सुप्रीम कोर्ट के दो दिग्गज जजों की विदाई: जस्टिस माहेश्वरी और जस्टिस मिथल की विरासत, ऐतिहासिक फैसले और पेंडेंसी पर गंभीर चेतावनी

भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में शुक्रवार का दिन बेहद भावुक और गरिमामयी रहा। सुप्रीम कोर्ट के दो सबसे सम्मानित न्यायाधीशों—जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस पंकज मिथल को विदाई दी गई। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता में आयोजित विदाई समारोह में शीर्ष अदालत के पूरे परिवार ने दोनों जजों की सेवाओं और योगदान को याद किया।

यह शुक्रवार इन दोनों न्यायाधीशों के लिए अंतिम कार्य दिवस था, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में 1 जून से 12 जुलाई तक आंशिक कार्य दिवस (partial working days) रहेंगे। इस दौरान जस्टिस पंकज मिथल 16 जून को और जस्टिस जे.के. माहेश्वरी 28 जून को आधिकारिक तौर पर सेवानिवृत्त हो जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) द्वारा आयोजित इस समारोह में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने दोनों जजों की तारीफ करते हुए कहा, “न्यायपालिका में विदाई कभी आसान नहीं होती। यह शाम गहरी कृतज्ञता और आत्मनिरीक्षण की है। दोनों जजों ने अपने जीवन के सबसे बेहतरीन साल इस महान संस्था को दिए हैं और इसे अटूट निष्ठा व गरिमा से सींचा है।”

न्याय के मील के पत्थर: फैसले जिन्होंने देश पर छोड़ी अमिट छाप

अपने कार्यकाल के दौरान दोनों न्यायाधीशों ने कई ऐसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसले सुनाए, जिन्होंने भारतीय कानूनी और सामाजिक व्यवस्था को नई दिशा दी।

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी: सादगी और कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल

मध्य प्रदेश से अपनी कानूनी यात्रा शुरू करने वाले जस्टिस जे.के. माहेश्वरी अपनी सादगी और अनुशासन के लिए जाने जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट पहुंचने से पहले उन्होंने आंध्र प्रदेश और सिक्किम के मुख्य न्यायाधीश के रूप में भी सेवाएं दीं।

READ ALSO  रिटायरमेंट के 8 महीने बाद भी पूर्व CJI डी वाई चंद्रचूड़ ने नहीं खाली किया बंगला, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को लिखा पत्र

उनके कार्यकाल के कुछ सबसे चर्चित फैसले निम्नलिखित हैं:

  • भोपाल गैस त्रासदी उपचारात्मक याचिका (Curative Petition): जस्टिस माहेश्वरी उस संविधान पीठ का हिस्सा थे जिसने केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें पीड़ितों को अतिरिक्त मुआवजा देने के लिए यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन (UCC) की उत्तराधिकारी कंपनियों से 7,844 करोड़ रुपये की मांग की गई थी। पीठ ने स्पष्ट किया था कि दो दशक से अधिक समय बाद इस समझौते को दोबारा खोलने का कोई तार्किक आधार सरकार नहीं दे पाई।
  • करूर भगदड़ की सीबीआई जांच: पिछले साल जस्टिस माहेश्वरी की अगुवाई वाली पीठ ने तमिलनाडु के करूर में हुई दुखद भगदड़ की जांच सीबीआई को सौंपी थी, जिसमें 41 लोगों की जान गई थी। उन्होंने कहा था कि इस हादसे ने “देश की अंतरात्मा को झकझोर” दिया है, इसलिए निष्पक्ष जांच जरूरी है।

अपनी विदाई पर जस्टिस माहेश्वरी ने देश की न्यायिक प्रणाली की सराहना करते हुए कहा, “मैंने देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग संस्कृतियां, भाषाएं और भौगोलिक क्षेत्र देखे, लेकिन जो चीज कभी नहीं बदली, वह थी न्याय पाने के लिए देश के आम आदमी की उम्मीद।”

READ ALSO  Decree Of Possession Cannot Be Passed In Plaintiff’s Favour Merely Because Defendant Was Unable To Fully Establish Their Title: SC

जस्टिस पंकज मिथल: ‘जीवंत वादे’ के रूप में संविधान की व्याख्या

उत्तर प्रदेश के मेरठ से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर तय करने वाले जस्टिस पंकज मिथल को उनके शांत व्यवहार और गहरी मानवीय समझ के लिए याद किया जाएगा। समारोह के दौरान सीजेआई ने उनके एक दिलचस्प शौक का भी जिक्र किया—डाक टिकटों का संग्रह (Stamp Collection)।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “एक डाक टिकट संग्रहकर्ता उन बारीकियों में भी अर्थ ढूंढ लेता है, जिन्हें लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। एक न्यायविद् के रूप में जस्टिस मिथल ने हमेशा यह माना कि संविधान सिर्फ व्याख्या करने के लिए कोई दस्तावेज़ नहीं, बल्कि देश के नागरिकों से किया गया एक जीवंत वादा है।”

उनके महत्वपूर्ण फैसले:

  • अनुसूचित जातियों (SC) का उप-वर्गीकरण: जस्टिस मिथल उस ऐतिहासिक सात-जजों की संविधान पीठ के सदस्य थे, जिसने यह व्यवस्था दी कि राज्य सरकारों को अनुसूचित जातियों (SC) के भीतर उप-वर्गीकरण करने का संवैधानिक अधिकार है, ताकि सबसे पिछड़े लोगों तक आरक्षण का लाभ पहुंच सके।
  • आरक्षण नीति पर नया दृष्टिकोण: इस फैसले में अपनी अलग सहमति व्यक्त करते हुए जस्टिस मिथल ने आरक्षण नीति की समीक्षा करने की बात कही थी। उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के 1961 के एक पत्र का हवाला दिया था, जिसमें नेहरू ने किसी भी जाति या वर्ग को विशेषाधिकार व आरक्षण देने की आदत पर चिंता जताई थी।
READ ALSO  इलाहाबाद हाईकोर्ट: अदालतों को नीतिगत मामलों में तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक कि मौलिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन न हो

मुकदमों के अंबार (Pendency) पर एक गंभीर चेतावनी

अपनी विदाई के इस मंच से जस्टिस पंकज मिथल ने भारतीय न्यायपालिका की सबसे बड़ी चुनौती यानी अदालतों में लंबित मुकदमों के अंबार पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि देश की सबसे बड़ी अदालत से यह समस्या बेहद गंभीर दिखाई देती है।

जस्टिस मिथल ने आगाह करते हुए कहा, “मुकदमों की बढ़ती संख्या सिर्फ एक प्रशासनिक समस्या या आंकड़ों का खेल नहीं है। यह सीधे तौर पर उन लाखों नागरिकों के जीवन, स्वतंत्रता और आकांक्षाओं को प्रभावित करता है जो उम्मीद लेकर अदालत आते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “हर लंबित मामला अपने आप में एक अनसुलझी इंसानी कहानी है—चाहे वह पारिवारिक विवाद हो, कोई लंबे समय से चला आ रहा दर्द हो, जमानत का इंतजार कर रहा कोई विचाराधीन कैदी (undertrial) हो, या फिर आजीविका को प्रभावित करने वाला कोई व्यावसायिक मामला हो।”

भावुकता और आदर से भरे इस समारोह में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, उनके परिवार के सदस्य, वरिष्ठ अधिवक्ता और अदालती कर्मचारी बड़ी संख्या में मौजूद रहे, जिन्होंने इन दोनों महान न्यायविदों को विदा किया।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles