झारखंड पीड़ित मुआवजा योजना 2016 में मुआवजे की कोई अधिकतम सीमा नहीं; हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पुरुष एसिड अटैक सर्वाइवर को 15 लाख रुपये देने का दिया निर्देश

झारखंड हाईकोर्ट ने जेंडर असमानता और एसिड हमलों के पीड़ितों को होने वाले जीवनभर के दर्दनाक आघात पर एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने एक पुरुष एसिड अटैक सर्वाइवर की अपील दायर करने में हुई 1,374 दिनों की देरी को माफ करते हुए उसे मिलने वाले मुआवजे को 3 लाख रुपये से बढ़ाकर 15 लाख रुपये करने का निर्देश दिया है। जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ‘झारखंड पीड़ित मुआवजा (संशोधन) योजना, 2016’ के तहत मुआवजे की कोई अधिकतम सीमा तय नहीं की गई है। ऐसे में अदालतों के पास पीड़ित को लगी चोटों की गंभीरता के अनुसार अधिक मुआवजा देने का पूरा अधिकार है।

अपीलकर्ता के साथ हुए इस भयानक अपराध और राज्य सरकार के असंवेदनशील रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा:

“अपीलकर्ता/याचिकाकर्ता पर तेजाब से किया गया यह क्रूर, प्रतिगामी और घातक हमला न केवल उनके चेहरे के विरूपण का कारण बना है, बल्कि इससे भी अधिक उनके अंतर्मन को झकझोर कर रख गया है। इसे राज्य की संवेदनशीलता की भारी कमी ने और भी बदतर बना दिया, जिसने एक पुरुष पीड़ित को ऐसा मुआवजा दिया जो उसके द्वारा झेले गए आघात के एक मामूली हिस्से की भी भरपाई नहीं करता, और जिसके निकट भविष्य में भी कम होने की कोई संभावना नहीं है।”

मामले की पृष्ठभूमि

घटना 31 मई 2012 को शाम करीब 4:00 बजे की है। अपीलकर्ता राहुल कुमार अपने कमरे में पढ़ाई कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने बाहर अपने 10 साल के चचेरे भाई और पड़ोस के एक लड़के के बीच झगड़े की आवाज सुनी। जब पड़ोसी लड़के की मां वहां आईं और राहुल के भाई को गालियां देने जैसी भाषा का इस्तेमाल करने लगीं, तो राहुल ने बीच-बचाव किया और उन्हें अपशब्द बोलने से मना किया। इससे नाराज होकर वह महिला अपने घर की तरफ भागी, वहां से तेजाब की एक बोतल लेकर लौटी और राहुल के चेहरे पर सीधे तेजाब फेंक दिया।

घटना के अगले दिन पुलिस ने राहुल का बयान दर्ज किया, जिसके बाद चान्हो थाना में कांड संख्या 55/2012 के तहत भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 307, 326, 304 और 506/34 के तहत मामला दर्ज किया गया।

इस एसिड हमले में राहुल को अत्यंत गंभीर और विनाशकारी चोटें आईं। उनका चेहरा पूरी तरह से बिगड़ गया, पलकें गायब हो गईं, दोनों कान जल गए और कान के कार्टिलेज नष्ट हो गए। इसके अलावा उनकी गर्दन, छाती और बाएं हाथ पर भी तेजाब के गहरे घाव हुए। इलाज के दौरान राहुल को 14 प्लास्टिक सर्जरीज से गुजरना पड़ा, उनकी आंखों की रोशनी का एक बड़ा हिस्सा चला गया और इस पूरे इलाज में 25 लाख रुपये से अधिक का खर्च आया। दवाओं के भारी ओवरडोज और अन्य दुष्प्रभावों के कारण बाद में उन्हें ‘डीजेनेरेटिव लंबर स्पॉन्डिलाइटिस’ (रीढ़ की हड्डी की बीमारी) भी हो गई।

राहुल को शुरुआत में डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (डीएलएसए), रांची के माध्यम से 2016 की योजना के तहत 3 लाख रुपये का मुआवजा मिला था। आगे की निरंतर सर्जरी और पुनर्वास के खर्च के लिए मुआवजे को बढ़ाकर 25 लाख रुपये करने की मांग करते हुए उन्होंने हाईकोर्ट में एक याचिका (डब्ल्यूपीसी संख्या 2683/2018) दायर की थी। हालांकि, 27 नवंबर 2019 को एक सिंगल जज ने उनकी याचिका इस आधार पर खारिज कर दी कि उन्हें योजना के तहत तय 3 लाख रुपये मिल चुके हैं। इसी फैसले के खिलाफ राहुल ने यह लेटर्स पेटेंट अपील (एलपीए) दायर की थी।

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दोनों पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील स्नेह्लिका भगत ने पीड़ित मुआवजे में जेंडर के आधार पर होने वाले भेदभाव को लेकर महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल उठाए। उन्होंने दलील दी कि पुरुष और महिला पीड़ितों के लिए राज्य सरकार द्वारा तय मुआवजे की अधिसूचनाएं अत्यधिक भेदभावपूर्ण और अनुचित हैं, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले ‘जीने के अधिकार’ का उल्लंघन करती हैं। उन्होंने तर्क दिया कि तेजाब फेंकने पर वह किसी का जेंडर देखकर नुकसान नहीं पहुंचाता; शारीरिक क्षति, मानसिक आघात, सामाजिक अलगाव और स्थायी विकलांगता का दर्द हर लिंग के लिए एक समान होता है।

अपील दायर करने में हुई 1,374 दिनों की देरी पर वकील ने दलील दी कि पीड़ित ने ‘मुकदमेबाजी से पहले जीवन को चुना’। उन्होंने कहा कि पीड़ित का परिवार गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रहा था, माता-पिता बूढ़े और बीमार थे, और यह अपील अंततः हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी के माध्यम से दायर की गई। इसके अलावा, अपील दायर करने की समय-सीमा 4 जनवरी 2020 को समाप्त हो रही थी, जो कोविड-19 महामारी का चरम दौर था।

दूसरी ओर, राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे एसोसिएट काउंसिल एम. दुबे ने देरी को माफ करने का कड़ा विरोध किया और इसे बिना किसी पर्याप्त कारण के की गई अत्यधिक देरी बताया। मामले के गुण-दोष पर तर्क देते हुए उन्होंने कहा कि पीड़ित को 2016 की योजना के तहत निर्धारित 3 लाख रुपये का मुआवजा पहले ही दिया जा चुका है, इसलिए सिंगल जज के आदेश में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

अदालत का विश्लेषण और देरी पर फैसला

हाईकोर्ट ने सबसे पहले अपील दायर करने में हुई देरी के मुद्दे पर विचार किया। पीड़ित की गंभीर चिकित्सकीय स्थिति के प्रति पूरी सहानुभूति व्यक्त करते हुए कोर्ट ने माना कि यह देरी लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के तहत ‘पर्याप्त कारण’ के अंतर्गत आती है। बेंच ने टिप्पणी की:

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“इस तरह के मामलों में अपील या आवेदन दाखिल करने में हुई देरी पर पूरी सहानुभूति के साथ विचार किया जाना चाहिए। अदालतें एसिड हमले के शिकार व्यक्ति द्वारा झेले जाने वाले मानसिक तनाव और शारीरिक चोटों की अनदेखी नहीं कर सकती हैं।”

इसके बाद बेंच ने राज्य के मुआवजे के ढांचे का बारीकी से विश्लेषण किया। कोर्ट ने पाया कि झारखंड पीड़ित मुआवजा (संशोधन) योजना, 2016 के तहत एसिड हमले के लिए न्यूनतम मुआवजा 3 लाख रुपये तय है। इस पर टिप्पणी करते हुए बेंच ने कहा:

“वर्ष 2016 की योजना और उसकी अनुसूची में निहित प्रावधानों को सरसरी तौर पर देखने से भी यह स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होता है कि इस प्रकार दिए जाने वाले मुआवजे की कोई अधिकतम सीमा निर्धारित नहीं की गई है।”

कोर्ट ने इसकी तुलना वर्ष 2019 की पीड़ित मुआवजा योजना से की, जिसे सुप्रीम कोर्ट के ‘निपुण सक्सेना बनाम भारत संघ’ मामले में दिए गए फैसले और नाल्सा (NALSA) के दिशानिर्देशों के तहत लागू किया गया था।

2019 की यह योजना केवल महिला पीड़ितों के लिए लागू है, जिसमें चेहरा बिगड़ने पर न्यूनतम 7 लाख और अधिकतम 8 लाख रुपये के मुआवजे का प्रावधान है। बेंच ने दोनों योजनाओं में मौजूद जेंडर भेदभाव को रेखांकित करते हुए कहा कि 2016 की योजना (जो पुरुष पीड़ितों पर लागू होती है) और 2019 की योजना के न्यूनतम मुआवजे में भारी अंतर है। कोर्ट ने बल देकर कहा कि इस भेदभाव को खत्म करने के लिए 2016 की योजना में आवश्यक संशोधन किए जाने चाहिए ताकि पुरुष पीड़ितों को भी समान न्याय मिल सके।

सुप्रीम कोर्ट के ‘परिवर्तन केंद्र बनाम भारत संघ (2016)’ फैसले का हवाला देते हुए बेंच ने दोहराया कि केवल 3 लाख रुपये का मुआवजा स्थायी त्वचा उपचार और पुनर्वास के लिए बेहद नाकाफी है। कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि ‘लक्ष्मी बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों द्वारा 3 लाख रुपये से अधिक मुआवजा देने पर कोई रोक नहीं लगाई थी, बल्कि राज्यों के पास इससे अधिक राशि देने का पूरा अधिकार है।

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हाईकोर्ट का निर्णय और निर्देश

इस बात को स्वीकार करते हुए कि इस घटना के कारण राहुल का चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने का सपना हमेशा के लिए टूट गया, कोर्ट ने कहा कि पीड़ित के पुनर्वास में उसके शारीरिक और मानसिक दर्द को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। कोर्ट ने निर्देश दिया:

“हम इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि शारीरिक और मानसिक पीड़ा तथा दर्द की भरपाई पैसों से नहीं की जा सकती, लेकिन हमारा मानना है कि इससे पीड़ित के मानसिक आघात को कुछ हद तक कम करने में बड़ी मदद मिलेगी और याचिकाकर्ता के पुनर्वास में भी सहायता मिल सकती है।”

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने राहुल के मुआवजे को बढ़ाकर 15 लाख रुपये कर दिया। पहले मिल चुके 3 लाख रुपये को घटाकर, कोर्ट ने राज्य सरकार को शेष 12 लाख रुपये की राशि आठ सप्ताह के भीतर जारी करने का निर्देश दिया।

चिकित्सा खर्चों की प्रतिपूर्ति के संबंध में कोर्ट ने पाया कि इससे पहले एक अवमानना याचिका (कंटेम्प्ट केस संख्या 133/2022) के दौरान राज्य ने कुल 18,21,588 रुपये के दावे में से 4,21,197 रुपये का भुगतान किया था, जबकि कुछ बिलों में विसंगतियों की बात कही गई थी। बेंच ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार विवादित बिलों को लेकर पीड़ित से तुरंत स्पष्टीकरण मांगे और जरूरी दस्तावेज मिलने के चार सप्ताह के भीतर वास्तविक खर्चों की शेष राशि जारी करे।

पीड़ित की भविष्य की सर्जरीज के लिए कोर्ट ने आदेश दिया कि राज्य सरकार को इन बिलों का जल्द से जल्द निपटारा करना होगा। भविष्य के बिल जमा होने पर राज्य सरकार को सीधे संबंधित अस्पताल को भुगतान करना होगा ताकि सर्वाइवर को किसी परेशानी का सामना न करना पड़े।

इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने इस लेटर्स पेटेंट अपील का निपटारा कर दिया और सभी लंबित आवेदनों को बंद कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: राहुल कुमार बनाम झारखंड राज्य और अन्य
वाद संख्या: एल.पी.ए. संख्या 252/2026
पीठ: जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव
निर्णय की तिथि: 19 जून, 2026

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