राजस्थान के श्रीगंगानगर जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एक स्थानीय होंडा डीलर पर बड़ी कार्रवाई की है। आयोग ने साल 2018 मॉडल की ‘होंडा अमेज’ कार को 2019 का नया मॉडल बताकर बेचने, गाड़ी के पहले हुए रजिस्ट्रेशन की जानकारी छुपाने और वारंटी अवधि कम देने का दोषी पाते हुए डीलर पर जुर्माना लगाया है।
आयोग के अध्यक्ष राजन कुक्कड़ और सदस्य संजय भाटिया व राजीव कौशिक की पीठ ने इसे सेवा में गंभीर कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार माना। आयोग ने डीलर को आदेश दिया कि वह पीड़ित खरीदार को मानसिक, शारीरिक व आर्थिक परेशानी के मुआवजे के तौर पर 2 लाख रुपये और अदालती कार्यवाही के खर्च के रूप में 10,000 रुपये का भुगतान करे।
आयोग द्वारा 29 जून को जारी फैसले के अनुसार, दस्तावेजी सबूतों से यह साफ हो गया है कि डीलर ने गाड़ी के निर्माण वर्ष को लेकर खरीदार को गुमराह किया। पीठ ने डीलर के उस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया जिसमें दावा किया गया था कि खरीदार को गाड़ी की वास्तविक स्थिति और कम वारंटी की जानकारी पहले से थी।
पहली सर्विसिंग के दौरान हुआ धोखाधड़ी का खुलासा
यह मामला जनवरी 2019 का है, जब खरीदार ने इस डीलर के पास 21,000 रुपये का नकद भुगतान कर होंडा अमेज गाड़ी बुक कराई थी। इसके बाद 3 फरवरी 2019 को डीलर ने गाड़ी का 7.28 लाख रुपये का बिल जारी किया, जिसमें बीमा और एक्सटेंडेड वारंटी का खर्च भी शामिल था। खरीदार ने बैंक से लोन लेकर इस राशि का भुगतान किया और गाड़ी की डिलीवरी ले ली।
पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब खरीदार 12 फरवरी 2019 को कार की पहली सर्विसिंग के लिए अधिकृत सर्विस सेंटर पहुंचा। वहां गाड़ी के इंजन और चेसिस नंबर के रिकॉर्ड से पता चला कि यह कार कंपनी के रिकॉर्ड में पहले ही दिल्ली के एक निवासी के नाम पर दर्ज थी और इसकी वारंटी भी 30 अक्टूबर 2018 से ही शुरू हो चुकी थी। इस वजह से कानूनी तौर पर खरीदार इस गाड़ी का दूसरा मालिक बन चुका था।
इस धोखे की जानकारी मिलने पर खरीदार ने एक पेशेवर मैकेनिक से गाड़ी की जांच कराई। जांच में सामने आया कि गाड़ी के ओडोमीटर से छेड़छाड़ कर उसकी रीडिंग को पीछे किया गया था। साथ ही, गाड़ी को एकदम नया दिखाने के लिए उस पर नई प्लास्टिक कवरिंग लगाकर उसे कॉस्मेटिक रूप से चमकाया गया था। खरीदार का कहना था कि वारंटी अवधि में तीन महीने की इस कटौती की वजह से गाड़ी की रीसेल वैल्यू करीब 25 प्रतिशत कम हो गई।
छूट देने का दावा साबित करने में नाकाम रहा डीलर
डीलर ने अपने बचाव में दलील दी थी कि खरीदार को बुकिंग के समय ही पूरी स्थिति स्पष्ट कर दी गई थी। डीलर के मुताबिक, यह कार पहले किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर बुक थी, लेकिन उसका बैंक लोन खारिज होने के कारण वह गाड़ी नहीं खरीद सका। इस वजह से कार की वारंटी पहली बुकिंग की तारीख से शुरू हो गई थी। डीलर ने दावा किया कि तीन महीने की वारंटी कम होने के बदले खरीदार को 77,806 रुपये की अतिरिक्त छूट दी गई थी, जिसे स्वीकार करने के बाद ही उन्होंने गाड़ी खरीदी थी।
हालांकि, उपभोक्ता आयोग ने डीलर की इन दलीलों को पूरी तरह खारिज कर दिया। आयोग ने पाया कि डीलर इस छूट के दावे के समर्थन में कोई भी दस्तावेजी सबूत पेश नहीं कर सका। इसके विपरीत, खरीदार द्वारा प्रस्तुत किए गए इनवॉइस (बिल) में ऐसी किसी भी रियायत या कटौती का कोई जिक्र नहीं था। इसके अतिरिक्त, रिकॉर्ड के अनुसार दिल्ली के उस निवासी के नाम पर 12 जुलाई 2019 को एक टैक्स इनवॉइस जारी किया गया था, जिससे पहले हुई बिक्री की पुष्टि होती है।
होंडा कंपनी का हलफनामा भी अमान्य घोषित
आयोग ने इस मामले में होंडा कंपनी की ओर से पेश किए गए हलफनामे को भी साक्ष्य मानने से इनकार कर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि कंपनी ने इस मामले में अपना कोई औपचारिक लिखित जवाब रिकॉर्ड पर दर्ज नहीं कराया था। इसके अलावा, चूंकि आयोग की आधिकारिक भाषा हिंदी है और यह हलफनामा हिंदी में नहीं था, इसलिए इसे कानूनी तौर पर साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता था।

