जस्टिस ए.एम. सपरे ने 20 लाख रुपये की फीस लेने से किया इनकार, सुप्रीम कोर्ट ने यह राशि चाय बागान मजदूरों की विधवाओं को देने का आदेश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने एक मानवीय पहल करते हुए तमिलनाडु, केरल और असम की सरकारों को निर्देश दिया है कि वे 20 लाख रुपये की वह राशि, जो सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस ए.एम. सपरे को पारिश्रमिक के रूप में दी जानी थी, उन विधवाओं को वितरित करें जिनके पति चाय बागानों में काम करते हुए दिवंगत हो गए और जो गंभीर आर्थिक तंगी का सामना कर रही हैं।

यह निर्देश न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भूयान की पीठ ने उस लंबित मामले की सुनवाई के दौरान दिया, जो चाय बागान मजदूरों के बकाया भुगतान से संबंधित है। पीठ ने यह उल्लेख करते हुए गहरी सराहना व्यक्त की कि जस्टिस सपरे ने यह राशि स्वीकार करने से इनकार कर दिया है और इसे ज़रूरतमंद परिवारों को देने की इच्छा जताई है।

कोर्ट के आदेश में कहा गया, “जस्टिस ए.एम. सपरे, इस अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, ने इस अदालत द्वारा निर्देशित राशि को स्वीकार करने में असमर्थता जताई है, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि यह एक विशेष उद्देश्य के लिए थी। हम उनके इस भाव को अत्यंत सराहते हैं और उनके जज़्बे का सम्मान करते हैं।”

कोर्ट ने संबंधित राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे अमीकस क्यूरी सीनियर एडवोकेट गौरव अग्रवाल की सहायता से ऐसे मामलों की पहचान करें, जहां चाय बागानों में काम करने वाले दिवंगत मजदूरों की विधवाएं बेहद कठिन परिस्थिति में हैं। यह राशि विशेष रूप से उन परिवारों को दी जाएगी जिनकी स्थिति अत्यधिक गंभीर है, जैसे कि जिनके घरों में केवल कन्या संतानें हैं। न्यायमूर्ति ओका ने कहा कि “कुछ विशेष मामलों” को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यह निर्देश पश्चिम बंगाल पर भी लागू होगा, जब वहां की रिपोर्ट दाखिल हो जाएगी।

यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के 17 अप्रैल 2025 के उस निर्देश के बाद आया है, जिसमें पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम की सरकारों को जस्टिस सपरे को उनके कार्य के लिए 5-5 लाख रुपये की एकमुश्त सम्मान राशि देने का निर्देश दिया गया था।

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यह मामला वर्ष 2006 से चला आ रहा है, जब इंटरनेशनल यूनियन ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चरल वर्कर्स ने मजदूरों को वेतन और लाभों के भुगतान के लिए याचिका दायर की थी। 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने भुगतान के निर्देश दिए थे, लेकिन अनुपालन न होने पर 2012 में अवमानना की कार्यवाही शुरू हुई।

2020 में कोर्ट ने 127 करोड़ रुपये की अंतरिम राहत दी और जस्टिस सपरे को एकल सदस्यीय समिति के रूप में नियुक्त किया गया, जिन्होंने मजदूरों की बकाया राशि की गणना की। समिति की रिपोर्ट के अनुसार, 414.73 करोड़ रुपये मजदूरों को और 230.69 करोड़ रुपये भविष्य निधि विभाग को देने योग्य थे।

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इसके बाद, 2023 में कोर्ट ने असम टी कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ATCL) समेत 25 चाय बागानों के 28,556 मजदूरों को कुल 645 करोड़ रुपये भुगतान करने का निर्देश दिया। असम सरकार ने 9 दिसंबर 2024 को शपथपत्र देकर शेष 70 करोड़ रुपये देने की बात कही।

सुप्रीम कोर्ट के इस हालिया आदेश में जहां जस्टिस सपरे की निःस्वार्थ सेवा को मान्यता दी गई, वहीं यह भी सुनिश्चित किया गया कि वर्षों से न्याय का इंतजार कर रहे हजारों चाय मजदूरों और उनके परिवारों के हितों की रक्षा की जाए।

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