अधीनस्थ कर्मचारियों के माध्यम से रिश्वत की मांग भी धारा 7 पीसी एक्ट के तहत अपराध हो सकती है; सुप्रीम कोर्ट ने सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ एफआईआर बहाल की

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई लोक सेवक स्वयं रिश्वत न मांगकर अपने अधीनस्थ कर्मचारियों या किसी तीसरे व्यक्ति के माध्यम से अनुचित लाभ हासिल करने का प्रयास करता है, तब भी उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7(ए) के तहत कार्रवाई की जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि किसी लोक सेवक द्वारा अपने लिए नहीं बल्कि किसी अन्य व्यक्ति के लाभ के लिए अनुचित लाभ प्राप्त करने का प्रयास भी इस प्रावधान के दायरे में आता है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमैकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार संबंधी एफआईआर को खारिज कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर और उससे संबंधित सभी कार्यवाहियों को बहाल कर दिया।

क्या था मामला?

मामला कर्नाटक के बल्लारी जिले के सिरुगुप्पा पुलिस स्टेशन में तैनात एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ दर्ज शिकायत से जुड़ा है।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि मार्च 2023 में पुलिस अधिकारियों ने उसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए निर्धारित राशन चावल के अवैध परिवहन के आरोप में रोककर उसकी मोटरसाइकिल और मोबाइल फोन जब्त कर लिए थे। इसके बाद उसने कई बार पुलिस स्टेशन जाकर जब्त सामान लौटाने की मांग की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

शिकायत के अनुसार, 28 मई 2023 को जब वह सब-इंस्पेक्टर से मिला तो उसे बताया गया कि इस मामले में एक निजी व्यक्ति से बात की गई है। बाद में उस व्यक्ति से संपर्क करने पर उसने कथित तौर पर पुलिस अधिकारी की ओर से 50,000 रुपये की मांग की।

इसके बाद 1 जून 2023 को शिकायतकर्ता फिर पुलिस अधिकारी से मिला। आरोप है कि अधिकारी ने एक कॉन्स्टेबल को मोटरसाइकिल छोड़ने का निर्देश दिया और साथ ही कहा कि यदि उसने उसके लिए कुछ नहीं किया है तो कम से कम अन्य पुलिसकर्मियों के लिए कुछ करे। शिकायत के अनुसार, इसके बाद एक कॉन्स्टेबल ने 5,000 रुपये की रिश्वत मांगी, जिसे बातचीत के बाद 3,000 रुपये तथा 500 रुपये अतिरिक्त जुर्माने तक कम कर दिया गया।

इन आरोपों के आधार पर कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस ने 3 जून 2023 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7(ए) के तहत एफआईआर दर्ज की।

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हाईकोर्ट ने एफआईआर क्यों रद्द की?

पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने एफआईआर को चुनौती देते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया था।

हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा था कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत अपराध स्थापित करने के लिए आवश्यक तत्व, अर्थात रिश्वत की मांग और उसकी स्वीकृति, प्रथम दृष्टया सामने नहीं आते। हाईकोर्ट ने यह भी माना कि संबंधित अधिकारी द्वारा न तो कोई प्रत्यक्ष मांग की गई थी और न ही उसके पास से कोई रकम बरामद हुई थी।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने एफआईआर और उससे संबंधित कार्यवाहियों को रद्द कर दिया था।

एफआईआर रद्द करने की शक्ति पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एफआईआर रद्द करने की शक्ति असाधारण है और इसका प्रयोग अत्यंत सीमित परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि इस चरण पर अदालत का काम केवल यह देखना है कि एफआईआर में लगाए गए आरोपों को यदि सही मान लिया जाए तो क्या वे किसी संज्ञेय अपराध का प्रथम दृष्टया खुलासा करते हैं। अदालत को इस स्तर पर साक्ष्यों की जांच या उनके मूल्यांकन में नहीं जाना चाहिए।

पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने इस सीमा का अतिक्रमण किया और ट्रैप कार्यवाही के परिणाम, बरामदगी न होने, रासायनिक परीक्षणों के नतीजों तथा विभागीय जांच की रिपोर्ट जैसे मुद्दों पर विचार किया, जो ट्रायल के दौरान तय किए जाने वाले प्रश्न हैं।

कोर्ट ने कहा:

“यह देखने तक सीमित रहने के बजाय कि एफआईआर की सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया कोई अपराध बनता है या नहीं, हाईकोर्ट ने ट्रैप कार्यवाही के परिणाम, पहले प्रतिवादी से कोई बरामदगी न होने, फिनॉल्फ्थेलीन परीक्षण के नतीजों तथा कुछ आरोपियों के खिलाफ विभागीय जांच के निष्कर्षों पर विचार किया, जबकि ये सभी ऐसे विषय हैं जिनका मूल्यांकन ट्रायल के दौरान किया जाना चाहिए।”

पीठ ने माना कि हाईकोर्ट ने प्रभावी रूप से एक “मिनी ट्रायल” कर डाला, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है।

धारा 7(ए) की व्यापक व्याख्या

सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7(ए) और उससे जुड़े स्पष्टीकरण-2 की विस्तृत व्याख्या की।

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कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान केवल उस स्थिति तक सीमित नहीं है जहां लोक सेवक स्वयं रिश्वत प्राप्त करे। यह उन मामलों को भी कवर करता है जहां वह किसी अन्य व्यक्ति के लिए अनुचित लाभ प्राप्त करने या प्राप्त कराने का प्रयास करता है।

पीठ ने कहा:

“यह आवश्यक नहीं है कि धारा 7 के तहत आरोपित लोक सेवक स्वयं अपने लिए अनुचित लाभ प्राप्त करे। यह उन मामलों को भी शामिल करती है जहां वह किसी ‘अन्य व्यक्ति’ के लिए ऐसा लाभ प्राप्त करने का प्रयास करता है।”

कोर्ट ने कहा कि कानून यह भी स्पष्ट करता है कि अनुचित लाभ सीधे प्राप्त किया जाए या किसी तीसरे व्यक्ति के माध्यम से, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

शिकायत में प्रथम दृष्टया अपराध के संकेत

मामले के तथ्यों पर कानून लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया यह दर्शाते हैं कि संबंधित अधिकारी ने अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के लिए अनुचित लाभ प्राप्त करने का प्रयास किया।

पीठ ने उस कथित टिप्पणी का उल्लेख किया जिसमें अधिकारी ने शिकायतकर्ता से अन्य पुलिसकर्मियों के लिए “कुछ करने” या “लड़कों को खुश करने” की बात कही थी।

कोर्ट ने कहा:

“पहले प्रतिवादी के खिलाफ लगाया गया विशिष्ट आरोप यह है कि उसने शिकायतकर्ता से कहा कि वह ‘अन्य पुलिस अधिकारियों के लिए कुछ करे’ या ‘उन लड़कों को खुश कर दे’, जो उन व्यक्तियों के लिए अवैध पारितोषिक अथवा अनुचित लाभ की एक परोक्ष मांग का रूप लेता है, जो आधिकारिक रूप से उसके निकट जुड़े हुए थे।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि इस कथित टिप्पणी के तुरंत बाद अधीनस्थ कर्मचारी द्वारा धनराशि की मांग की गई, जिससे दोनों घटनाओं के बीच प्रथम दृष्टया संबंध दिखाई देता है।

पूर्व फैसलों को क्यों माना अलग?

प्रतिवादी अधिकारी ने के. शांथम्मा बनाम तेलंगाना राज्य, साउंडराजन बनाम राज्य और जगतार सिंह बनाम पंजाब राज्य जैसे फैसलों पर भरोसा किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये सभी मामले ट्रायल पूरा होने के बाद दिए गए थे, जहां अदालतों को यह तय करना था कि दोषसिद्धि के लिए आवश्यक प्रमाण उपलब्ध हैं या नहीं।

पीठ ने स्पष्ट किया कि वर्तमान मामला ट्रायल से पहले की अवस्था में है और इस स्तर पर केवल यह देखा जाना है कि एफआईआर में अपराध के प्रथम दृष्टया तत्व मौजूद हैं या नहीं। इसलिए इन फैसलों को वर्तमान मामले पर लागू नहीं किया जा सकता।

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विभागीय जांच और दुर्भावना के तर्क खारिज

कोर्ट ने उस तर्क को भी अस्वीकार कर दिया जिसमें कुछ अधीनस्थ अधिकारियों को विभागीय जांच में दोषमुक्त किए जाने का हवाला दिया गया था।

पीठ ने कहा कि विभागीय जांच के निष्कर्ष दूसरे व्यक्तियों से संबंधित थे और उनका प्रभाव मुख्य आरोपी के खिलाफ चल रही आपराधिक जांच पर नहीं पड़ता।

इसी प्रकार कोर्ट ने यह तर्क भी स्वीकार नहीं किया कि शिकायत पुराने विवादों के कारण दुर्भावनापूर्ण थी। कोर्ट ने कहा कि दुर्भावना, पूर्व शत्रुता और शिकायतकर्ता के उद्देश्य जैसे प्रश्न साक्ष्य के आधार पर ट्रायल के दौरान तय किए जाएंगे। केवल ऐसे आरोपों के आधार पर एफआईआर रद्द नहीं की जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि शिकायत और एफआईआर में लगाए गए आरोपों को यदि प्रथम दृष्टया सही माना जाए तो वे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7(ए) के तहत अपराध का खुलासा करते हैं।

इसी आधार पर कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और एफआईआर तथा उससे उत्पन्न सभी कार्यवाहियों को बहाल करते हुए मामले को कानून के अनुसार आगे बढ़ाने का निर्देश दिया।

साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके द्वारा की गई टिप्पणियां केवल यह तय करने के लिए हैं कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं। ट्रायल के दौरान आरोपी की दोषसिद्धि या निर्दोषता का निर्धारण उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से किया जाएगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: द स्टेट बाय लोकायुक्त पुलिस बनाम श्री के. रंगैया एवं अन्य

वाद संख्या: एसएलपी (क्रिमिनल) संख्या 5245 वर्ष 2025 से उत्पन्न आपराधिक अपील

पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमैकापम कोटिश्वर सिंह

निर्णय की तिथि: 26 मई 2026

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