सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी आरोपी को चार्जशीट (आरोप पत्र) की कॉपी नहीं सौंपी गई है, तो केवल इस आधार पर वह डिफॉल्ट बेल (जमानत) का हकदार नहीं हो जाता। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी द्वारा चार्जशीट की प्रति न दिया जाना, आरोपी को डिफॉल्ट जमानत पर रिहा करने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटेश्वर सिंह की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के एक फैसले को बरकरार रखते हुए यह निर्णय सुनाया। हाईकोर्ट ने साइबर धोखाधड़ी के एक मामले में आरोपी की डिफॉल्ट बेल याचिका को खारिज कर दिया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया है।
नए कानून बीएनएसएस के प्रावधानों पर स्पष्टीकरण
पीठ ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 193(8) के तहत चार्जशीट की अतिरिक्त प्रतियां जमा न करने से मुख्य चार्जशीट अमान्य नहीं हो जाती। कोर्ट ने कहा कि नए कानून बीएनएसएस के तहत भी डिफॉल्ट बेल को लेकर कानूनी स्थिति वैसी ही बनी हुई है जैसी कि पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) में थी।
अदालत के अनुसार, डिफॉल्ट बेल का अधिकार केवल तभी बनता है जब जांच एजेंसी तय समय-सीमा यानी 60 या 90 दिनों के भीतर अदालत में चार्जशीट दाखिल करने में विफल रहती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि निर्धारित समय के भीतर बीएनएसएस की धारा 193(3) के तहत तय प्रारूप में चार्जशीट दाखिल कर दी जाती है, तो आरोपी का डिफॉल्ट बेल पाने का अधिकार खत्म हो जाता है। कोर्ट ने आगे जोड़ा कि धारा 193(8) के तहत होने वाली प्रक्रियात्मक कमियों को धारा 187(3) के उल्लंघन के बराबर नहीं माना जा सकता, जो डिफॉल्ट बेल के नियमों को नियंत्रित करती है।
3.81 करोड़ रुपये की साइबर धोखाधड़ी का मामला
यह पूरा मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दर्ज की गई लगभग 3.81 करोड़ रुपये की एक बड़ी साइबर धोखाधड़ी की जांच से जुड़ा है। सीबीआई का आरोप है कि अज्ञात साइबर अपराधियों ने लोगों को डराने-धमकाने और उनसे जबरन वसूली करने के लिए आधुनिक डिजिटल तकनीकों, पहचान छिपाने (इम्पर्सनेशन) और फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया।
जांच एजेंसी के अनुसार, इस अवैध कमाई को अलग-अलग बैंक खातों में जमा कराने में कुछ बैंक अधिकारियों ने भी अपराधियों की मदद की थी।
हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी
इस मामले में गिरफ्तार किए गए आरोपी ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया था। उसका तर्क था कि हालांकि सीबीआई ने तय समय के भीतर कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी थी, लेकिन उसे इस दस्तावेज की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई थी। इस आधार पर उसने डिफॉल्ट बेल की मांग की थी।
हाईकोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की इस अपील को खारिज करते हुए कहा कि निचली अदालतों का यह निष्कर्ष पूरी तरह सही है कि चार्जशीट की कॉपी न मिलना डिफॉल्ट बेल का वैध आधार नहीं हो सकता।

