छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने निर्णय दिया है कि अत्यधिक संवेदनशील और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में केवल इस आधार पर अभियोजन के मामले को खारिज नहीं किया जा सकता कि स्वतंत्र गवाह मुकर गए हैं, बशर्ते सरकारी पुलिस गवाहों के बयान सुसंगत, भरोसेमंद और विश्वसनीय हों। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सुकमा जिले में सक्रिय नक्सलियों को विस्फोटक पहुंचाने के आरोप में विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908 और गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (यूएपीए) के तहत तीन लोगों को मिली सजा को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने आरोपियों की अपीलों को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के सात साल तक के कठोर कारावास के फैसले की पुष्टि की।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 8 मार्च 2023 का है, जब पुलिस इंस्पेक्टर शिवानंद सिंह को गुप्त सूचना मिली थी कि आरोपी सेमल दीपक अपने दो साथियों के साथ बेलपोच्चा जंगल के रास्ते प्रतिबंधित नक्सली संगठन के कमांडर वेट्ठी भीमा को विस्फोटक सामग्री पहुंचाने जा रहा है। सूचना दर्ज करने के बाद, एसडीओपी रोहित शुक्ला के नेतृत्व में पुलिस टीम सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत रवाना हुई। रास्ते में उन्होंने एम. मल्लिका अर्जुन और माड़वी नितिन को स्वतंत्र गवाह बनने का अनुरोध किया।
बेलपोच्चा जंगल के पास मोटरसाइकिल पर जा रहे तीन लोगों ने पुलिस को देखकर भागने की कोशिश की, जिन्हें पुलिस ने घेरकर पकड़ लिया। पूछताछ में उन्होंने अपना नाम सेमल दीपक, नारा भास्कर और तेलम मुट्टा बताया। उनकी तलाशी लेने पर बैग से भारी मात्रा में विस्फोटक बरामद हुए। सेमल दीपक के पास से 20 बैटरियां, 45 इलेक्ट्रॉनिक डेटोनेटर, एक मोबाइल फोन और नक्सली बैनर मिला। नारा भास्कर से 33 जिलेटिन रॉड, बिजली के तार और मोबाइल फोन मिला, जबकि तेलम मुट्टा के पास से 49 फीट कोर्डेक्स वायर और 10 जिलेटिन रॉड बरामद हुईं।
क्षेत्र के अत्यधिक संवेदनशील और नक्सल प्रभावित होने के कारण, पुलिस सुरक्षा के लिहाज से तीनों आरोपियों और जब्त सामग्री को पास के मुरलीगुड़ा सीआरपीएफ कैंप ले गई, जहां जब्ती पत्रक तैयार किए गए। इसके बाद कोंटा थाने में एफआईआर दर्ज की गई। जगदलपुर की विशेष एनआईए अदालत ने बाद में इन तीनों को दोषी ठहराया, जबकि एक अन्य संदिग्ध पापी पुट्टी रेड्डी को बरी कर दिया था।
पक्षों की दलीलें
अपनी दोषसिद्धि के खिलाफ अपील करते हुए आरोपियों के वकीलों ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष मामले को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। उन्होंने कहा कि बरामदगी खुली जगह से फर्जी तरीके से दिखाई गई है, कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया और मुख्य स्वतंत्र गवाह मुकर गए। उन्होंने बचाव पक्ष के गवाह पूर्णचंद नायडू की गवाही का भी हवाला दिया, जिसने दावा किया था कि आरोपी सड़क निर्माण ठेकेदार थे और उन्हें पुलिस ने जंगल से नहीं बल्कि सीधे कार्यस्थल से उठाया था।
वहीं, भारत संघ के वकील ने दलील दी कि अभियोजन का मामला पूरी तरह स्थापित है। उन्होंने तर्क दिया कि समय को लेकर मामूली विरोधाभासों से पुलिस गवाहों की विश्वसनीयता पर कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने स्पष्ट किया कि आरोपियों को घने जंगल में भारी मात्रा में खतरनाक विस्फोटकों के साथ पकड़ा गया था, जिसके लिए उनके पास कोई कानूनी दस्तावेज या वैध स्पष्टीकरण नहीं था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने सभी साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद बचाव पक्ष के तर्कों को खारिज कर दिया। स्वतंत्र गवाहों के मुकर जाने के संबंध में बेंच ने स्पष्ट किया कि यद्यपि कुछ स्वतंत्र गवाह अभियोजन के पक्ष में नहीं रहे, लेकिन एक स्वतंत्र गवाह, माड़वी नितिन ने पुलिस की कार्रवाई और बरामदगी का पूरी तरह समर्थन किया।
न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि पुलिस अधिकारियों की गवाही को केवल उनके पेशेवर पद के कारण खारिज नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के नाथूसिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1974) मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि “केवल इस तथ्य के आधार पर कि वे पुलिस अधिकारी हैं, उनके साक्ष्य को खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं था। अपीलकर्ता के प्रति उनकी शत्रुता का कोई कारण नहीं दिखाया गया था।”
बेंच ने अनिल बनाम महाराष्ट्र राज्य (1996) मामले पर भी भरोसा किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था:
“हालांकि, ऐसा कोई कानूनी नियम नहीं है कि पुलिस अधिकारियों के साक्ष्य को खारिज कर दिया जाना चाहिए या उसमें कोई अंतर्निहित कमजोरी होती है। हालांकि, समझदारी यह मांग करती है कि पुलिस अधिकारियों के साक्ष्यों की, जो मामले के परिणाम में रुचि रखते हैं, सावधानीपूर्वक जांच की जानी चाहिए और स्वतंत्र रूप से उनका मूल्यांकन किया जाना चाहिए। पुलिस अधिकारियों को गवाही देने से रोकने वाली कोई अयोग्यता नहीं होती है और केवल उनका पुलिस अधिकारी होना ही उनकी विश्वसनीयता पर संदेह करने का कोई कारण नहीं बनता है।”
सरकारी कार्रवाई की विश्वसनीयता पर सुप्रीम कोर्ट के स्टेट (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार) बनाम सुनील (2001) फैसले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि कानून में ऐसी कोई धारणा नहीं है कि पुलिस अधिकारी अविश्वसनीय गवाह होते हैं। सुदूर और अशांत क्षेत्रों में जनता से गवाह जुटाने की व्यावहारिक कठिनाइयों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने अजमेर सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2010) के फैसले को उद्धृत किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने माना था:
“…..आमतौर पर यह उम्मीद की जाती है कि अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन करने के लिए स्वतंत्र साक्ष्य होने चाहिए। हालांकि, यह कोई ऐसा नियम नहीं है जिसका उल्लंघन न किया जा सके। इसलिए, इस मामले की अनूठी परिस्थितियों में, हम संतुष्ट हैं कि यदि अपीलकर्ता को केवल इसलिए बरी कर दिया जाता है क्योंकि कोई स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किया गया है, तो यह न्याय का मखौल होगा।”
सुप्रीम कोर्ट ने अजमेर सिंह मामले में आगे यह भी टिप्पणी की थी:
“हम यह नहीं भूल सकते कि हर जगह और हर समय स्वतंत्र गवाह मिलना संभव नहीं हो सकता है। सार्वजनिक गवाहों को साथ लेने का दायित्व पूर्ण नहीं है। यदि मामले की परिस्थितियों में अदालत द्वारा उचित समझे गए प्रयासों को करने के बाद भी पुलिस अधिकारी छापेमारी या अपराधी की गिरफ्तारी में सार्वजनिक गवाहों को शामिल करने में असमर्थ रहता है, तो की गई गिरफ्तारी और बरामदगी आवश्यक रूप से अमान्य नहीं होगी। अदालत को प्रासंगिक साक्ष्यों का मूल्यांकन करना होगा और उनके साक्ष्यों के मूल्यांकन में उचित देखभाल और सावधानी बरतने के बाद यह तय करना होगा कि पुलिस अधिकारी की गवाही विश्वसनीय थी या नहीं।”
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस अधिकारियों और एसडीओपी की गवाही पूरी तरह सुसंगत, स्वाभाविक और विश्वसनीय थी, और उन्हें झूठा फंसाने का कोई मकसद सामने नहीं आया। चीफ जस्टिस Ramesh Sinha ने कहा कि संवेदनशील इलाका होने के कारण कानूनी कागजी कार्रवाई को सुरक्षित सीआरपीएफ कैंप में स्थानांतरित करना पूरी तरह उचित और सुरक्षित कदम था।
न्यायालय ने एक संरक्षित गवाह (पूर्व नक्सली कमांडर) के बयान पर भी ध्यान दिया, जिसने सेमल दीपक की पहचान प्रतिबंधित संगठन को नियमित रूप से विस्फोटक सप्लाई करने वाले के रूप में की थी और नारा भास्कर व तेलम मुट्टा को उसका सहयोगी बताया था। इसके विपरीत, कोर्ट ने बचाव पक्ष के गवाह पूर्णचंद नायडू की गवाही को खारिज कर दिया, क्योंकि वह कथित सड़क निर्माण साझेदारी का कोई दस्तावेजी सबूत पेश नहीं कर सका और उसका पुराना आपराधिक रिकॉर्ड भी था।
न्यायालय का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष ने प्रत्येक आरोपी के पास से विस्फोटक सामग्री की सचेत उपस्थिति और प्रतिबंधित संगठन की गतिविधियों में उनकी सक्रिय भागीदारी को सफलतापूर्वक साबित कर दिया है। ट्रायल कोर्ट के फैसले में किसी भी तरह की अवैधता या साक्ष्यों के गलत मूल्यांकन की कमी पाते हुए, हाईकोर्ट ने दोनों क्रिमिनल अपीलों को खारिज कर दिया और आरोपियों की दोषसिद्धि व सजा की पुष्टि की।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सेमल दीपक बनाम भारत संघ एवं नारा भास्कर और अन्य बनाम भारत संघ
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2140/2025 एवं क्रिमिनल अपील संख्या 1010/2026
पीठ: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल
निर्णय की तिथि: 30/06/2026

