ट्रायल में देरी पर राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 52 महीनों से जेल में बंद आरोपी को दी जमानत

राजस्थान हाईकोर्ट ने मादक पदार्थ (एनडीपीएस) कानून से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए 27 वर्षीय आरोपी शेरुद्दीन को जमानत दे दी है। आरोपी पिछले 52 महीनों (करीब 4.4 साल) से जेल में बंद था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुकदमे में अत्यधिक देरी के कारण किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल के लिए सलाखों के पीछे रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का खुला उल्लंघन है।

न्यायमूर्ति अनिल कुमार उपमन ने 29 जून को इस मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी को रिहा करने का आदेश दिया। शेरुद्दीन को जोधपुर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने 15 फरवरी 2022 को प्रतिबंधित गांजे के साथ गिरफ्तार किया था और वह तब से लगातार हिरासत में था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता मनुष्य के लिए एक अनमोल खजाना है और यह एक प्राकृतिक अधिकार है, जिसे कोई भी खोना नहीं चाहता।

गवाह पेश करने में नाकाम रहा अभियोजन पक्ष

अदालत ने मुकदमे की कछुआ गति के लिए पूरी तरह से अभियोजन पक्ष को जिम्मेदार ठहराया। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि शेरुद्दीन के खिलाफ 18 मई 2024 को आरोप तय कर दिए गए थे। इसके बाद गवाहों को बुलाकर सबूत पेश करना अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी थी, लेकिन पर्याप्त अवसर मिलने के बावजूद वे गवाहों को पेश करने में विफल रहे।

वर्तमान में मामले से जुड़े चार सरकारी गवाहों की गवाही होना बाकी है, जो खुद लोक सेवक (पब्लिक सर्वेंट) हैं। कोर्ट ने कहा कि जांच से जुड़े होने के कारण इन गवाहों को मामले की पूरी जानकारी थी, फिर भी वे समन जारी होने के बाद भी सुनवाई की तारीखों पर लगातार अनुपस्थित रहे।

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जांच अधिकारी के खिलाफ जारी हुआ था गिरफ्तारी वारंट

मुकदमे में देरी का आलम यह रहा कि लगातार अनुपस्थित रहने पर निचली अदालत ने बीती 16 फरवरी को मामले के जांच अधिकारी के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया था। इसके बावजूद मार्च से जून के बीच कई तारीखों पर सुनवाई होने पर भी कोई सरकारी गवाह अदालत के सामने पेश नहीं हुआ। न्यायमूर्ति उपमन ने इस पर सख्त नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि एनसीबी जैसी बड़ी जांच एजेंसी के अधिकारी ही मुकदमे के समय पर निपटारे में सहयोग नहीं कर रहे हैं।

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पहले दिए गए अदालती निर्देशों की भी अनदेखी

यह शेरुद्दीन की तीसरी जमानत याचिका थी। इससे पहले सितंबर 2025 में उसकी दूसरी जमानत याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने निचली अदालत को निर्देश दिया था कि वह छह महीने के भीतर इस ट्रायल को पूरा करे। इस समय सीमा के बीत जाने के बाद भी जब मुकदमा पूरा नहीं हुआ, तो आरोपी ने लंबे समय से जेल में बंद होने का हवाला देकर फिर से जमानत की गुहार लगाई।

हालांकि, सरकारी वकील ने जमानत का कड़ा विरोध करते हुए तर्क दिया कि एनडीपीएस एक्ट के तहत लगाए गए आरोप बेहद गंभीर हैं और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों को देखते हुए आरोपी को राहत नहीं दी जानी चाहिए।

गरिमा के साथ जीना मौलिक अधिकार

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हाईकोर्ट ने गरिमापूर्ण जीवन को सर्वोपरि बताते हुए कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ केवल शारीरिक बंधनों से मुक्ति नहीं है, बल्कि गरिमा के साथ जीवन जीना है। इसका मतलब केवल ‘पशुवत अस्तित्व’ नहीं हो सकता।

सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का संदर्भ देते हुए अदालत ने कहा कि लंबे समय तक जेल में रहना और मुकदमे के जल्द पूरा होने की कम उम्मीद होना जमानत देने का ठोस आधार है। आरोपी शेरुद्दीन की लंबी हिरासत अवधि, उसके साफ रिकॉर्ड और निकट भविष्य में ट्रायल पूरा होने की बेहद कम संभावना को देखते हुए हाईकोर्ट ने उसे जमानत पर रिहा करने का फैसला सुनाया।

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