से परिभाषा लेने का मतलब उसके भौगोलिक प्रतिबंधों को अपनाना नहीं है। स्टेट ऑफ केरल एंड अनदर बनाम स्टेट ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (1999) के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

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“शब्द ‘जैसा कि वर्णित है’ महत्वपूर्ण है। यह वस्तु की पहचान करता है। यह बिना किसी अतिरिक्त प्रावधान के, उत्पत्ति के आधार पर कोई सीमा लागू नहीं करता है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि विधायिका चीनी की छूट को घरेलू उत्पाद तक ही सीमित रखना चाहती तो वह पहले ही ऐसा स्पष्ट लिख सकती थी, जैसा उसने अंततः 2001 में किया। इसलिए 2001 के संशोधन से पहले आयातित चीनी वास्तव में टैक्स-मुक्त थी।

2. कर्नाटक अधिनियम संख्या 5 ऑफ 2001 की वैधता विधायिका की शक्ति के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने इस संशोधन की वैधता को बरकरार रखा। कासिंका ट्रेडिंग बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1995) और श्रीजी सेल्स कॉर्पोरेशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1997) का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि टैक्स छूट वित्तीय नीति का मामला है जिसे बदला या वापस लिया जा सकता है। इसके अलावा, राय रामकृष्ण बनाम स्टेट ऑफ बिहार (1963) और श्री पृथ्वी कॉटन मिल्स लिमिटेड बनाम ब्रोच बरो म्युनिसिपैलिटी (1969) का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने निर्णय दिया कि पूर्वव्यापी टैक्स कानून बनाना विधायिका के अधिकार क्षेत्र में है और यह असंवैधानिक नहीं है।

3. पूर्वव्यापी टैक्स वसूली की लागू करने योग्यता संशोधन को वैध मानते हुए भी कोर्ट ने इसे सामान्य वैलिडेशन एक्ट से अलग बताया। चूंकि छूट वैध रूप से उपलब्ध थी और इस पर अमल किया गया था, इसलिए अचानक पूर्वव्यापी रूप से इसे वापस लेने से डीलरों के पास पिछले खरीदारों से टैक्स वसूलने का कोई विकल्प नहीं बचा।

पूर्वव्यापी जुर्माने की निष्पक्षता का मूल्यांकन करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“जुर्माना लगाने के लिए दोष, डिफ़ॉल्ट, जानबूझकर किया गया उल्लंघन या कम से कम मौजूदा दायित्व का पालन करने में विफलता का होना आवश्यक है।”

पीठ ने आगे कहा:

“ऐसे डीलर पर जुर्माना लगाना बुनियादी निष्पक्षता के खिलाफ होगा जिसने खरीदारों से टैक्स इसलिए नहीं वसूला क्योंकि कानून, अदालती समझ और खुद विभाग के असेसमेंट में उस वस्तु को टैक्स-मुक्त माना गया था।”

ब्याज के संबंध में कोर्ट ने माना कि ब्याज आमतौर पर क्षतिपूर्ति के रूप में होता है। लेकिन मूल लेन-देन की तारीख से ब्याज वसूल करना, जबकि देनदारी ही पूर्वव्यापी रूप से बाद में तय की गई हो, दंडात्मक हो जाएगा। संतुलन बनाते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“इसलिए, उचित संतुलन यह है कि संशोधन की वैधता को बरकरार रखा जाए और मूल टैक्स देनदारी की गणना की अनुमति दी जाए, लेकिन पूर्वव्यापी प्रभाव को दंडात्मक रूप लेने से रोका जाए।”

सेंट्रल सेल्स टैक्स (CST) पहलू: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य के कानून में पूर्वव्यापी संशोधन का मतलब सेंट्रल सेल्स टैक्स एक्ट, 1956 के नियमों का उल्लंघन करना नहीं है। अंतर-राज्यीय बिक्री पर लगने वाला कोई भी टैक्स सीएसटी एक्ट की धारा 8(2) के तहत तय दर और शर्तों के अनुसार ही होना चाहिए।

कोर्ट का अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की डिविजन बेंच के फैसले में संशोधन करते हुए अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार किया और निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. री-असेसमेंट की कार्यवाही जारी रह सकती है, लेकिन यह केवल कानून के अनुसार मूल टैक्स देनदारी तय करने के लिए होगी।
  2. कर्नाटक अधिनियम संख्या 5 ऑफ 2001 से पहले के लेन-देन के लिए करदाताओं पर कोई जुर्माना नहीं लगाया जाएगा और न ही वसूला जाएगा।
  3. ब्याज, यदि कानून के तहत लागू होता है, तो वह केवल इस फैसले के बाद री-असेसमेंट के आधार पर जारी की गई वैध मांग की तारीख से लागू होगा, न कि मूल लेन-देन या पुराने असेसमेंट की अवधि से।
  4. असेसिंग अथॉरिटी को अंतर-राज्यीय सेल्स टैक्स की गणना सेंट्रल सेल्स टैक्स एक्ट, 1956 की धारा 8(2) के तहत कड़ाई से करनी होगी।
  5. जुर्माना या ब्याज के रूप में वसूली गई कोई भी अतिरिक्त राशि मूल टैक्स देनदारी में समायोजित (एडजस्ट) की जाएगी, और यदि कोई देनदारी बाकी नहीं है, तो वह राशि करदाता को वापस (रिफंड) की जाएगी।
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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: एशिया शुगर एंड केमिकल कंपनी, दावणगेरे बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य (संबद्ध अपील के साथ)
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 48 ऑफ 2009 (एसएलपी (सी) संख्या 25469 ऑफ 2009 से उत्पन्न सिविल अपील के साथ)
पीठ: जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
निर्णय की तिथि: 13 जुलाई, 2026

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