आपराधिक कार्यवाही रद्द करने के लिए ऐसा बचाव साक्ष्य जरूरी जो अभियोजन के मामले को पूरी तरह खारिज कर दे और अकाट्य हो: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी एफआईआर, चार्जशीट या आपराधिक कार्यवाही को रद्द करना केवल तभी कानून सम्मत होगा जब आरोपी द्वारा प्रस्तुत बचाव सामग्री बेहद विश्वसनीय और अकाट्य प्रकृति की हो, जो अभियोजन पक्ष के दावे को पूरी तरह से खारिज करती हो। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने निशांत साहू नामक एक व्यवसायी की याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया। याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर, चार्जशीट और धोखाधड़ी व जालसाजी (आईपीसी की धारा 420, 467 और 34) के तहत शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी।

हाईकोर्ट ने माना कि जब तक रद्द करने के लिए तय किए गए सख्त कानूनी परीक्षण की सभी शर्तें पूरी नहीं होतीं, तब तक आपराधिक मामले को ट्रायल के लिए भेजा जाना ही सही कानूनी विकल्प है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता निशांत साहू ‘मेसर्स साईं नाथ एंटरप्राइजेस’ का प्रोप्राइटर था। उसने कोयला और कोक के व्यापार के लिए 2 अक्टूबर 2013 को छत्तीसगढ़ मूल्य संवर्धित कर (VAT) अधिनियम, 2005 के तहत अपना रजिस्ट्रेशन कराया था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि कई रजिस्टर्ड डीलरों ने याचिकाकर्ता की फर्म के नाम पर जारी किए गए फर्जी बिलों का उपयोग करके गलत तरीके से इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा किया था।

विभाग के सॉफ्टवेयर और ऑनलाइन रिकॉर्ड के अनुसार, जहां एक ओर याचिकाकर्ता ने अपने वैट रिटर्न में लगभग 47.37 लाख रुपये की बिक्री दिखाई थी, वहीं दूसरी ओर विभागीय ऑनलाइन पोर्टल पर यह लेनदेन लगभग 356.25 लाख रुपये का दिखाई दे रहा था। इस भारी अंतर के कारण आरोप लगाया गया कि राज्य के खजाने को लगभग 17.81 लाख रुपये का नुकसान पहुंचाकर टैक्स चोरी करने के उद्देश्य से फर्जी बिल तैयार किए गए थे।

इसके बाद, 27 जून 2014 को बिलासपुर के सिविल लाइंस थाने में याचिकाकर्ता के खिलाफ एफआईआर (अपराध क्रमांक 361/2014) दर्ज की गई। लंबी जांच के बाद पुलिस ने 16 जुलाई 2025 को कोर्ट में चार्जशीट पेश की। बिलासपुर के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने 23 जुलाई 2025 को इस मामले का संज्ञान लिया और बाद में 6 नवंबर 2025 को आईपीसी की धारा 420, 467 और 34 के तहत आरोप तय किए, जिन्हें हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

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पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील अतुल कुमार केशरवानी ने तर्क दिया कि यदि सभी आरोपों को स्वीकार भी कर लिया जाए, तो भी यह मामला छत्तीसगढ़ वैट अधिनियम, 2005 के उल्लंघन से संबंधित है। यह एक विशेष वित्तीय कानून है जिसमें टैक्स निर्धारण, निर्णय और जुर्माने के लिए एक विशेष प्रक्रिया दी गई है। उन्होंने दलील दी कि वैट अधिनियम के तहत अपराध जमानती हैं, इसलिए इस मामले में धोखाधड़ी और जालसाजी की आईपीसी की धाराओं को लागू करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि वैट अधिनियम की धारा 22 के तहत वास्तविक टैक्स देनदारी तय करने के लिए कोई दोबारा मूल्यांकन (रिअसेसमेंट) नहीं किया गया था, और न ही एफआईआर दर्ज करने से पहले किसी सक्षम प्राधिकारी से कोई अनुमति ली गई थी। इसके अलावा, वकील ने दलील दी कि जांच पूरी होने में लगभग 11 साल की अत्यधिक देरी हुई, जिससे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत याचिकाकर्ता के त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन हुआ है। याचिकाकर्ता ने गवाहों के बयानों का हवाला देते हुए यह भी दावा किया कि कोई अन्य व्यक्ति ‘सोनू उर्फ पीयूष सिंह’ इन फर्जी बिलों का असली मास्टरमाइंड था, और कथित टैक्स का भुगतान पहले ही किया जा चुका है।

दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील सौम्य राय (डिप्टी गवर्नमेंट एडवोकेट) ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने बताया कि यह एफआईआर कमर्शियल टैक्स ऑफिसर, बिलासपुर की लिखित शिकायत पर दर्ज की गई थी। जांच से पता चला कि याचिकाकर्ता और सह-आरोपी सोनू उर्फ पीयूष सिंह ने मिलकर व्यापारियों को अवैध रूप से इनपुट टैक्स क्रेडिट दिलाने के लिए फर्जी इनवॉइस तैयार किए थे।

जांच में हुई देरी पर स्पष्टीकरण देते हुए सरकारी वकील ने कहा कि एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद याचिकाकर्ता फरार हो गया था और राज्य से बाहर चला गया था। उसे काफी प्रयासों के बाद 29 मई 2025 को पुणे, महाराष्ट्र से मोबाइल लोकेशन के आधार पर गिरफ्तार किया गया। वहीं सह-आरोपी सोनू उर्फ पीयूष सिंह अभी भी फरार है। उन्होंने तर्क दिया कि इन विवादित तथ्यों की सच्चाई का फैसला ट्रायल के दौरान होना चाहिए, न कि एफआईआर रद्द करने की याचिका में।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 (जो पहले सीआरपीसी की धारा 482 थी) के तहत अंतर्निहित शक्तियों के इस्तेमाल से जुड़े सिद्धांतों की समीक्षा की। सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों, जिनमें रूपन देओल बजाज बनाम के.पी.एस. गिल, राजेश बजाज बनाम एनसीटी दिल्ली सरकार, और मेडचल केमिकल्स एंड फार्मा बनाम बायोलॉजिकल ई लिमिटेड शामिल हैं, का हवाला देते हुए बेंच ने दोहराया कि यदि प्रथम दृष्टया कोई मामला बनता है, तो अदालतों को कार्यवाही रद्द नहीं करनी चाहिए।

कोर्ट ने नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य और प्रदीप कुमार केशरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (जिसमें राजीव थापर बनाम मदन लाल कपूर मामले के चार-चरणीय परीक्षण को शामिल किया गया है) का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने जोर दिया कि हाईकोर्ट किसी मामले की शुरुआत में ही मिनी-ट्रायल नहीं चला सकता और न ही आरोपों की सच्चाई का मूल्यांकन कर सकता है।

वैट अधिनियम के विशेष कानून होने और आईपीसी की धाराएं न लगने की याचिकाकर्ता की दलील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“यह पूरी तरह से स्थापित है कि केवल इसलिए कि किसी लेन-देन के दीवानी, व्यावसायिक या वित्तीय प्रभाव हैं, आपराधिक कार्यवाही तब तक अस्वीकार्य नहीं हो जाती जब तक कि आरोप प्रथम दृष्टया किसी आपराधिक अपराध के तत्वों को प्रकट करते हैं।”

हाईकोर्ट ने पाया कि यह मामला महज किसी टैक्स संबंधी अनियमितता का नहीं था, बल्कि फर्जी बिलों और कागजी लेन-देन की एक सोची-समझी प्रणाली से जुड़ा था। जांच में देरी को लेकर कोर्ट ने पुलिस की इस दलील को स्वीकार किया कि याचिकाकर्ता फरार चल रहा था। कोर्ट ने कहा:

“जांच में केवल देरी, अपने आप में, आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का आधार नहीं हो सकती है जब जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराधों के होने का खुलासा करती है।”

याचिकाकर्ता द्वारा गवाहों के बयानों और टैक्स के भुगतान की दलील पर टिप्पणी करते हुए बेंच ने स्पष्ट किया कि:

“हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए ट्रायल कोर्ट के रूप में कार्य नहीं करता है और जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री की सत्यता, विश्वसनीयता या स्वीकार्यता की विस्तृत या अनौपचारिक जांच नहीं कर सकता है।”

हाईकोर्ट का निर्णय

डिवीजन बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोप न तो पूरी तरह से असंभव थे और न ही बेबुनियाद। इसलिए, यह मामला आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की सख्त कानूनी शर्तों को पूरा नहीं करता है।

नतीजतन, हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया और एफआईआर, चार्जशीट, संज्ञान लेने के आदेश या आरोपों को तय करने की प्रक्रिया को रद्द करने से इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां केवल इस याचिका के निपटारे तक ही सीमित हैं और इन्हें ट्रायल के दौरान मामले के गुण-दोष पर कोर्ट की राय नहीं माना जाना चाहिए।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: निशांत साहू बनाम छत्तीसगढ़ राज्य

वाद संख्या: सीआरएमपी संख्या 1451 वर्ष 2026
पीठ: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल
निर्णय की तिथि: 16.06.2026

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