इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों को बारी-बारी से बदलने (रोटेशन) का कोई अनिवार्य निर्देश नहीं देता है। हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि जिन क्षेत्रों में अनुसूचित जाति/जनजाति की जनसंख्या तुलनात्मक रूप से अधिक है, वहां सीटों को आरक्षित करने का कानूनी प्रावधान पूरी तरह से संवैधानिक है। इसके साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका विधायिका को रोटेशन प्रणाली लागू करने के लिए नया कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकती।
मामले की पृष्ठभूमि
यह याचिका सुलतानपुर जिले की कादीपुर (191) विधानसभा क्षेत्र के निवासी और सामाजिक कार्यकर्ता जगदीश सिंह द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि कादीपुर विधानसभा क्षेत्र पिछले लगभग साठ वर्षों से लगातार अनुसूचित जाति श्रेणी के लिए आरक्षित है। उनका तर्क था कि इस निरंतर आरक्षण के कारण जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 5(a) के तहत वह अपनी पसंद के सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार को वोट देने से वंचित हैं। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि इस व्यवस्था के कारण इस क्षेत्र के मतदाताओं को पीढ़ियों से एक ही वर्ग के उम्मीदवार को वोट देने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। इसी आधार पर उन्होंने 18 दिसंबर 2006 की आरक्षण अधिसूचना और परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) को चुनौती दी थी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह ने तर्क दिया कि हालांकि संविधान का अनुच्छेद 332 राज्य विधानसभाओं में एससी और एसटी के लिए सीटों के आरक्षण को अनिवार्य बनाता है, लेकिन इसमें कहीं भी यह नहीं लिखा है कि सबसे अधिक एससी/एसटी आबादी वाले क्षेत्रों को हमेशा के लिए आरक्षित रखा जाना चाहिए। उन्होंने दलील दी कि उत्तर प्रदेश में कुल 403 विधानसभा सीटों में से 85 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं, लेकिन रोटेशन नीति न होने से गतिरोध पैदा हो गया है। उन्होंने कहा कि पंचायतों और नगर पालिकाओं में रोटेशन प्रणाली लागू है, इसलिए विधानसभा चुनावों में भी ऐसी ही व्यवस्था होनी चाहिए। याचिकाकर्ता ने संविधान सभा की बहसों और राष्ट्रीय संविधान कार्यकरण समीक्षा आयोग (जस्टिस एम.एन. वेंकटचलैया की अध्यक्षता वाले आयोग) की सिफारिशों का भी हवाला दिया, जिसमें आरक्षित सीटों के रोटेशन की वकालत की गई थी।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ओ.पी. श्रीवास्तव ने याचिका की विचारणीयता पर प्रारंभिक आपत्ति जताई। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 329(a) का हवाला देते हुए तर्क दिया कि परिसीमन कानूनों या सीटों के आवंटन को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मेघराज कोठारी बनाम परिसीमन आयोग मामले का संदर्भ देते हुए कहा कि राजपत्र में प्रकाशित परिसीमन आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है। उन्होंने यह भी कहा कि रोटेशन का मुद्दा पूरी तरह नीतिगत मामला है और संविधान स्वयं विधानसभा या लोकसभा सीटों के लिए रोटेशन का कोई प्रावधान नहीं करता।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने सबसे पहले चुनाव आयोग की प्रारंभिक आपत्ति को खारिज करते हुए याचिका को सुनवाई योग्य माना। जस्टिस अमिताभ कुमार राय द्वारा लिखे गए निर्णय में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि यहां परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(c) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है, इसलिए याचिका पर सुनवाई की जा सकती है। इसके लिए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2024 के फैसले किशोरचंद्र छगनलाल राठौड़ बनाम भारत संघ का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि अनुच्छेद 329 पूरी तरह से अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा के अधिकार को नहीं रोकता, विशेषकर तब जब मनमानेपन या संवैधानिक व्याख्या का मामला हो।
इसके बाद मुख्य मुद्दे पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 का विश्लेषण किया। कोर्ट ने पाया कि ये अनुच्छेद आबादी के अनुपात में आरक्षण की बात तो करते हैं, लेकिन आरक्षित की जाने वाली सीटों की पहचान के लिए किसी विशिष्ट पद्धति या रोटेशन का उल्लेख नहीं करते। पंचायतों (अनुच्छेद 243D) और नगर पालिकाओं (अनुच्छेद 243T) के विपरीत, विधानसभा और लोकसभा के लिए कोई रोटेशन प्रणाली संविधान में नहीं लिखी गई है। संसद ने अपनी विशेष विधायी शक्ति (अनुच्छेद 327 और सातवीं अनुसूची की सूची I की प्रविष्टि 72) का उपयोग करते हुए परिसीमन अधिनियम, 2002 लागू किया, जिसके तहत तुलनात्मक रूप से बड़ी आबादी वाले क्षेत्रों में आरक्षित सीटें आवंटित करने की नीति बनाई गई।
याचिकाकर्ता के मतदान के अधिकार के हनन के दावे पर कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की: “मतदान के अधिकार का यह अभिप्राय नहीं है कि कोई मतदाता किसी निर्वाचन क्षेत्र के आवंटन की शर्तें तय कर सकता है या इस बात पर जोर दे सकता है कि कोई क्षेत्र किसी विशेष श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए ही आवंटित किया जाए।” इसके लिए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले राजबाला बनाम हरियाणा राज्य (2016) का संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था कि चुनाव लड़ने और वोट देने के अधिकार को आरक्षण के संवैधानिक जनादेश के साथ सामंजस्य स्थापित करके देखा जाना चाहिए।
समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) के उल्लंघन की दलील पर कोर्ट ने राजबाला और के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2019) के फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि किसी कानून को केवल इसलिए असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसे मनमाना माना जा रहा है। संसद के किसी कानून को केवल दो ही आधारों पर रद्द किया जा सकता है—विधायी क्षमता की कमी या मौलिक अधिकारों व अन्य संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन। परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(c) पर कोर्ट ने टिप्पणी की: “हम यह नहीं पाते कि अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) के तहत उन क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण प्रदान करना, जहां उनकी जनसंख्या का अनुपात तुलनात्मक रूप से अधिक है, किसी प्रत्यक्ष मनमानेपन से ग्रस्त है या इसे अनुचित कहा जा सकता है।”
शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को रेखांकित करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले भारत संघ बनाम देवकी नंदन अग्रवाल (1992) को उद्धृत किया: “अदालत कानून को दोबारा नहीं लिख सकती, उसे नया आकार या नया ढांचा नहीं दे सकती, क्योंकि उसके पास कानून बनाने की शक्ति नहीं है। कानून बनाने की शक्ति अदालतों को प्रदान नहीं की गई है।” न्यायिक दायरे के इस सिद्धांत को मजबूत करने के लिए कोर्ट ने वेमारेड्डी कुमारस्वामी रेड्डी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, सुरेश सेठ बनाम इंदौर नगर निगम, सुप्रीम कोर्ट एम्प्लॉइज वेलफेयर एसोसिएशन बनाम भारत संघ, मनोज शर्मा बनाम राज्य, और उत्तर प्रदेश राज्य बनाम महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड जैसे विभिन्न फैसलों का सहारा लिया।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि संसदीय और विधानसभा सीटों के लिए रोटेशन प्रणाली लागू करना विशुद्ध रूप से विधायी कार्य है। कोर्ट ने कहा: “इस अदालत के अधिकार क्षेत्र में यह नहीं है कि वह अधिनियम, 2002 में इस प्रकार संशोधन करने या नया कानून बनाने का निर्देश जारी करे जिससे विधानसभा/संसदीय क्षेत्रों के लिए आरक्षित सीटों के रोटेशन का वैसा ही प्रावधान किया जा सके जैसा पंचायतों और नगर पालिकाओं आदि के लिए अनुच्छेद 243(D) और 243(T) के तहत दिया गया है; इस विषय पर निर्णय लेने का अधिकार पूरी तरह संसद के पास है।” कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि हालांकि रोटेशन प्रणाली लागू होने से एससी/एसटी वर्ग के उम्मीदवार उन क्षेत्रों से भी निर्वाचित हो सकेंगे जहां उनकी आबादी कम है (जो सामाजिक और राजनीतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुकूल होगा), लेकिन इस पर विचार करना और कानून बनाना पूरी तरह संसद का काम है। अधिनियम में कोई संवैधानिक कमी न पाते हुए हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। इस मामले में किसी भी पक्ष पर कोई हर्जाना नहीं लगाया गया है।
मामले का विवरण
केस शीर्षक: जगदीश सिंह बनाम भारत निर्वाचन आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त के माध्यम से
केस संख्या: रिट-सी संख्या 6153 वर्ष 2011
पीठ: जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय
दिनांक: 22 जून, 2026

