पिन कोड न होना बहाना नहीं: मनी ऑर्डर में 62 दिन की देरी पर उपभोक्ता अदालत ने डाक विभाग पर लगाया जुर्माना, कहा— ‘यह मानसिक उत्पीड़न है’

सरकारी सेवाओं में लापरवाही और ढुलमुल रवैये को लेकर महाराष्ट्र की एक उपभोक्ता अदालत ने डाक विभाग को कड़ी फटकार लगाई है। छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने साफ किया है कि महज पिन कोड न होने की वजह से किसी जरूरतमंद को भेजी जाने वाली आर्थिक मदद में दो महीने की देरी को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।

आयोग ने एक 80 वर्षीय सेवानिवृत्त बुजुर्ग की शिकायत पर सुनवाई करते हुए डाक विभाग को सेवा में कमी का दोषी पाया। कोर्ट ने डाक अधिकारियों को आदेश दिया है कि वे पीड़ित को ₹3,000 का मुआवजा और अदालती खर्च के रूप में ₹2,000 का भुगतान करें। आयोग ने माना कि इस देरी की वजह से भेजने वाले भाई और पाने वाली विधवा बहन, दोनों को गंभीर मानसिक प्रताड़ना और आर्थिक तंगी से गुजरना पड़ा।

बहन की मदद के लिए भेजे थे पैसे, पर समय पर नहीं मिली राहत

यह पूरा मामला अक्टूबर 2022 का है। औरंगाबाद के रहने वाले बुजुर्ग सुधाकर मोनीराज दिवाते अपनी विधवा बहन प्रमिला महाजन की नियमित रूप से आर्थिक मदद करते थे। जलगांव जिले में रहने वाली प्रमिला पूरी तरह से अपने भाई द्वारा भेजी जाने वाली इस मदद पर निर्भर थीं, जिससे उनके घर का राशन और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होती थीं।

दिवाते ने 14 अक्टूबर 2022 को सिडको (CIDCO) डाकघर के माध्यम से ₹1,000 का एक इलेक्ट्रॉनिक मनी ऑर्डर (EMO) भेजा और इसके लिए ₹50 का सेवा शुल्क भी चुकाया। उम्मीद थी कि यह राशि कुछ ही दिनों में उनकी बहन तक पहुँच जाएगी। लेकिन जब काफी समय बीत जाने के बाद भी पैसे नहीं पहुंचे, तो दिवाते परेशान हो गए। उन्होंने कई बार डाकघर के चक्कर काटे, लेकिन अधिकारियों ने उन्हें कोई ठोस जानकारी नहीं दी और एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर दौड़ाते रहे। आखिरकार, यह मनी ऑर्डर 15 दिसंबर 2022 को जाकर डिलीवर हुआ—यानी पूरे 62 दिनों के लंबे इंतजार के बाद।

डाक विभाग की ‘पिन कोड’ वाली दलीलें खारिज

दिसंबर 2022 में दिवाते ने सिडको और पाचोरा डाक प्रभाग के मुख्य पोस्टमास्टरों के खिलाफ उपभोक्ता शिकायत दर्ज कराई। इसके जवाब में डाक विभाग ने स्वीकार किया कि डिलीवरी में देरी हुई थी, लेकिन इसके लिए उन्होंने भेजने वाले को जिम्मेदार ठहराया। डाक विभाग का कहना था कि पते पर पिन कोड नहीं लिखा था, जिसकी वजह से असमंजस की स्थिति पैदा हुई क्योंकि नेटवर्क में एक जैसे नाम वाले दो अलग-अलग स्थान थे। उन्होंने दावा किया कि इस वजह से मनी ऑर्डर गलत शाखा में चला गया और उसे वापस मंगाकर सही पते पर भेजने व तकनीकी समस्याओं को ठीक करने में वक्त लगा।

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विभाग ने भारतीय डाकघर अधिनियम, 1898 की धारा 48 के तहत अधिकारियों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा (इम्युनिटी) का भी सहारा लिया, जो अनजाने में हुई गलतियों या सामान्य देरी के मामलों में डाक कर्मचारियों को संरक्षण देती है।

हालांकि, आयोग की अध्यक्ष प्रज्ञा देवेंद्र हेंद्रे, सदस्य गणेशकुमार आर. सेलुकर और जान्हवी ए. भिड़े की पीठ ने विभाग के इन तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया। आयोग ने ट्रैकिंग रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि मनी ऑर्डर बुकिंग के पहले ही दिन डाक विभाग के सिस्टम में पहुँच गया था।

पीठ ने अपने फैसले में कहा, “पते पर केवल पिन कोड न होने को 62 दिनों की देरी का आधार नहीं बनाया जा सकता, खासकर तब जब बाकी का पूरा पता बिल्कुल सही था।” आयोग ने टिप्पणी की कि सही पते से सही पिन कोड का पता लगाना डाक विभाग के प्रशिक्षित कर्मचारियों के लिए कोई मुश्किल काम नहीं था। अगर पिन कोड न होने से कोई दिक्कत आनी भी थी, तो उससे महज दो-चार दिनों की देरी जायज हो सकती थी, न कि दो महीने की। तकनीकी गड़बड़ी के दावों पर भी विभाग कोई ठोस सुबूत पेश नहीं कर सका।

डाक विभाग को नहीं मिलेगी अंधाधुंध कानूनी सुरक्षा

डाक विभाग द्वारा कानूनी सुरक्षा (इम्युनिटी) की मांग किए जाने पर उपभोक्ता आयोग ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के 2019 के एक ऐतिहासिक फैसले (अधीक्षक डाकघर बनाम शशाधर पांडा) का हवाला दिया। उस मामले में स्पष्ट किया गया था कि डाकघर अधिनियम अधिकारियों को किसी भी तरह की लापरवाही के लिए असीमित सुरक्षा प्रदान नहीं करता है। अधिकारियों को अदालत के सामने यह साबित करना होगा कि देरी के पीछे की वास्तविक और अपरिहार्य वजह क्या थी और उसे दूर करने के लिए क्या प्रयास किए गए थे। चूंकि इस मामले में विभाग अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल रहा, इसलिए इसे प्रशासनिक लापरवाही माना गया।

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कोर्ट का अंतिम फैसला

उपभोक्ता आयोग ने सिडको और पाचोरा डाक संभाग के मुख्य पोस्टमास्टरों को संयुक्त रूप से दोषी मानते हुए पीड़ित के पक्ष में फैसला सुनाया। आयोग ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए हैं:

  • पीड़ित बुजुर्ग को मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना के लिए ₹3,000 का मुआवजा दिया जाए।
  • कानूनी लड़ाई के खर्च (मुकदमा लागत) के रूप में ₹2,000 का भुगतान किया जाए।

डाक विभाग को इस आदेश का पालन करने के लिए 45 दिनों का समय दिया गया है। यदि वे तय समय सीमा के भीतर भुगतान नहीं करते हैं, तो उन्हें पीड़ित को ₹2,000 की अतिरिक्त जुर्माना राशि देनी होगी। वहीं, भारत संचार/डाक विभाग के तकनीकी सेवा से जुड़े प्रोजेक्ट मैनेजर के खिलाफ दर्ज शिकायत को आयोग ने खारिज कर दिया, क्योंकि उनके और शिकायतकर्ता के बीच कोई सीधा उपभोक्ता संबंध नहीं पाया गया।

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