अपील लंबित रहने के दौरान ध्वस्तीकरण प्रथम दृष्टया अवैध: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कार्रवाई पर रोक लगाई, एलडीए अधिकारियों से मांगा व्यक्तिगत हलफनामा

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने याचिकाकर्ता कंचन सिंह की संपत्ति के आगे के ध्वस्तीकरण पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी मामले की अपील अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष सक्रिय रूप से लंबित हो, तब ध्वस्तीकरण की कार्रवाई नहीं की जा सकती। जस्टिस पंकज भाटिया और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की पीठ ने यह भी पाया कि लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने केवल याचिकाकर्ता की संपत्ति को निशाना बनाकर पक्षपातपूर्ण कार्रवाई की, जबकि आस-पास के अन्य अवैध निर्माणों को पूरी तरह छोड़ दिया गया। कोर्ट ने एलडीए के वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे शपथ पत्र के माध्यम से इस चुनिंदा कार्रवाई का स्पष्टीकरण दें।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला याचिकाकर्ता कंचन सिंह द्वारा खरीदी गई एक संपत्ति पर किए गए निर्माण से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का कहना था कि चूंकि इस संपत्ति का क्षेत्रफल उस न्यूनतम निर्धारित क्षेत्र से कम था जिसके लिए नक्शा पास कराना अनिवार्य होता है, इसलिए इसके निर्माण के लिए नक्शा स्वीकृत नहीं कराया गया था।

इसके बाद, एलडीए अधिकारियों ने याचिकाकर्ता को ध्वस्तीकरण का नोटिस जारी किया, जिसके बाद 30 नवंबर 2024 को ध्वस्तीकरण का आदेश पारित किया गया। इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने कानून के तहत कमिश्नर (आयुक्त) के समक्ष देरी माफी के आवेदन के साथ एक अपील दायर की। जब अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष इस अपील पर सुनवाई चल रही थी और एलडीए के प्रतिनिधि भी वहां पेश हो रहे थे, उसी दौरान एलडीए ने संपत्ति को ध्वस्त करने की कार्रवाई शुरू कर दी।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील अनुज कुमार गुप्ता और विपुल प्रताप मिश्रा ने दलील दी कि जब कमिश्नर के समक्ष कानूनी अपील पर सुनवाई हो रही थी, तब एलडीए द्वारा ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करना पूरी तरह से अवैध है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्राधिकरण ने केवल याचिकाकर्ता की संपत्ति को निशाना बनाकर चुनिंदा तरीके से ध्वस्तीकरण अभियान चलाया। अपनी बात को साबित करने के लिए याचिकाकर्ता के वकीलों ने सुनवाई के दौरान कुछ तस्वीरें पेश कीं, जिनसे स्पष्ट था कि आस-पास की वैसी ही अन्य संपत्तियों को न तो सील किया गया और न ही उन पर कोई कार्रवाई की गई।

दूसरी ओर, एलडीए की तरफ से पेश वकील श्री रत्नेश चंद्र ने प्राधिकरण की कार्रवाई का बचाव किया। उन्होंने दलील दी कि इस संपत्ति को दो बार सील किया गया था, लेकिन सीलिंग के बावजूद वहां अवैध निर्माण जारी रहा, जिसके कारण ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करनी पड़ी।

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श्री रत्नेश चंद्र ने एलडीए के विशेष कार्याधिकारी (ओएसडी) श्री देवांश त्रिवेदी के निर्देशों का हवाला देते हुए कोर्ट को बताया कि उस क्षेत्र में लगभग 70 लोगों को नोटिस जारी किए गए थे और ध्वस्तीकरण के आदेश भी पारित हुए थे, लेकिन उन संपत्तियों पर कोई वास्तविक ध्वस्तीकरण नहीं किया गया था। श्री देवांश त्रिवेदी ध्वस्तीकरण के समय मौके पर भी मौजूद थे।

कोर्ट का विश्लेषण

पक्षों की दलीलों और तस्वीरों का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि एलडीए की कार्रवाई भेदभावपूर्ण और पक्षपातपूर्ण प्रतीत होती है। पीठ ने टिप्पणी की:

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“प्रथम दृष्टया, याचिकाकर्ता की संपत्ति के खिलाफ चुनिंदा कार्रवाई की गई है और आस-पास की किसी अन्य संपत्ति के खिलाफ ऐसी कोई कार्रवाई की जाती नहीं दिख रही है।”

कोर्ट ने एलडीए के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताते हुए माना कि उसकी कार्रवाई में स्पष्ट रूप से दुर्भावना झलकती है:

“प्रथम दृष्टया, लखनऊ विकास प्राधिकरण की ओर से दुर्भावना स्थापित होती है।”

अन्य संपत्तियों को नोटिस जारी किए जाने के संबंध में एलडीए के वकील के तर्कों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:

“श्री रत्नेश चंद्र द्वारा दी गई दलीलें और व्यक्त की गई संतुष्टि प्रथम दृष्टया केवल वास्तविक मुद्दे से बचने का प्रयास लगती है कि अपील लंबित रहने के दौरान ध्वस्तीकरण नहीं किया जा सकता था, विशेषकर तब जब दोनों पक्ष अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष पेश हो रहे थे।”

कोर्ट का निर्णय

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की संपत्ति के आगे के ध्वस्तीकरण पर अंतरिम रोक लगा दी।

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कोर्ट ने लखनऊ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष (वाइस चेयरमैन) और ओएसडी श्री देवांश त्रिवेदी को निर्देश दिया कि वे तीन सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करके स्पष्ट करें कि आखिर क्यों केवल याचिकाकर्ता की संपत्ति के खिलाफ चुनिंदा कार्रवाई की गई, जबकि बिना नक्शा पास कराए बने आस-पास के अन्य निर्माणों को अछूता छोड़ दिया गया।

इसके अलावा, हाईकोर्ट ने चेतावनी दी कि वह अगली सुनवाई पर ओएसडी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करने पर विचार करेगी। कोर्ट ने आदेश दिया:

“अगली तारीख पर, यह अदालत उत्तर प्रदेश नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 26-डी के तहत श्री देवांश त्रिवेदी के खिलाफ कार्रवाई करने पर विचार करेगी।”

कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद तय की है।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: कंचन सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: रिट-सी संख्या 6683 ऑफ 2026
पीठ: जस्टिस पंकज भाटिया और जस्टिस अमिताभ कुमार राय
निर्णय की तिथि: 24 जून, 2026

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