इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि मृत्युपूर्व कथन (डाइंग डिक्लेरेशन) दर्ज करते समय मृतका की मानसिक स्थिति के संबंध में डॉक्टर का फिटनेस प्रमाणपत्र होना कानूनन अनिवार्य नहीं है, बल्कि यह केवल विवेक का एक नियम है। हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत के लिए मुख्य कसौटी यह परखना है कि क्या मृतका का बयान स्वैच्छिक, सत्य और किसी भी बाहरी प्रभाव या दबाव से पूरी तरह मुक्त था। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने दो संबंधित आपराधिक अपीलों पर एक साथ सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया। इस कानूनी सिद्धांत को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने अपनी पत्नी को जिंदा जलाकर मारने वाले पति की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा, जबकि मामले में पर्याप्त सबूत न होने के कारण ससुर को प्रताड़ना के आरोपों से बरी कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वर्ष 2014 में हुए एक विवाह से जुड़ा है। शादी के तीन साल बाद, 16 नवंबर 2017 को रात करीब 8:00 बजे ससुराल के घर में पत्नी गंभीर रूप से झुलस गई। मृतका की माँ ने 20…नवंबर 2017 को थाने में लिखित तहरीर देकर आरोप लगाया कि जब उनकी बेटी सो रही थी, तब उसके पति और ससुराल वालों ने उस पर मिट्टी का तेल (केरोसिन) छिड़क कर आग लगा दी। इस कृत्य के पीछे दो मुख्य कारण बताए गए—पहला यह कि शादी के तीन साल बाद भी महिला को कोई संतान नहीं हुई थी, और दूसरा यह कि ससुराल वालों द्वारा चार पहिया वाहन (दहेज) की मांग पूरी नहीं की जा रही थी।
गंभीर रूप से झुलसी महिला को तुरंत फतेहपुर के जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां घटना के अगले ही दिन यानी 17 नवंबर 2017 को नायब तहसीलदार द्वारा उसका मृत्युपूर्व कथन दर्ज किया गया। इसके बाद बेहतर इलाज के लिए उन्हें कानपुर के हैलट अस्पताल रेफर किया गया, जहां 95 प्रतिशत गहरे घावों और सेप्टीसीमिया के कारण 30 नवंबर 2017 को उनकी मृत्यु हो गई। पुलिस ने जांच पूरी कर केवल पति और ससुर के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए, 304बी और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत चार्जशीट दाखिल की, जबकि परिवार के अन्य पांच सदस्यों को क्लीन चिट दे दी। बाद में ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ हत्या की धारा 302 (सह-पठित धारा 34) का वैकल्पिक आरोप भी तय किया।
ट्रायल कोर्ट ने 14 जनवरी 2020 को अपने फैसले में दोनों आरोपियों को दहेज मृत्यु और दहेज निषेध के आरोपों से तो बरी कर दिया, लेकिन पति को हत्या (धारा 302) और प्रताड़ना (धारा 498ए) का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। वहीं, ससुर को केवल धारा 498ए के तहत दोषी पाकर दो साल की कैद की सजा सुनाई गई। दोनों ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं (बचाव पक्ष) के वकील ने दलील दी कि महिला की मौत पूरी तरह से एक दुर्घटना थी। उनके अनुसार, घटना की रात वह अपने घर की झोपड़ी में खाना बना रही थी, तभी मिट्टी के चूल्हे के ऊपर रखा केरोसिन का दीया कीड़ों के दबाव के कारण नीचे गिर गया और आग फैल गई। बचाव पक्ष ने दावा किया कि पति ने भी अपनी पत्नी को बचाने की कोशिश की थी, जिसमें वह खुद भी झुलस गया था। इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि मृतका की माँ सहित अभियोजन पक्ष के सभी मुख्य गवाह सुनवाई के दौरान अपनी गवाही से मुकर गए (होस्टाइल हो गए), इसलिए प्रताड़ना का कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है। इसके अलावा, बचाव पक्ष ने मृतका के बयान पर संदेह जताते हुए तर्क दिया कि 95 प्रतिशत तक झुलसी हुई महिला के लिए ऐसा सुसंगत और विस्तृत बयान देना व्यावहारिक रूप से असंभव था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि बयान सिखाया-पढ़ाया या पूरी तरह से फर्जी था। ससुर के संदर्भ में दलील दी गई कि वह एक मजदूर हैं और अपने बेटे-बहू से अलग झोपड़ी में रहते थे, तथा उनका इस घटना से कोई लेना-देना नहीं था।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से उपस्थित एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट (ए.जी.ए.) ने दलील दी कि मृतका द्वारा दिया गया बयान पूरी तरह से स्वैच्छिक, सुसंगत और विश्वसनीय था। राज्य ने कोर्ट को बताया कि ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने बयान दर्ज होने से पहले और बाद में दो अलग-अलग प्रमाणपत्र जारी किए थे, जिसमें स्पष्ट लिखा था कि महिला पूरी तरह से होश में थी और बयान देने के लिए मानसिक रूप से फिट थी। इसके अलावा, बयान दर्ज करते समय वार्ड में परिवार का कोई सदस्य मौजूद नहीं था, जिससे उसे बहकाने या सिखाने की कोई भी गुंजाइश नहीं बचती।
कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी सिद्धांत
हाईकोर्ट ने मृतका के मृत्युपूर्व कथन का अत्यंत सूक्ष्मता से परीक्षण किया। अपने बयान में महिला ने स्पष्ट रूप से बताया था कि उसके पति ने पहले उसे पीटा, फिर केरोसिन डालकर आग लगा दी। उसने इसके दो कारण बताए थे: पहला, निसंतान होने के कारण लगातार मिलने वाले ताने, और दूसरा, उसने अपने पति को उसकी जेठानी (भाभी) के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था।
डॉक्टर के विशिष्ट “मानसिक फिटनेस” प्रमाणपत्र की अनुपस्थिति के संबंध में बचाव पक्ष के तर्कों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा लक्ष्मण बनाम महाराष्ट्र राज्य (2002) मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया। हाईकोर्ट ने देश की सर्वोच्च अदालत की इस टिप्पणी को उद्धृत किया:
“वह स्थिति जिसमें कोई व्यक्ति अपनी मृत्युशय्या पर होता है, बहुत ही गंभीर और पवित्र होती है, और यही कानून में उसके बयान की सत्यता को स्वीकार करने का आधार है। इसी कारण से शपथ और जिरह की आवश्यकता को समाप्त कर दिया गया है। चूंकि आरोपी के पास जिरह का अधिकार नहीं होता, इसलिए अदालतें इस बात पर जोर देती हैं कि मृत्युपूर्व कथन ऐसा होना चाहिए जो अदालत में पूर्ण विश्वास जगाए। हालांकि, अदालत को हमेशा इस बात के प्रति सतर्क रहना चाहिए कि बयान किसी के सिखाने, उकसाने या कल्पना का परिणाम न हो।”
बयान के प्रारूप और उसे दर्ज किए जाने की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को भी रेखांकित किया गया:
“एक मृत्युपूर्व कथन मौखिक या लिखित हो सकता है और संचार का कोई भी पर्याप्त तरीका, चाहे वह शब्दों, संकेतों या किसी अन्य माध्यम से हो, तब तक पर्याप्त होगा जब तक कि संकेत स्पष्ट और निश्चित हो। कानूनन यह अनिवार्य नहीं है कि मृत्युपूर्व कथन केवल मजिस्ट्रेट के सामने ही दिया जाए, और जब मजिस्ट्रेट द्वारा ऐसा बयान दर्ज किया जाता है, तो इसके लिए कोई विशिष्ट वैधानिक प्रारूप तय नहीं है।”
लक्ष्मण, कोली चुनीलाल सावजी और अन्य बनाम गुजरात राज्य (1999) और कृष्ण कुमार उर्फ पम्मा बनाम हरियाणा राज्य (1998) के मामलों में प्रतिपादित सिद्धांतों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:
“मृतक के बयान देने के लिए मानसिक रूप से स्वस्थ होने के संबंध में डॉक्टर का प्रमाणपत्र होना कानून का कोई अनिवार्य नियम नहीं है, बल्कि यह केवल विवेक का एक नियम है; अंतिम कसौटी यह है कि मृत्युपूर्व कथन सत्य, स्वैच्छिक और किसी भी तरह के सिखाने, उकसाने या अन्य संदिग्ध परिस्थितियों से मुक्त होना चाहिए।”
इसके अलावा, बयान दर्ज करने वाले कार्यकारी मजिस्ट्रेट की निष्पक्षता पर भरोसा जताते हुए हाईकोर्ट ने कोली चुनीलाल सावजी मामले की नजीर का हवाला दिया:
“कार्यकारी मजिस्ट्रेट एक निष्पक्ष गवाह और एक जिम्मेदार अधिकारी होता है और रिकॉर्ड पर ऐसी कोई परिस्थिति या सामग्री नहीं है जिससे यह संदेह किया जा सके कि कार्यकारी मजिस्ट्रेट का आरोपी के प्रति कोई द्वेष था या वह किसी भी तरह से मृत्युपूर्व कथन को झूठा बनाने में रुचि रखता था।”
हाईकोर्ट ने पति द्वारा दिए गए हादसे के तर्क को भी उसके आचरण के आधार पर पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने टिप्पणी की:
“यदि आरोपी पति निर्दोष था, तो उसका यह कर्तव्य था कि वह अपनी जली हुई पत्नी को इलाज के लिए अस्पताल ले जाता और घटना के अधिकार क्षेत्र वाले संबंधित थाने में पुलिस को इसकी सूचना देता।”
अदालत ने पाया कि इसके विपरीत पति घटना के तुरंत बाद मौके से भाग गया, उसने न तो पत्नी को चिकित्सा सहायता प्रदान की और न ही पुलिस को सूचित किया। यह आचरण हादसे के दावे को झुठलाता है और स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि यह एक सोची-समझी हत्या थी। गवाहों के मुकर जाने को कोर्ट ने बचाव पक्ष के प्रभाव में आना माना और कहा कि इससे मृतका के विश्वसनीय मृत्युपूर्व कथन की कानूनी अहमियत कम नहीं हो जाती।
ससुर के मामले में, हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी द्वारा तैयार किए गए घटना स्थल के आधिकारिक नक्शे का अध्ययन किया। नक्शे से यह स्पष्ट था कि ससुर का घर मुख्य सड़क के दूसरी तरफ था, जबकि पति-पत्नी मुख्य बस्ती से दूर एक अलग झोपड़ी में रहते थे। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि ससुर के खिलाफ क्रूरता या प्रताड़ना का कोई ठोस सबूत नहीं है, इसलिए उनकी दोषसिद्धि कानूनी रूप से टिकी नहीं रह सकती।
न्यायालय का निर्णय
हाईकोर्ट ने पति द्वारा दायर आपराधिक अपील को खारिज कर दिया। उसकी हत्या (आईपीसी की धारा 302) और प्रताड़ना (धारा 498ए) की दोषसिद्धि को पूरी तरह बरकरार रखा गया और उसे अपनी उम्रकैद की सजा काटने के लिए जेल में ही रहने का निर्देश दिया गया।
दूसरी ओर, अदालत ने ससुर द्वारा दायर अपील को स्वीकार कर लिया और उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 498ए के तहत निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को रद्द कर दिया। ससुर को सभी आरोपों से बरी करते हुए उनके बेल बांड और जमानतियों को तत्काल प्रभाव से मुक्त कर दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सुहैल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1401/2020
पीठ: जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी
निर्णय की तिथि: 01 जुलाई, 2026

