भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सेवा कानून (सर्विस लॉ) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि कोई नियोक्ता (इम्प्लॉयर) किसी प्रोबेशनरी कर्मचारी (परिवीक्षाधीन कर्मचारी) की सेवाओं को समाप्त करने के लिए ‘असंतोषजनक प्रदर्शन’ को एक ढाल या मुखौटे के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकता, जब सेवा समाप्ति का वास्तविक आधार उसका कथित कदाचार (मिसकंडक्ट) हो। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने बैंक ऑफ बड़ौदा (जिसमें पूर्ववर्ती विजया बैंक का विलय हो चुका है) द्वारा दायर की गई अपील को खारिज कर दिया। बैंक ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें हाईकोर्ट ने बैंक के असिस्टेंट जनरल मैनेजर (नेटवर्किंग) के पद पर तैनात एक प्रोबेशनर कर्मचारी की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया था। इस कर्मचारी को कदाचार के आरोपों के चलते पहले निलंबित किया गया था, लेकिन बाद में बिना किसी औपचारिक अनुशासनात्मक जांच के प्रोबेशन अवधि के दौरान ही सेवा से हटा दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
अशोक कुमार सिंह को 5 जनवरी, 2004 को एक साल की प्रोबेशन अवधि पर असिस्टेंट जनरल मैनेजर (एजीएम), नेटवर्किंग के पद पर नियुक्त किया गया था। संतोषजनक कार्य और आचरण के आधार पर इस अवधि को अधिकतम एक वर्ष के लिए और बढ़ाया जा सकता था। उनका पहला साल पूरा होने पर उन्हें स्थाई (कंफर्म) नहीं किया गया।
15 जनवरी, 2005 को बैंक ने अशोक कुमार सिंह को निलंबित कर दिया। उन पर आरोप था कि उन्होंने अपने ऑफिस के केबिन से ‘मैनेजेबल स्विच टेंडर’ से जुड़ी बेहद गोपनीय फाइलों के चार बक्से अपने ड्राइवर की मदद से बिना अनुमति के बाहर ले जाने की कोशिश की। इसके बाद, असंतोषजनक कार्य का हवाला देते हुए 16 फरवरी, 2005 को उनके प्रोबेशन को छह महीने के लिए बढ़ा दिया गया।
बाद में बैंक ने स्थिति की समीक्षा की और 12 अप्रैल, 2005 को सिंह का निलंबन इस शर्त के साथ वापस ले लिया कि बैंक के पास उनके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक जांच शुरू करने का अधिकार सुरक्षित रहेगा। इसके बाद उन्होंने फिर से काम संभाला और उन्हें कोलकाता के रीजनल ऑफिस में ट्रांसफर कर दिया गया। 4 जुलाई, 2005 को उनकी प्रोबेशन अवधि को एक बार फिर छह महीने के लिए बढ़ा दिया गया। अंततः, 5 नवंबर, 2005 को बैंक ने विजया बैंक (ऑफिसर्स) रेगुलेशंस, 1982 के रेगुलेशन 16(3)(ए) के तहत सिंह के काम को असंतोषजनक बताते हुए उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं।
सिंह ने इस फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने इस बर्खास्तगी को अनुचित और अप्रासंगिक तथ्यों पर आधारित बताते हुए रद्द कर दिया। बाद में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने भी इस फैसले को सही ठहराया, जिसके बाद बैंक ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
बैंक ऑफ बड़ौदा की ओर से उपस्थित एडिशनल सॉलिसिटर जनरल, श्री विक्रमजीत बनर्जी ने दलील दी कि नियोक्ता को प्रोबेशन अवधि के दौरान किसी भी कर्मचारी की उपयुक्तता परखने और बिना कोई कारण बताए सामान्य रूप से उसकी सेवा समाप्त करने का पूरा अधिकार है। उन्होंने तर्क दिया कि प्रोबेशन के दौरान कर्मचारी द्वारा किया गया कोई भी कथित कदाचार सेवा समाप्ति का ‘प्रेरक’ (मोटिव) तो हो सकता है, लेकिन वह सेवा समाप्ति का ‘आधार’ (फाउंडेशन) नहीं था। उन्होंने आगे कहा कि प्रोबेशन पर काम कर रहे कर्मचारी को उस पद पर बने रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं होता और सेवा समाप्ति से पहले सुनवाई का अवसर पाने का भी कोई दावा नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि अशोक कुमार सिंह को सुधार के कई मौके दिए गए थे और बैंक के पास गोपनीय रिपोर्ट व मेमो के रूप में पर्याप्त सामग्री मौजूद थी, जिससे साबित होता था कि उनका प्रदर्शन असंतोषजनक था।
दूसरी ओर, प्रतिवादी अशोक कुमार सिंह की तरफ से पेश सीनियर वकील, श्री पी.एस. पटवालिया ने दलील दी कि सिंह के काम में किसी भी प्रकार की कमी दिखाने वाला कोई वास्तविक सबूत रिकॉर्ड पर नहीं था। बैंक ने उनके प्रदर्शन को खराब दिखाने के लिए मुख्य रूप से तीन मेमो (दिनांक 23 जुलाई 2005, 14 सितंबर 2005 और 31 अक्टूबर 2005) का सहारा लिया था।
श्री पटवालिया ने स्पष्ट किया कि 23 जुलाई वाले मेमो में ऑनलाइन टैक्स अकाउंटिंग सिस्टम यानी ओल्टास (OLTAS) के क्रियान्वयन को लेकर कमी निकाली गई थी, जबकि इस मेमो के जारी होने से ठीक एक हफ्ते पहले ही भारत सरकार ने ओल्टास के क्रियान्वयन में सिंह के काम की ‘सराहनीय’ कहकर प्रशंसा की थी। इसी तरह, 14 सितंबर के मेमो में एक वित्तीय लेनदेन में हुई देरी के लिए सिंह को जिम्मेदार ठहराया गया था, जबकि बाद में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) ने लिखित रूप में स्वीकार किया कि वह देरी उनके अपने तकनीकी फॉल्ट के कारण हुई थी। जहां तक 31 अक्टूबर के तीसरे मेमो का सवाल है, वह मेमो सिंह को कभी भेजा ही नहीं गया था। उन्होंने दलील दी कि जनवरी 2005 के निलंबन वाले मामले का बदला लेने के लिए बैंक ने साजिश के तहत सिंह को सेवा से हटाने के लिए यह झूठा आधार तैयार किया था।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने 1982 के रेगुलेशंस के रेगुलेशन 16(3)(ए) की जांच की और माना कि भले ही सक्षम प्राधिकारी को प्रोबेशनर की उपयुक्तता का आकलन करने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार “पूर्ण और असीमित” नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियोक्ता का व्यक्तिगत संतोष हमेशा वस्तुनिष्ठ तथ्यों और रिकॉर्ड पर आधारित होना चाहिए, और यह किसी भी तरह से मनमाना या दुर्भावनापूर्ण नहीं हो सकता।
एक सामान्य सेवा समाप्ति और अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में की गई सेवा समाप्ति के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने सरिता चौधरी बनाम हाईकोर्ट ऑफ एम.पी. (2025) के हालिया फैसले का संदर्भ दिया और टिप्पणी की:
“बिना किसी कदाचार (मिसकंडक्ट) के निष्कर्ष के भी, परिवीक्षा (प्रोबेशन) अवधि के दौरान कर्तव्यों के निर्वहन से संबंधित प्रतिकूल टिप्पणियों का मूल्यांकन और ऐसी टिप्पणियों या मूल्यांकन के आधार पर की गई सेवा समाप्ति वास्तव में दंड के समान होगी, क्योंकि ऐसी टिप्पणियां या मूल्यांकन कर्मचारी की प्रतिष्ठा पर दाग (कलंक) लगाते हैं।”
कोर्ट ने बैंक द्वारा पेश किए गए तीनों मेमो की समीक्षा की और पाया कि उनके पास सिंह के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं था:
- 23 जुलाई, 2005 का मेमो: कोर्ट ने बैंक के आंतरिक मेमो और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी), वित्त मंत्रालय के प्रशंसा पत्र के बीच बड़े विरोधाभास को रेखांकित किया। सीबीडीटी ने दूसरे बैंकों को भी ओल्टास लागू करने में सिंह की मदद लेने की सलाह दी थी। कोर्ट ने माना कि यह मेमो बाहरी और अप्रासंगिक कारणों से जारी किया गया था।
- 14 सितंबर, 2005 का मेमो: कोर्ट ने पाया कि बैंक हस्तांतरण में हुई देरी पूरी तरह से एसबीआई के तकनीकी कारणों से हुई थी, जिसे एसबीआई ने खुद लिखित में स्वीकार किया था। सिंह ने इस देरी के लिए एसबीआई से ब्याज वसूलने के लिए भी सक्रिय रूप से प्रयास किए थे।
- 31 अक्टूबर, 2005 का मेमो: कोर्ट ने माना कि चूंकि यह मेमो कर्मचारी को कभी भेजा ही नहीं गया था, इसलिए इसके आधार पर की गई कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है।
इसके बाद कोर्ट ने 5 नवंबर, 2005 के बैंक के आंतरिक ऑफिस नोट का गहराई से निरीक्षण किया। इस नोट से पता चला कि केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) ने शुरू में टेंडर फाइलों से जुड़े मामले में सिंह के खिलाफ बड़ी पेनल्टी वाली विभागीय जांच शुरू करने की सिफारिश की थी। हालांकि, चूंकि सिंह प्रोबेशन पर थे, इसलिए बैंक ने विभागीय जांच की जटिल प्रक्रिया से बचने का रास्ता चुना और सीवीसी से सिंह को रेगुलेशन 16(3)(ए) के तहत सीधे प्रशासनिक आदेश से हटाने की अनुमति मांग ली।
कोर्ट ने दीप्ति प्रकाश बनर्जी बनाम सत्येंद्र नाथ बोस नेशनल सेंटर फॉर बेसिक साइंसेज (1999) और मैथ्यू पी. थॉमस बनाम केरल स्टेट सिविल सप्लाई कॉर्पोरेशन लिमिटेड (2003) जैसे प्रमुख कानूनी मिसालों का हवाला देते हुए निष्कर्ष निकाला कि कथित कदाचार ही वास्तव में सिंह को सेवा से हटाने का असली प्रेरक और आधार था।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बैंक ने कथित कदाचार के लिए आवश्यक विभागीय जांच की प्रक्रिया से बचने के लिए असंतोषजनक प्रदर्शन की आड़ में सिंह को नौकरी से निकाल दिया।
हाईकोर्ट के आदेशों को बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:
“यद्यपि इसमें कोई संदेह नहीं है कि एक नियोक्ता के पास वास्तविक अक्षमता के आधार पर सेवाएं समाप्त करने का अधिकार सुरक्षित रहता है, लेकिन कानून ‘असंतोषजनक प्रदर्शन’ का मुखौटा पहनकर औपचारिक अनुशासनात्मक कार्यवाही से बचने की अनुमति नहीं देता है। कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि जो काम प्रत्यक्ष रूप से नहीं किया जा सकता, उसे परोक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भी नहीं किया जा सकता।”
कोर्ट ने माना कि बैंक ने जानबूझकर जांच से बचते हुए बिना किसी पुख्ता सबूत के असंतोषजनक प्रदर्शन का बहाना बनाकर सिंह की सेवाएं समाप्त कीं, जिससे यह बर्खास्तगी आदेश कानूनी रूप से पूरी तरह अमान्य हो जाता है।
इन निष्कर्षों के आधार पर कोर्ट ने निर्देश दिया कि अशोक कुमार सिंह अपनी बर्खास्तगी की तारीख से लेकर अपनी सेवानिवृत्ति (सुपरएनुएशन) की तिथि तक 50 प्रतिशत बैकवेजेस (पिछले वेतन) और सभी काल्पनिक (नोशनल) परिणामी लाभों के हकदार होंगे। कोर्ट ने बैंक ऑफ बड़ौदा को इस आदेश का पालन करने और तीन महीने के भीतर सभी बकाए का भुगतान करने का निर्देश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: जनरल मैनेजर, बैंक ऑफ बड़ौदा और अन्य बनाम अशोक कुमार सिंह और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 4814/2017
पीठ: जस्टिस जे.के. माहेश्वरी, जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
निर्णय की तिथि: 29 मई, 2026

