सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए एक लंबे समय से विवादित वैवाहिक संबंध को समाप्त कर दिया। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट तथा फैमिली कोर्ट के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें पति की तलाक याचिका खारिज कर दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि यह विवाह अब व्यावहारिक रूप से पूरी तरह समाप्त हो चुका है और इसे केवल न्यायिक आदेशों के माध्यम से जारी नहीं रखा जा सकता।
कोर्ट ने तलाक की डिक्री जारी करते हुए पत्नी के पक्ष में व्यापक वित्तीय व्यवस्था भी सुनिश्चित की। इसके तहत पति को दो माह के भीतर 60 लाख रुपये अतिरिक्त भुगतान करने का निर्देश दिया गया, जबकि सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा 68 लाख रुपये तथा उस पर अर्जित ब्याज भी पत्नी को जारी करने का आदेश दिया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद की शुरुआत आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा 26 सितंबर 2014 को पारित उस निर्णय से हुई थी, जिसमें पति की तलाक याचिका खारिज किए जाने के फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा गया था। इसके खिलाफ पति ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिकाएं दायर की थीं, जिन्हें बाद में सिविल अपीलों में परिवर्तित कर दिया गया।
पति की ओर से क्या दलीलें दी गईं?
पति की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने बताया कि दोनों पक्ष वर्ष 2003 से अलग रह रहे हैं और पुनर्मिलन के कई प्रयासों के बावजूद साथ नहीं आ सके। उनका कहना था कि विवाह के शुरुआती समय से ही पत्नी के व्यवहार के कारण पति को गंभीर मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ा।
दलील दी गई कि विदेश में रहने के दौरान पत्नी ने पति के खिलाफ निराधार और गंभीर आरोप लगाए, जिसके परिणामस्वरूप उसकी नौकरी चली गई। इसके बाद उसे भारत लौटकर हैदराबाद में अपने माता-पिता के साथ रहना पड़ा।
पति ने यह भी कहा कि लगातार तनाव और परेशानियों के कारण परिवार को हैदराबाद स्थित अपना मकान बेचकर आंध्र प्रदेश स्थानांतरित होना पड़ा। बाद में उसके पिता का निधन हो गया और मकान बिक्री से प्राप्त राशि उनके इलाज में खर्च हो गई। वर्तमान में उसके पास अपना कोई स्थायी आवास नहीं है और वह अपनी माता के साथ बहन के घर में रह रहा है।
पति ने यह भी बताया कि अलगाव के बाद से वह पत्नी और बेटी के भरण-पोषण के लिए 40 लाख रुपये से अधिक की राशि दे चुका है। इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेश के अनुपालन में उसने 68 लाख रुपये रजिस्ट्री में जमा किए थे, जो ब्याज सहित लगभग 75 लाख रुपये हो चुके हैं। स्थायी एकमुश्त समझौते के संबंध में पूछे जाने पर उसने अतिरिक्त 60 लाख रुपये देने पर भी सहमति व्यक्त की।
पत्नी ने तलाक का विरोध किया
पत्नी ने वर्चुअल माध्यम से स्वयं उपस्थित होकर तलाक की मांग का कड़ा विरोध किया। उसने पति के सभी आरोपों को निराधार और काल्पनिक बताया तथा कहा कि उसके द्वारा किसी प्रकार का उत्पीड़न या अपमानजनक आरोप नहीं लगाया गया था।
पत्नी ने विशेष रूप से सामाजिक दबाव का हवाला देते हुए विवाह समाप्त करने का विरोध किया। हालांकि, जब कोर्ट ने उससे पूछा कि दोनों पक्षों के बीच वास्तविक मतभेद क्या हैं और क्या संबंध को पुनर्जीवित किया जा सकता है, तब वह कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे सकी। उसने पति द्वारा प्रस्तावित स्थायी वित्तीय समझौते की राशि स्वीकार करने से भी इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट ने कहा कि वह एक असामान्य स्थिति का सामना कर रहा है, जहां दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर पूरी तरह अड़े हुए हैं। ऐसे में अदालत को ऐसा निर्णय लेना पड़ रहा है जो संभवतः किसी भी पक्ष को पूरी तरह संतुष्ट न करे।
पीठ ने कहा कि मामले को वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है और दोनों व्यक्तियों को यह स्वतंत्रता मिलनी चाहिए कि वे अपना शेष जीवन किस प्रकार व्यतीत करना चाहते हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
“पति-पत्नी के संबंध जैसे रिश्ते को न्यायिक कार्यवाही के माध्यम से जबरन बनाए नहीं रखा जा सकता।”
परिस्थितियों का यथार्थवादी मूल्यांकन करते हुए पीठ ने माना कि:
“पक्षकारों के बीच का विवाह व्यावहारिक रूप से पूरी तरह समाप्त हो चुका है और इसे समाप्त किया जाना आवश्यक है।”
कोर्ट का अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए विवाह के अपूरणीय रूप से टूट जाने (Irretrievable Breakdown of Marriage) के आधार पर तलाक की डिक्री प्रदान कर दी।
कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- पति दो माह के भीतर पत्नी के पक्ष में 60 लाख रुपये का भुगतान या हस्तांतरण करेगा और उसका प्रमाण न्यायालय में प्रस्तुत करेगा।
- सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा 68 लाख रुपये तथा उस पर अर्जित समस्त ब्याज आवश्यक औपचारिकताओं के बाद दो सप्ताह के भीतर पत्नी को जारी किया जाएगा।
- दंपति की पुत्री के अधिकारों पर इस निर्णय का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह पिता की जैविक पुत्री होने के कारण संपत्ति और पैतृक अधिकारों सहित अपने सभी वैधानिक अधिकार बनाए रखेगी।
- पति द्वारा यह आश्वासन भी दर्ज किया गया कि पुत्री के विवाह के समय वह अपनी हिस्सेदारी का योगदान देगा।
- हैदराबाद की एक अदालत में लंबित एफसीए संख्या 93/2019 को भी समाप्त करने का आदेश दिया गया।
- अन्य सभी लंबित आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया गया।
वाद विवरण
वाद शीर्षक: गोपालकृष्ण सुरापनेनी बनाम अनुराधा सुरपनेनी मेडन
मामला संख्या: सिविल अपील संख्या 8212-8213/2026 (एसएलपी (सिविल) संख्या 34898-34899/2014 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह एवं जस्टिस आर. महादेवन
निर्णय दिनांक: 27 मई 2026

