मद्रास हाईकोर्ट ने तमिल फिल्म ‘करुप्पु’ (Karuppu) के सिनेमाघरों और ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स पर प्रदर्शन को प्रतिबंधित या विनियमित करने की मांग वाली जनहित याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है। जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मणन की खंडपीठ ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि एक काल्पनिक अदालत में भ्रष्टाचार का चित्रण करना न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत आपराधिक अवमानना नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका को सार्वजनिक आलोचना का सामना करने के लिए “चौड़े कंधे” रखने चाहिए क्योंकि न्यायाधीश आलोचना से परे नहीं हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
चेन्नई के कोडम्बाक्कम निवासी और पेशे से वकील आर.एस. तमिलवेंदम ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मद्रास हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर की थी। याचिका में तमिलनाडु गृह विभाग, सूचना और जनसंपर्क विभाग और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे फिल्म ‘करुप्पु’ के प्रदर्शन को रोकें या इसे विनियमित करें।
यह याचिका 17 मई, 2026 के एक प्रतिनिधित्व पर आधारित थी। ‘ड्रीम वॉरियर पिक्चर्स’ द्वारा निर्मित इस फिल्म में आर.जे. बालाजी (जिन्होंने इसका निर्देशन भी किया है), सूर्या और त्रिशा मुख्य भूमिकाओं में हैं। फिल्म की कहानी ‘सेवन वेल्स’ (Seven Wells) नामक एक काल्पनिक अदालत के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ के पीठासीन अधिकारी को भ्रष्ट और एक अनैतिक वकील के साथ अपवित्र गठबंधन में दिखाया गया है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि याचिकाकर्ता द्वारा तमिल में लिखा गया आवेदन भाषाई त्रुटियों से भरा हुआ था। उन्होंने न्यायालय की गरिमा (மாட்சிமை) को ‘மார்ச்சிமை’ लिख दिया था, पवित्र (புனிதமானதாகும்) की वर्तनी गलत लिखी थी और ओटीटी (OTT) को ‘तीर्थस्थल’ (புண்ணियத்தலங்கள்) के रूप में संदर्भित किया था। यहाँ तक कि उन्होंने अपना नाम भी गलत लिखा था। हालांकि कोर्ट ने कहा कि इस तरह के घटिया आवेदन के आधार पर याचिका सीधे खारिज होने योग्य थी, लेकिन इसके बावजूद खंडपीठ ने मामले के कानूनी पहलुओं और मेरिट पर विस्तार से सुनवाई करने का फैसला किया।
दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से वकील एम. सेंथिलकुमार ने दलील दी कि फिल्म ‘करुप्पु’ में अदालतों का जो चित्रण किया गया है, वह न्यायपालिका की छवि को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाता है और आम जनता के मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करता है। उन्होंने तर्क दिया कि निर्माताओं और कलाकारों ने न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत आपराधिक अवमानना का कृत्य किया है, इसलिए इस फिल्म पर प्रतिबंध लगाना आवश्यक है।
दूसरी तरफ, प्रतिवादियों की ओर से सरकारी वकील एम. मुरली (राज्य विभागों के लिए) और केंद्र सरकार के वरिष्ठ पैनल वकील के. श्रीनिवासमूर्ति (CBFC के लिए) उपस्थित हुए। उन्होंने सेंसर बोर्ड जैसी विशेषज्ञ संस्था द्वारा फिल्म को दिए गए प्रमाणन और उसकी मंजूरी का पूरी तरह बचाव किया।
कोर्ट की टिप्पणियां और कानूनी विश्लेषण
1. न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की वास्तविकताओं पर दो टूक (फैसले का पैरा 5)
फिल्म के मुख्य विषय (न्यायिक भ्रष्टाचार) पर बेहद बेबाकी से टिप्पणी करते हुए अदालत ने फैसले के पैराग्राफ 5 में स्वीकार किया:
“इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है। भ्रष्ट न्यायाधीश पहले भी थे और आज भी हैं। केरल के कोल्लम में एक कानूनी सम्मेलन को संबोधित करते हुए, पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) भरूचा ने संकेत दिया था कि इस देश में 20 प्रतिशत न्यायाधीश भ्रष्ट थे। भूषण (पिता और पुत्र की जोड़ी) द्वारा दिया गया चौंकाने वाला बयान अभी भी जनता की स्मृति में है। हम इतनी दूर नहीं जाएंगे। हम ऐसे व्यापक बयानों का समर्थन भी नहीं करते हैं। लेकिन, हम जानते हैं और हमारे सामने न्यायिक भ्रष्टाचार के उदाहरण आए हैं। मद्रास हाईकोर्ट की फुल कोर्ट नियमित रूप से ऐसी काली भेड़ों को बाहर का रास्ता दिखाती है। सुप्रीम कोर्ट ने ‘हाई कोर्ट ऑफ जुडीकेचर एट बॉम्बे बनाम वी. शिरीष कुमार रंगराव पाटिल (1997) 6 SCC 339’ में स्वीकार किया था कि भ्रष्टाचार की कैंसर कोशिकाएं न्यायपालिका की महत्वपूर्ण धमनियों में लगातार रेंगती रहती हैं। यह भी देखा गया था कि न्यायिक सर्जरी के माध्यम से इसे खत्म करने की आवश्यकता स्वयं न्यायपालिका पर है, जो संविधान के अनुच्छेद 235 के तहत अपने स्वयं के द्वारा लगाए गए सुधारात्मक उपायों या अनुशासनात्मक कार्रवाई के माध्यम से की जानी चाहिए। बार (वकीलों) के कुछ सदस्यों की मिलीभगत के बिना न्यायपालिका में भ्रष्टाचार नहीं हो सकता। हाईकोर्ट की सतर्क नजर भ्रष्ट लोगों को पकड़ने और स्थिति से उचित रूप से निपटने के लिए एक निरंतर चलने वाली धारा है।”
2. सिनेमाई अतिशयोक्ति और कलात्मक स्वतंत्रता (Artistic Licence)
जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन ने दर्ज किया कि उन्होंने खुद सिनेमाघर में जाकर यह फिल्म देखी है। हालांकि कोर्ट ने माना कि फिल्म में कानूनी प्रणाली का चित्रण “अतिशयोक्तिपूर्ण और बढ़ा-चढ़ाकर” किया गया है, लेकिन पीठ ने कहा कि कलात्मक स्वतंत्रता को बहुत ऊंचे पायदान पर रखा जाना चाहिए। कोर्ट ने मनोहरलाल शर्मा बनाम संजय लीला भंसाली (2018) मामले का हवाला दिया और दार्शनिक थियोडोर एडोर्नो के प्रसिद्ध कथन को उद्धृत किया: “कला का हर काम एक ऐसा अपराध है जो अभी तक घटित नहीं हुआ है।”
3. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सेंसर बोर्ड का अधिकार
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फिल्में संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के अंतर्गत आती हैं। प्रकाश झा प्रोडक्शंस बनाम भारत संघ (2011) का हवाला देते हुए कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जब सेंसर बोर्ड (CBFC) जैसी विशेषज्ञ संस्था ने किसी फिल्म को प्रमाणित कर दिया हो, तो रिट कोर्ट केवल अवमानना के आधार पर उस पर प्रतिबंध लगाने के लिए हस्तक्षेप नहीं करेगा।
4. आलोचना सहने के लिए न्यायाधीशों के “चौड़े कंधे” (Broad Shoulders)
जजों को सार्वजनिक आलोचना से ऊपर मानने की मानसिकता को खारिज करते हुए खंडपीठ ने कहा:
“न्यायाधीशों को ‘होली काउ’ (पवित्र गाय) मानने की आवश्यकता नहीं है। न्याय कोई बंद कमरा नहीं है; उसे आम लोगों की खुली और मुखर टिप्पणियों तथा जांच को सहने की क्षमता रखनी चाहिए।”
एस. रंगराजन बनाम पी. जगजीवन राम (1989) का संदर्भ देते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि फिल्म अवमानना के दायरे में आती है या नहीं, इसका निर्धारण “एक संवेदनशील या चिढ़ने वाले व्यक्ति के बजाय चौड़े कंधों वाले एक शांत और गंभीर न्यायाधीश” के नजरिए से किया जाना चाहिए।
5. काल्पनिक अदालत और अवमानना कानून का दायरा
अदालत ने कहा कि न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(सी) के तहत आपराधिक अवमानना के प्रावधानों की व्याख्या संकीर्ण और सख्त होनी चाहिए क्योंकि यहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला है। खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि फिल्म की पूरी कहानी ‘सेवन वेल्स’ नामक एक काल्पनिक अदालत में घटती है (जैसे आर.के. नारायण के उपन्यासों में ‘मालगुडी’ गाँव काल्पनिक है), इसलिए:
“जब किसी काल्पनिक अदालत के पीठासीन अधिकारी को भ्रष्ट दिखाया जाता है, तो इससे न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 के दंडात्मक प्रावधान आकर्षित नहीं होते।”
अदालत का निर्णय
मद्रास हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता द्वारा फिल्म पर प्रतिबंध लगाने के लिए कोई भी ठोस कानूनी आधार प्रस्तुत नहीं किया गया है। कोर्ट ने रिट याचिका को खारिज कर दिया और संबंधित विविध याचिकाओं को बंद कर दिया। इस मामले में किसी भी पक्ष पर कोई जुर्माना (Costs) नहीं लगाया गया।
केस का विवरण
- केस का शीर्षक: आर.एस. तमिलवेंदम बनाम सचिव, तमिलनाडु राज्य व अन्य
- केस नंबर: WP No. 20286 of 2026 और WMP NO. 21743 of 2026
- पीठ: जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मणन
- फैसले की तारीख: 21 मई, 2026

