बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने पुलिस द्वारा एक महिला के बेडरूम में जबरन घुसने और बिना कानूनी प्रक्रिया के उसका मोबाइल फोन जब्त करने को निजता के अधिकार का गंभीर उल्लंघन माना है। हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को आदेश दिया है कि वह पीड़ित महिला को दो महीने के भीतर 10,000 रुपये का मुआवजा दे। अदालत ने यह भी साफ किया है कि राज्य सरकार चाहे तो इस जुर्माने की राशि को सीधे उस दोषी पुलिस अधिकारी से वसूल सकती है जो इस पूरी कार्रवाई के लिए जिम्मेदार था।
जस्टिस उर्मिला जोशी फालके और जस्टिस निवेदिता मेहता की पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाला सम्मान और निजता का अधिकार, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का ही एक अटूट हिस्सा है। अदालत का यह आदेश पिछले हफ्ते पारित हुआ था, जिसकी प्रति सोमवार को उपलब्ध कराई गई। हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि किसी भी नागरिक के घर में, और विशेष रूप से किसी महिला के बेडरूम में बिना कानूनी सुरक्षा उपायों का पालन किए दाखिल होना और उसका फोन जबरन छीन लेना, उसकी निजता और गरिमा का गंभीर हनन है।
जांच के नाम पर अवैध कार्रवाई को मंजूरी नहीं
अदालत ने पुलिस विभाग की उस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि यह तलाशी एक आपराधिक मामले की जांच के सिलसिले में की गई थी। पीठ ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसियों से हमेशा कानून के दायरे में रहकर काम करने की उम्मीद की जाती है। किसी भी जांच का उद्देश्य पुलिस को मनमानी करने की छूट नहीं देता और न ही इससे कोई अवैध तलाशी या जब्ती कानूनी रूप से सही साबित हो जाती है।
हाईकोर्ट ने माना कि केवल आर्थिक मुआवजे से किसी महिला की गरिमा और निजता को लगी ठेस की पूरी भरपाई नहीं की जा सकती। हालांकि, यह भुगतान पीड़िता को कुछ हद तक राहत जरूर देगा। इसके साथ ही यह आदेश पुलिस तंत्र के लिए एक सबक की तरह काम करेगा कि वे अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कानून के तहत ही करें, मनमाने ढंग से नहीं।
बिना नोटिस और नियमों की अनदेखी कर उत्पीड़न का आरोप
यह पूरा मामला नागपुर जिले के सावनेर की रहने वाली एक 26 वर्षीय महिला की याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का आरोप था कि पुलिस ने एक दुर्घटना मामले की जांच का बहाना बनाकर उनके घर और बेडरूम में जबरन प्रवेश किया और कानूनी प्रक्रिया पूरी किए बिना उनका मोबाइल फोन जब्त कर लिया।
पुलिस का दावा था कि वे कार हादसे के सिलसिले में पूछताछ करने महिला के घर गए थे। इसके विपरीत, पीड़ित महिला ने बताया कि इस हादसे से जुड़े मामले में न तो वह और न ही उनके पति आरोपी के तौर पर नामजद थे।
महिला ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारियों ने बिना कोई कानूनी नोटिस जारी किए बार-बार उनके घर आकर उन्हें परेशान किया। इसके अलावा, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत तय नियमों का पालन किए बिना उनके मोबाइल फोन को दो दिनों तक अवैध रूप से अपने पास रखा। मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि पुलिस ने कानूनी प्रक्रियाओं का स्पष्ट उल्लंघन किया है, जिसके कारण यह तलाशी और फोन की जब्ती पूरी तरह से गैरकानूनी थी।

