सीपीसी के आदेश VI नियम 17 को दरकिनार कर ‘अतिरिक्त लिखित बयान’ के जरिए विरोधाभासी बचाव पेश नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल मुकदमों में प्रक्रियात्मक अनुशासन को लेकर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी प्रतिवादी (Defendant) मुकदमे की सुनवाई शुरू होने के बाद अतिरिक्त लिखित बयान (Additional Written Statement) दाखिल करके अपने मूल रुख के विपरीत कोई नया या विरोधाभासी दावा पेश नहीं कर सकता।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के कड़े प्रावधानों से बचने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें प्रतिवादी को ₹15,000 के हर्जाने पर नया लिखित बयान दाखिल करने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने निचली अदालत (सिटी सिविल कोर्ट, कलकत्ता) के फैसले को बहाल रखा है।

मामले की पृष्ठभूमि और मूल विवाद

यह मामला साल 2022 में कलकत्ता की एक संपत्ति को लेकर शुरू हुआ था। वादी मोंदिरा घोष ने सिटी सिविल कोर्ट, कलकत्ता में चैताली घोष (प्रतिवादी) के खिलाफ टाइटल सूट (नंबर 1527/2022) दायर किया था। वादी का आरोप था कि प्रतिवादी संपत्ति पर अवैध रूप से काबिज हैं, इसलिए उन्हें वहां से बेदखल किया जाए और हर्जाना दिलाया जाए।

दिसंबर 2022 में प्रतिवादी चैताली घोष ने अपना मूल लिखित बयान दाखिल किया। इसमें उन्होंने दावा किया कि वे उस संपत्ति की “सद्भावी सह-अंशधारक” (Bonafide Co-sharer) हैं, और इसी आधार पर मुकदमा खारिज करने की मांग की।

इसके बाद, 17 मई 2023 को कोर्ट ने विवाद के बिंदु (Issues) तय कर दिए और ट्रायल (गवाही का चरण) शुरू हो गया। वादी पक्ष के पहले गवाह (PW-1) से दिसंबर 2023 से जुलाई 2024 के बीच कई तारीखों पर बचाव पक्ष के वकीलों ने विस्तृत जिरह (Cross-examination) की।

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गवाही पूरी होने के बाद रुख में बदलाव का प्रयास

वादी के पहले गवाह से जिरह पूरी होने के बाद, प्रतिवादी चैताली घोष ने सीपीसी के आदेश VIII नियम 9 के तहत ट्रायल कोर्ट में एक आवेदन दायर किया। इसके तहत उन्होंने अतिरिक्त लिखित बयान और एक ‘काउंटर-क्लेम’ (दावे के बदले दावा) दाखिल करने की अनुमति मांगी।

इस प्रस्तावित अतिरिक्त लिखित बयान में प्रतिवादी ने अपने पिछले स्टैंड से पूरी तरह विपरीत रुख अपना लिया। उन्होंने दावा किया कि वे संपत्ति की सह-मालिक नहीं, बल्कि वादी मोंदिरा घोष के अधीन एक “किराएदार” (Tenant) हैं।

जून 2025 में ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादी के इस आवेदन को खारिज कर दिया। अदालत ने सीपीसी के आदेश VI नियम 7 का हवाला देते हुए कहा कि कोई भी पक्षकार अपने पिछले बयानों से असंगत तथ्य पेश नहीं कर सकता और न ही ट्रायल शुरू होने के बाद अपने मूल रुख से पीछे हट सकता है।

हाईकोर्ट का दृष्टिकोण और सुप्रीम कोर्ट की आपत्तियां

ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ प्रतिवादी ने कलकत्ता हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका (C.O. No. 3172/2025) दायर की। हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने मामले पर आंशिक फैसला सुनाया:

  1. काउंटर-क्लेम पर निर्णय: हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल शुरू होने और गवाहों की जिरह होने के बाद काउंटर-क्लेम स्वीकार नहीं किया जा सकता।
  2. अतिरिक्त लिखित बयान पर निर्णय: हालांकि हाईकोर्ट ने कानून के कड़े नियमों को स्वीकार किया, लेकिन प्रतिवादी के प्रति नरम रुख अपनाते हुए ₹15,000 के हर्जाने पर अतिरिक्त लिखित बयान रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दे दी। हाईकोर्ट का मानना था कि ये तथ्य विवाद के निपटारे के लिए आवश्यक थे और संभवतः पहले छूट गए थे।
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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया।

संशोधन के नियमों को दरकिनार करने का प्रयास

सुप्रीम कोर्ट के लिए फैसला लिखते हुए जस्टिस संजय कुमार ने स्पष्ट किया कि यह मामला किसी तथ्य के अनजाने में छूटने का नहीं है। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:

“यह ऐसा मामला नहीं था जहाँ लिखित बयान में कोई तथ्य छूट गया हो और उस रिक्त स्थान को अतिरिक्त लिखित बयान के माध्यम से भरने का प्रयास किया जा रहा हो। इसके विपरीत, प्रतिवादी अपने कब्जे के दावे और स्थिति के संबंध में अपना रुख पूरी तरह से बदलना चाहती थी।”

खंडपीठ ने प्रतिवादी द्वारा अपनाए गए इस विरोधाभासी स्टैंड की आलोचना करते हुए कहा:

“अतिरिक्त लिखित बयान दाखिल करने की आड़ में प्रतिवादी द्वारा अपने पिछले रुख को वापस लेना और पूरी तरह से असंगत और विरोधाभासी रुख अपनाना, सीपीसी के आदेश VI नियम 7 के स्पष्ट आदेश के विपरीत था।”

अदालत ने समझाया कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश VI नियम 17 का परंतुक (Proviso) ट्रायल शुरू होने के बाद बयानों में किसी भी संशोधन को बेहद कठिन बनाता है। इसके लिए पक्षकार को ‘सचेत सक्रियता’ (Due Diligence) साबित करनी होती है। प्रतिवादी ने इसी कानूनी अड़चन से बचने के लिए आदेश VIII नियम 9 का सहारा लिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया का दुरुपयोग माना:

“मुकदमे की सुनवाई शुरू होने के बाद प्रतिवादी द्वारा ऐसा आवेदन दायर करना स्पष्ट रूप से प्रक्रिया का दुरुपयोग था। यह चाल आदेश VI नियम 17 सीपीसी के परंतुक द्वारा उत्पन्न बाधा को पार करने के लिए अपनाई गई थी…”

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल मुकदमों में कानूनी निश्चितता और प्रक्रियात्मक अनुशासन के महत्व पर जोर देते हुए निम्नलिखित आदेश पारित किया:

  1. कलकत्ता हाईकोर्ट के 3 सितंबर 2025 के आदेश को पूरी तरह निरस्त किया जाता है।
  2. ट्रायल कोर्ट (सिटी सिविल कोर्ट, कलकत्ता) के 17 जून 2025 के आदेश को बहाल किया जाता है, जिसके तहत अतिरिक्त लिखित बयान की अनुमति खारिज कर दी गई थी।
  3. मुकदमे में दोनों पक्ष अपना-अपना कानूनी खर्च स्वयं वहन करेंगे।
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केस का विवरण

  • केस का शीर्षक: मोंदिरा घोष बनाम चैताली घोष
  • अपील संख्या: सिविल अपील संख्या 8195 ऑफ 2026 (स्पेशल लीव पिटीशन संख्या 34411 ऑफ 2025 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
  • फैसले की तिथि: 26 मई, 2026

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