लगातार जारी रहने वाले कारण की दलील सिविल अवमानना के लिए तय एक साल की समय सीमा को दरकिनार नहीं कर सकती: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी आदेश के अनुपालन की एक निश्चित समय सीमा समाप्त हो चुकी है, तो उसके बाद तय एक साल की वैधानिक सीमा अवधि बीत जाने पर दायर अवमानना याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस सुभेंदु सामंत शामिल थे, ने वर्ष 2022 के एक आदेश का पालन न करने का आरोप लगाने वाली अवमानना याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने माना कि सीमा की अवधि (लिमिटेशन पीरियड) एक बार शुरू होने के बाद अपनी पूरी अवधि तय करती है और इसे तब तक “लगातार जारी रहने वाली गलती” (कंटिन्यूइंग रॉन्ग) के रूप में टालकर दरकिनार नहीं किया जा सकता, जब तक कि इसके लिए कोई असाधारण और ठोस आधार न पेश किया गया हो।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता एस. जनार्दन ने हाईकोर्ट की एक समन्वयक पीठ द्वारा रिट याचिका संख्या 21758/2022 में 22 जुलाई 2022 को पारित निर्णय और आदेश की जानबूझकर की गई अवज्ञा का आरोप लगाते हुए यह अवमानना याचिका दायर की थी।

समन्वयक पीठ ने रिट याचिका का निपटारा करते हुए प्रतिवादियों (श्री अनिल कुमार सिंघल और अन्य) को प्रशासनिक न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) द्वारा ओ.ए. संख्या 2044/2018 में 25 सितंबर 2018 को पारित आदेश को जल्द से जल्द लागू करने का निर्देश दिया था। इसके लिए आदेश की प्रति मिलने की तारीख से तीन महीने के भीतर का समय अधिमानतः (प्रिफरेबली) तय किया गया था।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील श्री पी. राघवेंद्र रेड्डी ने वर्चुअल माध्यम से पेश होते हुए इस बात से इनकार नहीं किया कि यह अवमानना याचिका, अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 20 के तहत निर्धारित एक वर्ष की सीमा अवधि समाप्त होने के काफी समय बाद दायर की गई थी।

हालांकि, याचिकाकर्ता ने दलील दी कि चूंकि अदालती निर्देशों को अभी तक लागू नहीं किया गया है, इसलिए अवमानना का कारण लगातार बना हुआ है (कंटिन्यूइंग कॉज ऑफ एक्शन)। इस आधार पर इस याचिका को एक वर्ष की सामान्य समय सीमा से छूट मिलनी चाहिए।

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याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि ट्रिब्यूनल के 25 सितंबर 2018 के मूल आदेश को बाद में तिरुपति नगर निगम द्वारा रिट याचिका संख्या 3322/2024 के माध्यम से चुनौती दी गई थी। चूंकि हाईकोर्ट ने इस रिट याचिका को 8 फरवरी 2024 को खारिज कर दिया था, इसलिए याचिकाकर्ता का कहना था कि इस बाद की मुकदमेबाजी के फैसले का लाभ अवमानना याचिका दायर करने की समय सीमा की गणना में उन्हें मिलना चाहिए।

कोर्ट का विश्लेषण और न्यायिक सिद्धांत

कोर्ट ने अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 20 के वैधानिक प्रतिबंध का मूल्यांकन किया। यह धारा स्पष्ट करती है कि कोई भी अदालत अवमानना की कथित घटना की तारीख से एक वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद, अपने विवेक से या किसी अन्य माध्यम से अवमानना की कार्यवाही शुरू नहीं करेगी।

इस संबंध में पीठ ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा एस. तिरुपति राव बनाम एम. लिंगैया (2024) 20 SCC 188 मामले में प्रतिपादित कानून का विस्तार से हवाला दिया। उस मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत ने स्पष्ट किया था कि अवमानना की कार्यवाही मूल प्रकृति (ओरिजिनल नेचर) की होती है और इसमें देरी की माफी के लिए सीमा अधिनियम, 1963 की धारा 5 का लाभ नहीं लिया जा सकता। हालांकि, असाधारण परिस्थितियों में सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 7 नियम 6 के सिद्धांतों के तहत समय सीमा से छूट का दावा तो किया जा सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बहुत पुराने और बासी दावों पर विचार करने के खिलाफ चेतावनी दी थी।

एस. तिरुपति राव मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को रेखांकित करते हुए हाईकोर्ट ने उद्धृत किया:

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“कंटिन्यूइंग रॉन्ग/उल्लंघन/अपराध के बहाने अवमानना के पुराने मामलों पर विचार नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि कानून की धारा 20 को शामिल करने के पीछे विधायिका की यही मंशा थी… अगर हर बार छूट के आधार के रूप में ‘कंटिन्यूइंग रॉन्ग’ की दलील को यांत्रिक रूप से स्वीकार कर लिया गया, तो कोई भी आवेदक अपनी सुविधा के अनुसार कभी भी कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा था:

“यदि अवमानना की कार्रवाई देरी से, यानी सीमा की शुरुआती अवधि के बाद और पहली बार हुए उल्लंघन के वर्षों बाद लाई जाती है, तो ऐसा लगता है कि उल्लंघन जारी रहने के दौरान कोर्ट की प्रतिष्ठा ही प्रभावित होती है। एक बार जब कोर्ट के आदेश का पालन न होने से जनता की नजरों में कोर्ट की गरिमा कम हो जाती है, तो लंबे समय बाद अचानक कार्यवाही शुरू करना हास्यास्पद होगा।”

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को खारिज कर दिया कि अनुपालन न होना एक निरंतर जारी रहने वाला कारण था। पीठ ने कहा:

“यहाँ एक निश्चित अवधि के भीतर आदेश का पालन करने का स्पष्ट निर्देश था। यदि उस अवधि के भीतर आदेश का पालन नहीं किया गया, तो रिट कोर्ट के आदेश में निर्दिष्ट अवधि समाप्त होने की तारीख से अधिनियम की धारा 20 के तहत निर्धारित सीमा के भीतर अवमानना याचिका दायर की जानी चाहिए थी।”

कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने अपनी मुख्य याचिकाओं में कहीं भी कारण के लगातार बने रहने का उल्लेख नहीं किया था और न ही समय सीमा से छूट पाने के आधार के संबंध में कोई तथ्य पेश किए थे।

तिरुपति नगर निगम की रिट याचिका संख्या 3322/2024 के खारिज होने का लाभ याचिकाकर्ता को मिलने की दलील पर पीठ ने कहा कि यह दो वजहों से याचिकाकर्ता की मदद नहीं कर सकता। पहला, अनुपालन का निर्देश 22 जुलाई 2022 को तीन महीने की समय सीमा के साथ दिया गया था, जिसका मतलब है कि सीमा अवधि बहुत पहले समाप्त हो चुकी थी। पीठ ने रेखांकित किया:

“यह अच्छी तरह से स्थापित है कि एक बार जब सीमा की अवधि शुरू हो जाती है, तो यह अपना पूरा चक्र पूरा करती है।”

दूसरा, रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि रिट कोर्ट के 22 जुलाई 2022 के आदेश पर इस बाद की मुकदमेबाजी के दौरान कभी भी रोक लगाई गई थी या उसे स्थगित रखा गया था।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य फैसले तमिलनाडु सरकार के सचिव बनाम एस. राजा (2026 SCC OnLine SC 659) का भी संदर्भ लिया, जिसमें ऐतिहासिक फैसले पल्लव शेठ बनाम कस्टोडियन (2001) 7 SCC 549 का हवाला देते हुए दोहराया गया था कि अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की समय सीमा कथित अवमानना के दिन से ठीक एक वर्ष है।

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कोर्ट का निर्णय

याचिका को पूरी तरह से समय सीमा से बाधित (बार्ड बाई लिमिटेशन) पाते हुए हाईकोर्ट ने अवमानना याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने इस मामले में दोनों पक्षों के लिए कोई शुल्क या हर्जाना तय नहीं किया और सभी लंबित विविध आवेदनों को भी बंद कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: एस. जनार्दन बनाम श्री अनिल कुमार सिंघल और अन्य
वाद संख्या: अवमानना मामला संख्या 3541/2024
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस सुभेंदु सामंत
निर्णय की तिथि: 23.06.2026

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