मौजूदा बिजनेस के तथ्य छिपाने पर मकान मालिक की ‘वास्तविक जरूरत’ की दलील खारिज: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कीर्ति नगर में एक कमर्शियल दुकान का कब्जा वापस लेने की मांग करने वाले मकान मालिक की बेदखली याचिका खारिज करने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने माना कि मकान मालिक इस संपत्ति के लिए अपनी ‘वास्तविक जरूरत’ (bona fide requirement) साबित करने में विफल रहा और यह निष्कर्ष निकाला कि किराएदार को बेदखल करने के लिए जरूरत की कहानी गढ़ी गई थी।

यह फैसला जस्टिस अमित शर्मा ने मूल याचिकाकर्ता बृज मोहन बत्ता के कानूनी उत्तराधिकारियों द्वारा किराएदार तारा चंद गर्ग व अन्य के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका (revision petition) को खारिज करते हुए सुनाया। कोर्ट को 8 जुलाई, 2024 के अतिरिक्त किराया नियंत्रक (एआरसी), पश्चिम, तीस हजारी कोर्ट के उस फैसले में दखल देने का कोई आधार नहीं मिला, जिसमें बेदखली की याचिका को खारिज कर दिया गया था।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह कानूनी विवाद कीर्ति नगर इंडस्ट्रियल एरिया में 22′ x 10′ आकार की एक दुकान से जुड़ा है, जिसे 1970 में प्रतिवादियों को किराए पर दिया गया था। मकान मालिक ने दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 की धारा 14(1)(e) के तहत वास्तविक जरूरत का दावा करते हुए बेदखली याचिका दायर की थी। उसने दलील दी थी कि उसे अपने दो बेरोजगार बेटों को व्यवसाय शुरू कराकर सेटल करने के लिए इस दुकान की आवश्यकता है, क्योंकि वह अकेले अपना कैटरिंग का व्यवसाय संभालने में असमर्थ है।

किराएदारों ने इस बेदखली का विरोध किया। उनका तर्क था कि मकान मालिक के पास पहले से ही पर्याप्त कमर्शियल जगह है, जिसमें बगल की दुकान और संपत्ति की पूरी पहली व दूसरी मंजिल शामिल है। सबसे अहम बात यह थी कि किराएदारों ने आरोप लगाया कि मकान मालिक के बेटे पहले से ही ईस्ट पंजाबी बाग की एक संपत्ति से ‘ओम वनीसा क्रिएशंस’ के नाम से गिफ्ट आइटम और थीम पैकेजिंग का स्थापित व्यवसाय चला रहे हैं।

अपने दावे को साबित करने के लिए किराएदारों ने कुछ तस्वीरें पेश कीं, जिनमें एक दुकान के बाहर ‘ओम वनीसा क्रिएशंस’ का बैनर लगा हुआ था और उस पर मोबाइल नंबर भी लिखे थे।

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अदालती कार्यवाही और विश्लेषण

एआरसी के समक्ष ट्रायल के दौरान, मकान मालिक ने शुरुआत में किराएदार के दावों से इनकार किया। हालांकि, बाद में जिरह (cross-examination) के दौरान उसने यह स्वीकार किया कि बैनर पर लिखा एक मोबाइल नंबर उसके बेटे का है। उसने यह भी माना कि जिस दुकान पर बैनर लटका था, वह उसके भाई की है।

एआरसी ने गौर किया कि मकान मालिक ने इस दावे का खंडन करने के लिए अपने भाई को गवाह के तौर पर पेश नहीं किया कि उसके बेटे उस जगह से व्यवसाय नहीं चला रहे थे। साथ ही, उसने अपने बेटे के फोन नंबर के कथित दुरुपयोग को लेकर कोई शिकायत भी दर्ज नहीं कराई। एआरसी ने निष्कर्ष निकाला, “ऊपर की गई चर्चा के मद्देनजर, मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि किराएदार को किराए की संपत्ति से बेदखल करने के लिए याचिकाकर्ता की जरूरत मनगढ़ंत और गढ़ी हुई प्रतीत होती है।”

हाईकोर्ट में अपनी अपील में मकान मालिक के वकील ने तर्क दिया कि एआरसी ने सबूतों के गलत आकलन के आधार पर याचिका खारिज की है। उन्होंने दलील दी कि केवल मकान मालिक के भाई की बंद दुकान के बैनर पर बेटे का फोन नंबर होने से यह साबित नहीं होता कि बेटे व्यवसाय चला रहे थे। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि विवादित संपत्ति की पहली और दूसरी मंजिल रेस्तरां चलाने के लिए उपयुक्त नहीं है।

जस्टिस अमित शर्मा ने ध्यान दिलाया कि किराएदारों ने शुरुआत से ही बेटों के मौजूदा व्यवसाय को लेकर बचाव पक्ष रखा था। कोर्ट ने टिप्पणी की, “इन परिस्थितियों में, यह याचिकाकर्ता की जिम्मेदारी थी कि वह दस्तावेजों या किसी अन्य माध्यम से यह स्थापित करे कि तस्वीर/तस्वीरों में प्रदर्शित बैनर उसके बेटों का नहीं था।”

हाईकोर्ट ने दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम की धारा 25B(8) के तहत अपने पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र (revisional jurisdiction) के सीमित दायरे पर जोर दिया। सरला आहूजा बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और आबिद-उल-इस्लाम बनाम इंदर सैन दुआ मामलों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक पुनरीक्षण अदालत सबूतों का फिर से मूल्यांकन नहीं कर सकती या अपने विचार नहीं थोप सकती, जब तक कि निचली अदालत का आदेश मनमाना, अनुचित या अधिकार क्षेत्र की त्रुटि से ग्रस्त न हो।

निर्णय

एआरसी के फैसले में ऐसी कोई खामी न पाते हुए हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर काम किया है और उसके निष्कर्ष रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री पर आधारित हैं।

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कोर्ट ने निर्णय दिया, “वर्तमान मामले के उपरोक्त तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, विवादित फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार… नहीं बनता है, और इसलिए इसे बरकरार रखा जाता है।” इसके बाद अदालत ने पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: श्री बृज मोहन बत्ता बनाम श्री तारा चंद गर्ग व अन्य
वाद संख्या: आरसी.रेव. 235/2024 और सीएम एप्लीकेशन 64052/2024
पीठ: जस्टिस अमित शर्मा
निर्णय की तिथि: 6 जुलाई, 2026

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