किसी भी व्यक्ति का जबरन नार्को-एनालिसिस या पॉलीग्राफ टेस्ट नहीं किया जा सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानसिक निजता की सुरक्षा के मामले में एक बड़ा निर्णय सुनाते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (बिलासपुर) ने स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति को उसकी सहमति के बिना नार्को-एनालिसिस, पॉलीग्राफ टेस्ट या किसी अन्य वैज्ञानिक जांच के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। एक रिट याचिका का निपटारा करते हुए चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने निर्देश दिया कि इस तरह के टेस्ट केवल संबंधित व्यक्ति की स्वतंत्र, स्वैच्छिक और जागरूक सहमति से ही किए जा सकते हैं, जिसे सक्षम न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किया जाना अनिवार्य है।

कोर्ट ने रेखांकित किया कि आत्म-दोषारोपण के खिलाफ अधिकार (राइट अगेंस्ट सेल्फ-इन्क्रिमिनेशन) आपराधिक मामलों की जांच के चरण तक विस्तृत है, जो आरोपियों, संदिग्धों और गवाहों सभी को बिना सहमति वाले फॉरेंसिक टेस्ट से सुरक्षा प्रदान करता है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता लक्ष्मीनारायण पटेल और Smt. अर्धना भगत ने पुलिस की दमनकारी कार्रवाई के खिलाफ भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। रायगढ़ के चक्रधर नगर पुलिस स्टेशन में अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 103(1) (हत्या) और 238A (साक्ष्य मिटाना या झूठी सूचना देना) के तहत दर्ज अपराध संख्या 61/2026 के सिलसिले में पुलिस उन्हें ब्रेन मैपिंग, पॉलीग्राफ और नार्को-एनालिसिस टेस्ट के अधीन करना चाहती थी।

याचिकाकर्ताओं का नाम एफआईआर में नहीं था और न ही उनके खिलाफ कोई आपत्तिजनक सामग्री उपलब्ध थी। वास्तव में, अग्रिम जमानत की कार्यवाही के दौरान सत्र न्यायालय के समक्ष जांच अधिकारी द्वारा 16 जून, 2026 को प्रस्तुत की गई जांच रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया था कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला है।

इसके बावजूद, याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि उन्हें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के तहत किसी भी वैधानिक नोटिस के बिना लगातार लगभग 18 दिनों तक पुलिस स्टेशन बुलाया गया। उन्हें लंबे समय तक हिरासत में रखा गया, सुपुर्दनामे पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया और बिना किसी औपचारिक जब्ती मेमो के उनके मोबाइल फोन जब्त कर लिए गए। अंततः, 20 जून, 2026 को पुलिस ने उन्हें बिना उनकी सहमति या किसी न्यायिक आदेश के ब्रेन मैपिंग, पॉलीग्राफ और नार्को-एनालिसिस टेस्ट कराने के लिए रायपुर जाने के लिए मजबूर किया।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील श्री रूप राम नायक ने तर्क दिया कि पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई पूरी तरह से मनमानी, अवैध और दुर्भावनापूर्ण थी। उन्होंने कहा कि यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 20(3) (आत्म-दोषारोपण के खिलाफ अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओं को उनकी सहमति या अदालती आदेश के बिना इन वैज्ञानिक परीक्षणों के लिए मजबूर करना जांच शक्तियों का गंभीर दुरुपयोग है।

दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील श्री सौम्य राय ने रिट याचिका का विरोध करते हुए इसे समय से पहले बताया। उन्होंने तर्क दिया कि मामले की जांच अभी शुरुआती चरण में है और कानून के अनुसार की जा रही है। उन्होंने कहा कि जांच के दौरान कुछ तथ्य सामने आने के कारण याचिकाकर्ताओं को केवल पूछताछ के लिए बुलाया गया था और सामान्य पूछताछ को उत्पीड़न नहीं कहा जा सकता। राज्य के वकील ने अवैध हिरासत और मोबाइल फोन की जबरन जब्ती के आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताया। उन्होंने आगे कहा कि याचिकाकर्ताओं के फॉरेंसिक टेस्ट के संबंध में कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया था और कोई भी परीक्षण केवल स्थापित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार ही किया जाएगा।

कोर्ट का विश्लेषण और ‘सेल्वी’ मामले पर भरोसा

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की समीक्षा की और पाया कि जांच अधिकारी की अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट लिखा था कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला है। बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि नार्को-एनालिसिस या इसी तरह की फॉरेंसिक जांच से जुड़े किसी भी कदम को स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं और वैधानिक सुरक्षा उपायों के अनुरूप होना चाहिए।

इस तरह के परीक्षणों की संवैधानिक सीमाओं का विश्लेषण करने के लिए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (2010) का विस्तार से हवाला दिया। बेंच ने रेखांकित किया कि कैसे सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जबरन किए जाने वाले ये परीक्षण संवैधानिक गारंटियों का उल्लंघन करते हैं।

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले को उद्धृत करते हुए बेंच ने टिप्पणी की: “…आत्म-दोषारोपण के खिलाफ अधिकार को अब आपराधिक प्रक्रिया में एक आवश्यक सुरक्षा कवच के रूप में देखा जाता है। इसका मूल तर्क मोटे तौर पर दो उद्देश्यों से मेल खाता है—पहला, आरोपी द्वारा दिए गए बयानों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना, और दूसरा, यह सुनिश्चित करना कि ऐसे बयान स्वैच्छिक रूप से दिए गए हों।”

कोर्ट ने माना कि पॉलीग्राफ और ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन प्रोफाइल (BEAP) जैसे परीक्षण भी गवाही के दायरे में आते हैं क्योंकि वे जानकारी प्राप्त करने के लिए व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक प्रतिक्रियाओं पर निर्भर करते हैं। बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के निष्कर्षों का हवाला दिया: “…पॉलीग्राफ परीक्षण और बीईएपी (BEAP) टेस्ट जैसे परीक्षणों से प्राप्त परिणामों को भी ‘व्यक्तिगत गवाही’ के रूप में माना जाना चाहिए, क्योंकि वे ‘प्रासंगिक तथ्यों के बारे में व्यक्तिगत ज्ञान प्रदान करने’ का एक साधन हैं।”

हाईकोर्ट ने दोहराया कि अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार में मानसिक निजता और व्यक्तिगत स्वायत्तता शामिल है। किसी व्यक्ति को इन परीक्षणों के लिए मजबूर करना उसकी मानसिक प्रक्रिया में एक अनुचित हस्तक्षेप है, जो कानूनी सलाह को अप्रभावी बना देता है और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से समझौता करता है। बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश को उद्धृत किया: “…इन तकनीकों का जबरन इस्तेमाल ‘आत्म-दोषारोपण के खिलाफ अधिकार’ का उल्लंघन करता है।”

और आगे यह भी कहा गया: “…किसी भी व्यक्ति को इनमें से किसी भी तकनीक के अधीन होने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, चाहे वह आपराधिक मामलों की जांच के संदर्भ में हो या अन्यथा।”

अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि भले ही कोई व्यक्ति इन परीक्षणों के लिए सहमति दे दे, फिर भी परीक्षण के परिणाम सीधे तौर पर सबूत के रूप में स्वीकार्य नहीं होते क्योंकि परीक्षण के दौरान व्यक्ति का अपनी प्रतिक्रियाओं पर सचेत नियंत्रण नहीं होता। हालांकि, स्वैच्छिक परीक्षण की मदद से बाद में खोजी गई किसी भी सामग्री या जानकारी को साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 27 के तहत स्वीकार किया जा सकता है।

उचित सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने के लिए कोर्ट ने साल 2000 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) द्वारा जारी दिशानिर्देशों का उल्लेख किया, जो अनिवार्य करते हैं कि:

  1. आरोपी की सहमति के बिना कोई लाई डिटेक्टर टेस्ट नहीं किया जा सकता।
  2. परीक्षण के शारीरिक, भावनात्मक और कानूनी प्रभावों को समझने के लिए विषय को वकील तक पहुंच दी जानी चाहिए।
  3. सहमति को औपचारिक रूप से न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज किया जाना चाहिए।
  4. वास्तविक परीक्षण एक स्वतंत्र एजेंसी (जैसे अस्पताल) द्वारा वकील की उपस्थिति में किया जाना चाहिए।
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कोर्ट का निर्णय

जांच के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त किए बिना हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि जांच एजेंसी याचिकाकर्ताओं को नार्को-एनालिसिस, पॉलीग्राफ टेस्ट, बीईएपी (BEAP) टेस्ट या किसी अन्य समान वैज्ञानिक तकनीक से गुजरने के लिए मजबूर या प्रताड़ित नहीं करेगी।

बेंच ने निर्देश दिया कि यदि ऐसे परीक्षणों का प्रस्ताव किया जाता है, तो वे केवल याचिकाकर्ताओं की स्वैच्छिक, सूचित और स्पष्ट सहमति से ही आयोजित किए जा सकते हैं। इसके लिए सेल्वी मामले और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दिशानिर्देशों में निर्धारित सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन करना होगा। कोर्ट ने अनिवार्य किया कि किसी भी सहमति को सक्षम न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज किया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सहमति पूरी तरह से स्वतंत्र और स्वैच्छिक है। इन निर्देशों के साथ रिट याचिका का निपटारा कर दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: लक्ष्मीनारायण पटेल और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यूपीसीआर संख्या 340/2026
पीठ: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल
निर्णय की तिथि: 29 जून, 2026

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