सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि बिना किसी उचित कारण के पति या पत्नी द्वारा लगातार यौन संबंधों से इनकार करना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है और यह हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत तलाक का वैध आधार है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने पत्नी की अपील खारिज करते हुए हाईकोर्ट द्वारा दिया गया तलाक का आदेश बरकरार रखा। साथ ही, संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए विवाह को भंग भी कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाह 5 दिसंबर 2007 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था। दोनों पक्ष डॉक्टर हैं और अपने-अपने राज्यों की सरकारी सेवा में कार्यरत हैं। विवाह से कोई संतान नहीं हुई।
पति का कहना था कि दोनों के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक मतभेद थे, जिसके कारण वैवाहिक जीवन सामान्य रूप से नहीं चल सका। उसके अनुसार पत्नी ने वैवाहिक जीवन के लगभग दो वर्षों के दौरान केवल दो से तीन महीने ही उसके साथ वैवाहिक घर में बिताए। इसके बाद उसने वर्ष 2009 में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत तलाक की याचिका दायर की।
फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी थी और माना था कि वह क्रूरता साबित करने में असफल रहा है। हालांकि बाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने उस निर्णय को पलटते हुए पति को तलाक दे दिया। इसी आदेश को चुनौती देते हुए पत्नी सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी।
पत्नी की दलीलें
पत्नी ने दावा किया कि उसने कभी पति का परित्याग नहीं किया और वह हमेशा वैवाहिक संबंध बनाए रखने के लिए तैयार थी। उसका कहना था कि पति स्वयं उसे वैवाहिक दायित्व निभाने का अवसर नहीं देता था।
पत्नी ने यह भी कहा कि तलाक की मूल याचिका में न तो परित्याग (डेजर्टशन) और न ही विवाह के अपूरणीय रूप से टूट जाने का आधार लिया गया था। उसके अनुसार वह गुजरात में इसलिए नौकरी करती रही क्योंकि पति के परिवार ने सहमति दी थी कि भरतपुर में नर्सिंग होम बनने तक वह अपनी नौकरी जारी रख सकती है। उसने तर्क दिया कि उसके खिलाफ क्रूरता का कोई ठोस साक्ष्य नहीं है।
पति का पक्ष
पति ने कहा कि पत्नी ने विवाह बचाने के लिए कभी वास्तविक प्रयास नहीं किए। उसने अदालत को बताया कि दोनों पिछले 15 वर्षों से अलग रह रहे हैं और पूरे वैवाहिक संबंध के दौरान केवल कुछ महीनों तक ही साथ रहे।
उसका आरोप था कि पत्नी ने कई अवसरों पर यौन संबंध बनाने से इनकार किया और वैवाहिक जीवन में विश्वास, साथ और भावनात्मक जुड़ाव विकसित करने का कोई प्रयास नहीं किया। उसके अनुसार इतने लंबे अलगाव और असफल सुलह प्रयासों के बाद विवाह को बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं बचा है।
मानसिक क्रूरता पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पत्नी ने मुकदमे की शुरुआत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक लगातार विवाह बनाए रखने की इच्छा जताई है। अदालत ने यह भी नोट किया कि दोनों पक्षों के बीच कोई अन्य दीवानी या आपराधिक मुकदमा लंबित नहीं था।
अदालत ने यह भी देखा कि दोनों लगभग 15 वर्षों से अलग रह रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट द्वारा कराए गए मध्यस्थता प्रयास भी विफल रहे।
हाईकोर्ट ने तलाक देते समय जिन आधारों पर भरोसा किया था, उनमें ताजमहल यात्रा के दौरान कथित अपमान, यौन संबंधों से इनकार, वैवाहिक घर से लंबे समय तक अनुपस्थिति और 15 वर्षों का अलगाव शामिल था।
ताजमहल से जुड़ी घटना के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट की इस राय से सहमति जताई कि उस दिन ताजमहल बंद था और पत्नी द्वारा टेडी बियर मांगने में कोई गलत बात नहीं थी।
हालांकि यौन संबंधों से इनकार के आरोप को लेकर अदालत ने पति की बात स्वीकार की। रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने पाया कि साथ रहने की छोटी अवधि के दौरान पत्नी अलग कमरे में सोती थी, कमरे को अंदर से बंद कर लेती थी और दरवाजा खटखटाने पर भी नहीं खोलती थी। परिणामस्वरूप पति को अलग कमरे में सोना पड़ता था। पत्नी ने भी इस तथ्य का खंडन नहीं किया कि दोनों अलग-अलग कमरों में सोते थे।
सामर घोष बनाम जया घोष मामले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा:
“वैवाहिक अधिकारों से वंचित करना, जिसमें बिना उचित कारण लगातार यौन संबंध बनाने से इनकार करना भी शामिल है, मानसिक क्रूरता है और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत तलाक का वैध आधार है।”
अदालत ने आगे कहा:
“भारतीय अदालतें बार-बार यह स्थापित कर चुकी हैं कि यौन निकटता से वंचित करना गंभीर भावनात्मक पीड़ा पहुंचाता है और विवाह की बुनियाद को कमजोर करता है।”
इन्हीं कारणों से अदालत ने हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष को सही माना कि पति मानसिक क्रूरता का शिकार हुआ था।
वैवाहिक दायित्वों की अनदेखी और लंबा अलगाव
अदालत ने कहा कि विवाह केवल अधिकारों का संबंध नहीं है बल्कि कर्तव्यों का भी संबंध है। यह एक ऐसा साझेदारीपूर्ण संबंध है जो परस्पर सम्मान, भावनात्मक सहयोग, जिम्मेदारी और देखभाल पर आधारित होता है।
इस संदर्भ में अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:
“वैवाहिक अधिकार शून्य में अस्तित्व नहीं रखते; वे वैवाहिक कर्तव्यों के पूरक हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने अधिकारों की मांग करे लेकिन जानबूझकर अपने कर्तव्यों की पवित्रता को त्याग दे, तो वह विवाह संस्था की मूल भावना को ही कमजोर करता है।”
पीठ ने कहा कि साथ रहने की छोटी अवधि के दौरान भी दोनों पक्ष अपने वैवाहिक दायित्वों का निर्वहन नहीं कर सके। विवाह के प्रति उनका दृष्टिकोण अलग-अलग था और लंबे समय तक एक-दूसरे के साथ सामंजस्य स्थापित करने से इनकार करने के कारण संबंध और बिगड़ते गए।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि पति-पत्नी लंबे समय तक अलग रहें और सुलह का कोई वास्तविक प्रयास न करें, तो ऐसी स्थिति स्वयं मानसिक क्रूरता का आधार बन सकती है। अपीलीय अदालतें मुकदमे के दौरान घटित बाद की घटनाओं को भी ध्यान में रख सकती हैं।
विवाह का अपूरणीय रूप से टूट जाना
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह विवाह अपूरणीय रूप से टूट चुका है। अदालत ने कहा कि दोनों पक्ष 15 वर्षों से अधिक समय से अलग रह रहे हैं, उनकी कोई संतान नहीं है और सभी सुलह प्रयास विफल हो चुके हैं।
शिल्पा शैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन सहित विभिन्न फैसलों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 142 के तहत उसे ऐसे विवाह को समाप्त करने का अधिकार है जो व्यवहारिक रूप से समाप्त हो चुका हो और जिसमें पुनर्मिलन की कोई संभावना न हो।
अदालत ने कहा:
“दोनों पक्ष अत्यधिक लंबे समय से अलग रह रहे हैं और अब इस विवाह में कोई पवित्रता शेष नहीं रह गई है।”
पीठ ने यह भी ध्यान दिया कि दोनों पक्ष सरकारी सेवा में कार्यरत डॉक्टर हैं, आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं और विवाह से कोई संतान भी नहीं है, इसलिए तलाक का किसी तीसरे पक्ष पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा पति के पक्ष में दिया गया तलाक का आदेश बरकरार रखा। साथ ही यह निष्कर्ष निकाला कि विवाह पूरी तरह टूट चुका है और दोनों के बीच पुनर्मिलन की कोई संभावना नहीं है।
इसी आधार पर अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए विवाह को भंग कर दिया और पत्नी की अपील खारिज कर दी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सोनल तलपड़ा बनाम वीरभान सिंह
वाद संख्या: एसएलपी (सिविल) संख्या 10422/2025 से उत्पन्न सिविल अपील
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
निर्णय की तिथि: 2 जून 2026

