इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक कारोबारी के पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) देने से इनकार करने वाले विशेष कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने माना कि आपराधिक कार्यवाही पर रोक (स्टे) होने और चार्जशीट दाखिल होने में 18 साल की अत्यधिक देरी को देखते हुए इस आवेदन को खारिज करना पोषणीय नहीं है। जस्टिस विनोद दिवाकर की पीठ ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय, बरेली को निर्देश दिया कि वे कानून के तहत तय प्रक्रिया के अनुसार याचिकाकर्ता अवनिश कुमार अग्रवाल के पासपोर्ट का नवीनीकरण करें। इसके साथ ही, कोर्ट ने इस निर्णय को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया ताकि प्रशासनिक देरी को ठीक किया जा सके और प्रशासनिक जवाबदेही के सिद्धांत को लागू किया जा सके।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता अवनिश कुमार अग्रवाल ने बरेली के एडिशनल सेशंस जज/स्पेशल जज (प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट) द्वारा स्पेशल ट्रायल नंबर 18/2025 में 20 सितंबर 2025 को पारित आदेश को चुनौती दी थी। विशेष कोर्ट ने याचिकाकर्ता के पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए NOC की मांग वाले आवेदन को खारिज कर दिया था।
याचिकाकर्ता के खिलाफ साल 2007 में दर्ज की गई दो एफआईआर (FIR) से यह मामला शुरू हुआ था। पहली एफआईआर (नंबर 1634/2007) बिजनौर जिले के नजीबाबाद थाने में आईपीसी की धाराओं 406, 420, 424, 467, 468, 471, 120-B और 218 के तहत दर्ज की गई थी। दूसरी एफआईआर (नंबर 318/2007) मंडावली थाने में आईपीसी की धाराओं 420, 406, 424, 467, 468, 471, 477, 218, 120-B और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(d) के तहत दर्ज की गई थी।
दोनों एफआईआर में बिजनौर जिले के वाणिज्य कर विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों, एक ट्रांसपोर्ट कंपनी के मालिकों और ट्रक ड्राइवरों को आरोपी बनाया गया था। आरोपों में कथित भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और सरकारी कार्यालय में आग लगाकर सरकारी रिकॉर्ड नष्ट करने की बात शामिल थी। पहली एफआईआर में आर्थिक अपराध शाखा (EOW) के सब-इंस्पेक्टर ने 25 लोगों पर आरोप लगाए थे, जिनमें ट्रेड टैक्स विभाग के 10 अधिकारी, ट्रक ड्राइवर, व्यापारी और कलकत्ता की एक ट्रांसपोर्ट कंपनी का मालिक शामिल थे। दूसरी एफआईआर में भी लगभग समान आरोप थे।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील पवन कुमार ने दलील दी कि एफआईआर संख्या 318/2007 में जांच लगभग दो दशकों से लंबित थी। वहीं, एफआईआर संख्या 1634/2007 में चार्जशीट साल 2024 में दाखिल की गई थी, जिसमें 18 साल की अत्यधिक देरी हुई। उन्होंने स्पष्ट किया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक समकक्ष पीठ ने 21 नवंबर 2025 को ही एफआईआर संख्या 1634/2007 से जुड़ी कार्यवाही पर रोक लगा दी थी।
समकक्ष पीठ ने इस बात का संज्ञान लिया था कि आरोप झूठे और याचिकाकर्ता को परेशान करने के दुर्भावनावश लगाए गए थे; मुख्य आरोप सरकारी अधिकारियों पर थे जिन्होंने बिना रसीद के ट्रकों को जाने दिया था; याचिकाकर्ता एक व्यवसायी है; एफआईआर के 18 साल बाद चार्जशीट दाखिल हुई थी और कोर्ट में बुलाने से पहले का कोई साक्ष्य नहीं था। वकील ने कहा कि इस पृष्ठभूमि में NOC देने से मना करना पूरी तरह से गलत था।
इसके विपरीत, राज्य सरकार के एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट (AGA) ने आरोपों की गंभीरता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आरोप गंभीर हैं, विशेष रूप से यह कि आरोपियों ने सरकारी दस्तावेज नष्ट करने के लिए दफ्तर में आग लगा दी थी।
कोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान मनीष कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (2023) मामले में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा दिए गए निर्देशों के क्रियान्वयन की भी समीक्षा की। उस फैसले में राज्य सरकार को मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय समिति (हाई-पावर्ड कमेटी) बनाने का निर्देश दिया गया था ताकि सरकारी विभागों द्वारा दर्ज भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के मामलों की जांच की निगरानी की जा सके और जांच जल्द पूरी हो।
कोर्ट ने पाया कि डिवीजन बेंच ने दिशा-निर्देश तय करने के लिए 3 से 6 महीने का समय दिया था, लेकिन इस समिति के गठन में करीब दो साल की देरी की गई। यह समिति केवल तभी 10 दिसंबर 2025 को बनाई गई जब इस मामले में कोर्ट ने देरी का संज्ञान लिया। कोर्ट ने राज्य के हलफनामों का अवलोकन किया और पाया कि जिला व मंडल स्तर पर निगरानी समितियां बना दी गई हैं, लेकिन अफसोस जताया कि फैसला सुरक्षित रखने के तीन महीने बाद तक राज्य के वकीलों ने हाईकोर्ट को इस समिति की प्रगति के बारे में कोई अपडेट नहीं दिया।
प्रशासनिक जवाबदेही पर कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए टिप्पणी की कि अब समय आ गया है जब राज्य को “उच्चतर उत्तरदायित्व के सिद्धांत को अपनाना चाहिए, जिसके तहत प्रशासनिक पदानुक्रम में बैठे वरिष्ठ अधिकारियों को उनके अधीनस्थों द्वारा किए गए कृत्यों या चूकों को रोकने अथवा उन्हें दंडित करने में विफल रहने पर जवाबदेह और उपयुक्त मामलों में आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रोकने में विफल रहने का अर्थ समय पर प्रशासनिक कदम न उठाना या उच्च अधिकारियों को रिपोर्ट न करना भी है।
लालफीताशाही पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि न्यायिक आदेशों के क्रियान्वयन में सबसे बड़ी बाधा “नौकरशाही के एक वर्ग की वह मानसिकता है जो समावेशी नहीं है और जो केवल विवेकाधीन शक्तियों को अपने पास बनाए रखने को ही अंतिम लक्ष्य मानती है, जिससे कानूनी निश्चितता प्रभावित होती है। विवेक खोने की यही आशंका लोक प्रशासन में ‘लालफीताशाही’ के मुख्य कारणों में से एक हो सकती है।”
कोर्ट का निर्णय
मामले के गुण-दोषों को देखते हुए और यह नोट करते हुए कि बरेली के क्षेत्रीय पासपोर्ट प्राधिकरण से कोई जवाब नहीं मिला है, हाईकोर्ट ने विशेष कोर्ट के 20 सितंबर 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया।
कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता के पक्ष में NOC जारी कर दी और क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय को तय प्रक्रिया के तहत पासपोर्ट जारी करने का निर्देश दिया।
इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने रजिस्ट्रार (कंप्लायंस) को इस आदेश की प्रमाणित प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को भेजने का निर्देश दिया ताकि हाई-पावर्ड कमेटी के काम को समय पर पूरा किया जा सके और लापरवाह अधिकारियों पर त्वरित कार्रवाई के नियम बनाए जा सकें। मुख्य सचिव को यह आदेश मुख्यमंत्री के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया है ताकि प्रशासनिक और आपराधिक जवाबदेही से जुड़ी कोर्ट की चिंताओं पर विचार किया जा सके।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अवनिश कुमार अग्रवाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व 3 अन्य
वाद संख्या: मैटर अंडर आर्टिकल 227 नंबर 13425 ऑफ 2025
पीठ: जस्टिस विनोद दिवाकर
निर्णय की तिथि: 03 जून, 2026

