कलकत्ता हाईकोर्ट से ममता बनर्जी गुट को बड़ी राहत, सशर्त बैंक खाते संचालित करने की मिली अनुमति

कलकत्ता हाईकोर्ट ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को एक बड़ी अंतरिम राहत दी है। कोर्ट ने पार्टी को अपने तीन मुख्य बैंक खातों से दैनिक प्रशासनिक और कानूनी खर्चों के भुगतान के लिए आंशिक रूप से लेन-देन करने की अनुमति दे दी है। एचडीएफसी बैंक के इन खातों को बिधाननगर पुलिस ने एक बागी गुट की शिकायत के बाद फ्रीज कर दिया था, जिनमें कथित रूप से करीब 440 करोड़ रुपये का फंड जमा है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस सौगत भट्टाचार्य ने स्पष्ट किया कि इस अंतरिम व्यवस्था से किसी भी गुट का ‘असली टीएमसी’ होने का दावा मजबूत नहीं होता। अदालत ने वित्तीय लेन-देन की निष्पक्ष निगरानी के लिए हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज जस्टिस सुब्रत तालुकदार को विशेष अधिकारी नियुक्त किया है। यह निगरानी व्यवस्था 30 सितंबर तक लागू रहेगी। नई व्यवस्था के तहत, ममता बनर्जी गुट के कोई भी दो अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता दैनिक और जरूरी खर्चों के चेक जस्टिस तालुकदार के सामने पेश करेंगे। उनके सत्यापन और हस्ताक्षर के बाद ही बैंक भुगतान की प्रक्रिया पूरी करेगा।

दैनिक कामकाज ठप होने की दलील

ममता गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में दलील दी कि बैंक खाते पूरी तरह बंद होने से पार्टी का बुनियादी कामकाज ठप हो गया था और रोजमर्रा के बिलों का भुगतान भी नहीं हो पा रहा था। पार्टी द्वारा दाखिल एक पूरक हलफनामे के अनुसार, इस रोक की वजह से 215 डेस्क कर्मचारियों के 51 लाख रुपये के वेतन, सुरक्षाकर्मियों के करीब 5 लाख रुपये के बकाये और कार्यालय के फर्नीचर व स्थानीय परिवहन जैसे जरूरी वेंडर खर्चों का भुगतान रुक गया था। इसके साथ ही कानूनी और परिचालन से जुड़े 1.07 करोड़ रुपये से अधिक के बकाये का भी भुगतान नहीं हो पा रहा था।

सिंघवी ने अदालत के सामने सवाल उठाया कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई सहित कुल आठ खाते फ्रीज किए जा चुके हैं, ऐसे में कोई राजनीतिक दल कैसे काम कर सकता है। उन्होंने यह भी पूछा कि जब मामला पहले से ही भारत निर्वाचन आयोग के पास लंबित है, तो पुलिस यह कैसे तय कर सकती है कि असली पार्टी कौन सी है।

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कोर्ट ने पुलिस की जल्दबाजी पर उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान जस्टिस भट्टाचार्य ने पश्चिम बंगाल पुलिस की कार्यशैली पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने बिधाननगर पुलिस की साइबर क्राइम यूनिट द्वारा दिखाई गई असाधारण तेजी पर सवाल उठाए। कोर्ट ने नोट किया कि बागी गुट द्वारा 18 जून को शाम 6 बजे एफआईआर दर्ज कराई गई और अगले ही दिन 19 जून को तीनों खातों से लेन-देन पर पूरी तरह रोक लगा दी गई।

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कोर्ट ने कहा कि जब कोई आम नागरिक अपनी शिकायत लेकर जाता है तो पुलिस शायद ही इतनी मुस्तैदी दिखाती है। पहली नजर में यह कार्रवाई बैंक खातों को फ्रीज करने का एक अनुचित प्रयास नजर आती है, जिसके लिए कोई पर्याप्त आधार नहीं दिखता।

बागी गुट को फटकार और सुनवाई की शर्तें

हाईकोर्ट ने खुद को ‘असली टीएमसी’ बताने वाले बागी गुट के वकीलों को भी कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि शिकायतकर्ता मौजूदा विधायक हैं जिन्होंने 4 मई के बाद पाला बदलने से पहले ममता बनर्जी के नेतृत्व में ही चुनाव जीता था। अदालत ने टिप्पणी की कि इस स्तर पर बागी गुट का आचरण भरोसा पैदा नहीं करता। 4 मई से पहले यह मुद्दा क्यों नहीं उठाया गया? कोर्ट ने इसे सरासर अवसरवादिता करार देते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि बैंक खातों को फ्रीज करवाने की आड़ में खुद को मूल टीएमसी साबित करने की कोशिश की जा रही है।

दूसरी तरफ, राज्य सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बैंक खातों को चालू करने का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि पुलिस की यह कार्रवाई सार्वजनिक धन की सुरक्षा के लिए जरूरी थी, जिसे अदालत ने स्वीकार नहीं किया।

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निगरानी के नियम और अगली सुनवाई

तय नियमों के मुताबिक, निगरानी का जिम्मा संभाल रहे जस्टिस तालुकदार को इन फ्रीज खातों से ही हर महीने 1.75 लाख रुपये का मानदेय दिया जाएगा। इसके साथ ही एचडीएफसी बैंक प्रबंधन को निर्देश दिया गया है कि वह सभी इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन और वित्तीय दस्तावेजों का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखे और जांच एजेंसियों का पूरा सहयोग करे।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इस अंतरिम आर्थिक व्यवस्था का चुनाव आयोग के समक्ष लंबित नेतृत्व विवाद पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बिधाननगर पुलिस को निर्देश दिया गया है कि वह आगामी 21 सितंबर को होने वाली अगली सुनवाई से पहले अपनी जांच की प्रगति रिपोर्ट अदालत में पेश करे।

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