संरक्षित वन्यजीव क्षेत्रों में अंधाधुंध व्यावसायिक मंजूरियों पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, केंद्र सरकार को नोटिस

दिल्ली हाईकोर्ट ने देश के राष्ट्रीय उद्यानों, वन्यजीव अभ्यारण्यों और बाघ अभ्यारण्यों (बाघ कॉरिडोर) जैसी संरक्षित श्रेणियों की जमीनों को व्यावसायिक और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर डायवर्ट करने के आरोपों पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायाधीश तेजस कारिया की खंडपीठ ने इस संबंध में दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर बुधवार को सुनवाई करते हुए केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (एनबीडब्ल्यूएल) को नोटिस जारी किया है। हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए सितंबर की तारीख तय की है।

यह जनहित याचिका पूर्व प्रशासनिक सेवा (आईएएस) और वन सेवा (आईएफएस) अधिकारियों सहित 10 लोगों के एक समूह द्वारा दायर की गई है। अदालत में याचिकाकर्ताओं का पक्ष वरिष्ठ वकील प्रशांतो सी. सेन और वकील शिबानी घोष ने रखा। याचिका में मांग की गई है कि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत इन पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों की प्रभावी सुरक्षा के लिए तत्काल निर्देश जारी किए जाएं, क्योंकि वन्यजीव बोर्ड और उसकी स्थायी समिति अपने संवैधानिक व वैधानिक कर्तव्यों की अनदेखी कर काम कर रहे हैं।

बिना जांच-परख के 97 प्रतिशत प्रस्तावों को मिली मंजूरी

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि नियमों के मुताबिक राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की बैठक साल में कम से कम एक बार होनी जरूरी है, लेकिन 13 साल के लंबे अंतराल के बाद साल 2025 में इसकी बैठक आयोजित की गई। वहीं दूसरी तरफ, बोर्ड की मुख्य कार्यवाहक इकाई यानी इसकी स्थायी समिति बेहद लापरवाही से संरक्षित वन क्षेत्रों की जमीन को गैर-वानिकी कार्यों के लिए सौंपने के प्रस्तावों को हरी झंडी दे रही है। याचिका में दावा किया गया है कि यह समिति सिर्फ एक ‘क्लियरिंग हाउस’ (बिना सोचे-समझे मंजूरी देने वाली संस्था) की तरह काम कर रही है, जो महज एक दिन की बैठक में 100 से अधिक प्रस्तावों को पारित कर देती है।

आंकड़ों का हवाला देते हुए याचिका में बताया गया है कि साल 2014 से 2026 के बीच संरक्षित क्षेत्रों की सीमाओं को बदलने, घटाने या वहां अन्य गतिविधियों की मंजूरी देने से जुड़े कुल प्रस्तावों में से 97 प्रतिशत से अधिक को स्थायी समिति ने बिना किसी खास रोक-टोक के मंजूरी दे दी। याचिका के अनुसार, पर्यावरण और वन्यजीवों पर पड़ने वाले प्रभावों के उचित वैज्ञानिक आकलन, विशेषज्ञ समीक्षा और सार्वजनिक पारदर्शिता के बिना ही सैकड़ों प्रस्तावों को यांत्रिक तरीके से पास किया गया है।

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टाइगर कॉरिडोर में उत्खनन और निर्माण को हरी झंडी

सड़कों और उद्योगों के लिए दी जा रही अंधाधुंध मंजूरियों के प्रभाव को रेखांकित करने के लिए याचिका में 26 जून 2025 को लिए गए फैसलों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। इस दिन समिति ने लगभग 1,730 हेक्टेयर वन भूमि को डायवर्ट करने की मंजूरी दी थी। इसके तहत इको-सेंसिटिव जोन (ईएसजेड) और संवेदनशील वन्यजीव क्षेत्रों में राजमार्गों, सड़कों, मोबाइल टावरों, हेलीपैड, अपार्टमेंट परिसरों, बिजली स्टेशनों, पारेषण लाइनों और पेयजल परियोजनाओं के साथ-साथ तेल उत्खनन व ब्लैक ग्रेनाइट खनन की अनुमति दी गई।

इसमें महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड द्वारा किए जा रहे ओपन कास्ट (खुली खदान) कोयला खनन को दी गई मंजूरी भी शामिल है। यह पूरा क्षेत्र ताडोबा अंधारी टाइगर रिजर्व, कन्हाईगांव वन्यजीव अभ्यारण्य और टिपेश्वर वन्यजीव अभ्यारण्य को आपस में जोड़ने वाला एक बेहद महत्वपूर्ण टाइगर कॉरिडोर (बाघ गलियारा) है, जिसे इस फैसले से भारी नुकसान पहुंचने की आशंका जताई गई है।

संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन

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याचिका के अनुसार, भारत में लगभग 1,134 संरक्षित क्षेत्र हैं, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 5.28 से 5.43 प्रतिशत हिस्सा हैं। ये राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभ्यारण्य देश की पर्यावरण सुरक्षा के साथ-साथ खाद्य और जल सुरक्षा के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि पर्यावरण मंत्रालय की उदासीनता और बोर्ड की खराब कार्यप्रणाली के कारण देश की अमूल्य धरोहर मानी जाने वाली करीब 12 लाख हेक्टेयर संरक्षित वन भूमि का नुकसान हुआ है, जिसे सरकार को ‘पब्लिक ट्रस्ट’ (सार्वजनिक न्यास) के रूप में सुरक्षित रखना चाहिए था। याचिका में जोर दिया गया कि इस तरह वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों को नष्ट करना भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को मिले मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है, जिसके तहत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार में एक स्वच्छ वातावरण पाना और जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से सुरक्षित रहने का अधिकार भी शामिल है।

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