देश में कानूनी शिक्षा (Legal Education) के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तहत, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (26 मई 2026) को दिल्ली हाईकोर्ट के उस ऐतिहासिक आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें लॉ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को कम अटेंडेंस (उपस्थिति) के आधार पर छात्रों को परीक्षा से रोकने पर प्रतिबंध लगाया गया था।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश जारी किया। कोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद से देश के सभी नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज (NLUs) “परेशान” हैं, क्योंकि छात्र अनिवार्य अटेंडेंस के नियम से बचना चाहते हैं। शीर्ष अदालत ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि छात्रों के लिए कक्षाओं में आना अनिवार्य नहीं रहेगा, तो लॉ कॉलेजों के हॉस्टल सिर्फ “रहने और खाने की जगह” (बोर्डिंग और लॉजिंग सुविधाएं) बनकर रह जाएंगे।
इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट अब अगली सुनवाई 21 जुलाई 2026 को करेगा।
हाईकोर्ट के फैसले के ‘पैराग्राफ 249’ पर रोक
सुप्रीम कोर्ट का यह अंतरिम आदेश विशेष रूप से दिल्ली हाईकोर्ट के नवंबर 2025 के फैसले के पैराग्राफ 249 पर केंद्रित है। हाईकोर्ट के इस पैराग्राफ ने कानून शिक्षण संस्थानों से वह अधिकार छीन लिया था जिसके तहत वे कम अटेंडेंस वाले छात्रों को सेमेस्टर परीक्षाओं में बैठने से रोक सकते थे या उनके शैक्षणिक वर्ष को प्रभावित कर सकते थे।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया, “इस बीच, विवादित फैसले के पैराग्राफ 249 के प्रभाव और संचालन पर रोक रहेगी। हालांकि, यह रोक भविष्यगामी (prospectively) रूप से प्रभावी होगी।”
शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले के लंबित रहने के बावजूद, देश के अन्य हाईकोर्ट अपनी अदालतों में अटेंडेंस नियमों से जुड़ी अन्य लंबित याचिकाओं पर फैसला लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होंगे।
यह रोक बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और कुछ अन्य पक्षों द्वारा दायर की गई याचिकाओं पर सुनवाई के बाद लगाई गई है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने BCI के चेयरमैन और वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा से सवाल किया कि काउंसिल को हाईकोर्ट के नवंबर के फैसले को चुनौती देने में लगभग छह महीने का समय क्यों लग गया। इससे पहले, 13 मई को शीर्ष अदालत इस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमत हुई थी।
सुनवाई के दौरान याचिकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने हाईकोर्ट के आदेश पर तुरंत रोक लगाने की पुरजोर वकालत की। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा, “क्या हाईकोर्ट का यह फैसला छात्रों को क्लास न जाने का अधिकार देता है?” कोर्ट ने यह भी चिंता व्यक्त की कि यदि छात्र कक्षाओं में नहीं आएंगे, तो NLUs और अन्य विश्वविद्यालयों के शिक्षक क्या करेंगे।
क्या था दिल्ली हाईकोर्ट का नवंबर 2025 का ऐतिहासिक फैसला?
यह पूरा विवाद दिल्ली हाईकोर्ट के नवंबर 2025 के एक व्यापक फैसले से उत्पन्न हुआ है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ तौर पर कहा था, “भारत के किसी भी मान्यता प्राप्त लॉ कॉलेज, यूनिवर्सिटी या संस्थान में नामांकित किसी भी छात्र को न्यूनतम अटेंडेंस की कमी के आधार पर परीक्षा देने से नहीं रोका जाएगा और न ही उनकी शैक्षणिक या करियर की प्रगति को बाधित किया जाएगा।”
हाईकोर्ट का विचार था कि शैक्षणिक नियमों को इतना सख्त और कठोर नहीं बनाया जाना चाहिए जिससे छात्रों को मानसिक आघात (mental trauma) पहुंचे, या किसी छात्र की दुखद मृत्यु हो जाए।
हाईकोर्ट ने यह फैसला एक स्वतः संज्ञान (suo motu) याचिका का निपटारा करते हुए सुनाया था, जिसकी शुरुआत मूल रूप से सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई थी और बाद में इसे दिल्ली हाईकोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया था। यह मामला 2016 में नई दिल्ली के एक लॉ छात्र सुशांत रोहिल्ला की दुखद आत्महत्या से जुड़ा हुआ था। तीसरे वर्ष के छात्र सुशांत रोहिल्ला को उनके कॉलेज ने कथित तौर पर पर्याप्त अटेंडेंस न होने के कारण सेमेस्टर परीक्षाओं में बैठने से रोक दिया था, जिसके बाद 10 अगस्त 2016 को उन्होंने अपने घर पर आत्महत्या कर ली थी। सुशांत ने अपने सुसाइड नोट में खुद को एक असफल व्यक्ति बताया था और लिखा था कि वह अब जीना नहीं चाहते।
ऐसी घटनाओं को दोबारा होने से रोकने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट ने कई अहम निर्देश जारी किए थे:
- अटेंडेंस नियमों की समीक्षा: हाईकोर्ट ने BCI को निर्देश दिया था कि वह तीन-वर्षीय और पांच-वर्षीय एलएलबी पाठ्यक्रमों के लिए अनिवार्य उपस्थिति मानदंडों का पुनर्मूल्यांकन करे।
- वैकल्पिक शैक्षणिक क्रेडिट: कोर्ट ने सुझाव दिया था कि नियमों में बदलाव कर छात्रों को मूट कोर्ट, सेमिनार, मॉडल पार्लियामेंट, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं और अदालतों की कार्यवाहियों में भाग लेने पर अटेंडेंस क्रेडिट दिया जाए।
- संस्थागत सीमाएं: कोई भी लॉ स्कूल या विश्वविद्यालय BCI द्वारा ‘लीगल एजुकेशन रूल्स’ के तहत निर्धारित न्यूनतम अटेंडेंस प्रतिशत से अधिक सख्त मानदंड लागू नहीं कर सकता।
- छात्र मानसिक स्वास्थ्य और शिकायत निवारण: सभी शैक्षणिक संस्थानों के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) विनियम, 2023 के तहत छात्र कल्याण और उनके मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु शिकायत निवारण समितियों (GRCs) का गठन अनिवार्य किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट के इस फैसले के मुख्य हिस्से (पैराग्राफ 249) पर अंतरिम रोक लगाने के बाद, लॉ कॉलेजों के पास एक बार फिर न्यूनतम अटेंडेंस लागू करने की शक्ति लौट आई है। जुलाई 2026 में होने वाली अगली सुनवाई के दौरान अब छात्र कल्याण बनाम शैक्षणिक अनुशासन के इस संवेदनशील मुद्दे पर विस्तृत कानूनी बहस देखने को मिलेगी।

