सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को दोहराते हुए स्पष्ट किया है कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 27 के तहत बरामद किए गए आपत्तिजनक सबूत केवल इसलिए खारिज नहीं किए जा सकते क्योंकि जब्ती के स्वतंत्र गवाह (पंच गवाह) मुकर (होस्टाइल) गए हैं। जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि यदि जांच अधिकारी (IO) की गवाही विश्वसनीय और ठोस है, तो उसके आधार पर की गई बरामदगी को वैध माना जाएगा।
शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी उपेंद्र खरे द्वारा दायर आपराधिक अपील को खारिज करते हुए की। इसके साथ ही न्यायालय ने मध्य प्रदेश के सतना में एक ही परिवार के चार सदस्यों की निर्मम हत्या के मामले में आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 और धारा 149 के तहत दी गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह घटना जुलाई 2002 की है। 20 जुलाई 2002 को सुबह लगभग 6:05 बजे अनुपम शुक्ला नाम के एक मुखबिर ने सतना के कोतवाली थाने में सूचना दी कि उनके चचेरे भाई राजेश शुक्ला से 18 जुलाई से संपर्क नहीं हो पा रहा था। जब अनुपम सुबह राजेश के घर पहुंचे, तो उन्होंने घर का पिछला दरवाजा खुला पाया। अंदर जाने पर उन्हें राजेश शुक्ला, उनकी पत्नी मधु शुक्ला, बेटे प्रियांशु शुक्ला और बहन विनीता शुक्ला के लहूलुहान शव मिले, जिन पर गंभीर चोटों के निशान थे।
इस घटना के बाद पुलिस ने धारा 302 के तहत एफआईआर दर्ज की। बाद में मृतका के शरीर और अलमारी से गहने गायब होने की शिकायत पर धारा 382 और 404 भी जोड़ी गई। जांच में सामने आया कि मृतक राजेश शुक्ला का पड़ोसी देवेंद्र सिंह, विनीता शुक्ला पर बुरी नजर रखता था और उसे परेशान करता था। देवेंद्र अक्सर अपीलकर्ता उपेंद्र खरे के साथ देखा जाता था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 18 जुलाई 2002 को देवेंद्र सिंह, उपेंद्र खरे, ज्ञानचंद उर्फ चुन्नी, नीरज कुमार और बबुआ उर्फ अभिषेक सिंह देशी कट्टा, कारतूस और ‘गुप्ति’ (तलवार जैसी छड़ी) लेकर राजेश शुक्ला के घर में घुसे। उन्होंने पहले पीड़ितों को शांत करने के लिए ‘कैलमपोज़’ (डायजेपाम) के इंजेक्शन दिए और बेहोश करने के बाद उनकी बेरहमी से हत्या कर दी।
अपेंड्रा खरे को 21 सितंबर 2002 को गिरफ्तार किया गया था। उसकी निशानदेही पर पुलिस ने इस्तेमाल की गई सुइयां, कैलमपोज़ इंजेक्शन की खाली शीशियां, एक सूती रस्सी और घटना के वक्त पहने गए कपड़े बरामद किए थे।
निचली अदालत (प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सतना) ने 15 अक्टूबर 2007 को उपेंद्र खरे को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने 21 जून 2012 को उसकी अपील खारिज कर सजा को बरकरार रखा, जिसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से तर्क
अपीलकर्ता के वकील श्री अमित सिंह ने दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए कई कानूनी आपत्तियां उठाईं:
- टूटी हुई कड़ियाँ: अभियोजन पक्ष का पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) पर आधारित है, और इसकी कड़ियों में कई जगह कमियां हैं।
- उद्देश्य का अभाव: अपीलकर्ता का हत्या करने का कोई निजी उद्देश्य नहीं था। छेड़छाड़ और बुरी नजर रखने का मुख्य आरोप सह-आरोपी देवेंद्र सिंह पर था।
- समान उद्देश्य की कमी: अपीलकर्ता से कोई हथियार या चोरी का सामान बरामद नहीं हुआ, जिससे साबित होता है कि उसका अन्य आरोपियों के साथ कोई “समान उद्देश्य” (Common Object) नहीं था।
- अवैध बरामदगी: अपीलकर्ता की निशानदेही पर की गई बरामदगी कानूनन गलत थी, क्योंकि जब्ती मेमो के दोनों स्वतंत्र गवाह अदालत में मुकर गए। इसके अलावा, घटना के दो महीने बाद बरामदगी होना व्यावहारिक रूप से असंभव लगता है।
- वैज्ञानिक साक्ष्यों की कमी: एफसीएल रिपोर्ट (Ex P-42) में केवल अपराध स्थल से मिली शीशियों की जांच की गई थी, न कि अपीलकर्ता से बरामद शीशियों की। बरामद कपड़ों पर मिले खून के इंसानी होने की पुष्टि नहीं हुई और धारा 313 CrPC के तहत अपीलकर्ता के बयान दर्ज करते समय इन कपड़ों की बरामदगी को लेकर कोई सवाल नहीं पूछा गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी रस्सी से गला घोंटने का कोई जिक्र नहीं था।
- गैर-कानूनी जमावड़ा: धारा 149 के तहत दोषसिद्धि अवैध है क्योंकि दोषी ठहराए गए व्यक्तियों की कुल संख्या पांच से कम थी, जो कानूनन “गैर-कानूनी जमावड़ा” (Unlawful Assembly) की शर्त को पूरा नहीं करती।
अपीलकर्ता के वकील ने प्रभु बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1962), बॉबी बनाम केरल राज्य (2023) और आशीष बाथम बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2002) के मामलों का हवाला दिया।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य की ओर से पेश उप महाधिवक्ता श्री भूपेंद्र प्रताप सिंह ने दलील दी कि अभियोजन पक्ष ने मजबूत परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से अपना मामला पूरी तरह साबित किया है। उन्होंने तर्क दिया कि सिर्फ गवाह के मुकर जाने से बरामदगी संदेहास्पद नहीं हो जाती। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पूर्ण पीठ (Full Bench) के फैसले गोवर्धन बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2025) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि यदि जांच अधिकारी जब्ती ज्ञापन को साबित कर देता है, तो गवाहों के मुकरने से जब्ती झूठी साबित नहीं होती।
अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के मेडिकल साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का बारीकी से अध्ययन किया। खंडपीठ ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत गवाहों के मुकर जाने के कानूनी पहलू पर विशेष जोर दिया और कहा:
“हम विद्वान वकील की इस दलील को स्वीकार करने में असमर्थ हैं, क्योंकि इस न्यायालय ने लगातार यह रुख अपनाया है कि केवल पंच गवाहों के मुकर जाने के आधार पर इस महत्वपूर्ण सबूत को खारिज नहीं किया जा सकता, बशर्ते बरामदगी को जांच अधिकारी के माध्यम से साबित किया गया हो।”
अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी अरुण सिंह (PW24) की गवाही से अपीलकर्ता के पास से कैलमपोज़ की शीशियां, कपड़े और रस्सी की बरामदगी पूरी तरह साबित होती है। इस कानूनी सिद्धांत को पुख्ता करने के लिए पीठ ने कई पुराने फैसलों का हवाला दिया:
- रमेशभाई मोहनभाई कोली बनाम गुजरात राज्य (2011): जिसमें कहा गया था कि पंच गवाहों के मुकरने से बरामदगी दूषित नहीं होती।
- मोदन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (1978): यदि बरामदगी करने वाले जांच अधिकारी की गवाही विश्वसनीय है, तो स्वतंत्र गवाहों के समर्थन न करने पर भी बरामदगी को स्वीकार किया जा सकता है।
- अंतर सिंह बनाम राजस्थान राज्य (2004): आपराधिक मामलों में अक्सर गवाह मुकर जाते हैं, लेकिन बरामदगी करने वाले अधिकारी के साक्ष्य इससे कमजोर नहीं पड़ते।
- मल्लिकार्जुन बनाम कर्नाटक राज्य (2019): जांच अधिकारी की गवाही पर भरोसा करके बरामदगी को साबित माना जा सकता है।
पुलिस जांच में रही कमियों को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:
“यह सच है कि इस मामले में जांच संतोषजनक (up to the mark) नहीं है और जांच एजेंसी से उम्मीद की जाती थी कि वह अधिक संवेदनशीलता के साथ जांच करेगी क्योंकि यह चार लोगों की जान जाने का मामला था।”
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच की खामियों के आधार पर न्याय का रास्ता नहीं रोका जा सकता:
“लेकिन केवल इस तथ्य के आधार पर कि जांच संतोषजनक नहीं थी, यह न्यायालय अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत अन्य महत्वपूर्ण सबूतों को खारिज नहीं कर सकता, विशेष रूप से डॉक्टर बी.एल. गुप्ता द्वारा साबित की गई पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अपीलकर्ता से बरामद कैलमपोज़ इंजेक्शन की शीशियों के साक्ष्य को।”
डॉ. बी.एल. गुप्ता (PW17) की गवाही और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साफ था कि मौत अत्यधिक रक्तस्राव और चोटों के कारण हुए शॉक से हुई थी। विसरा रिपोर्ट (Ex P-52) में भी स्पष्ट रूप से ‘डायजेपाम’ (कैलमपोज़) की मौजूदगी पाई गई, जो अपराध स्थल और आरोपी से बरामद चीजों से पूरी तरह मेल खाती थी।
न्यायालय का निर्णय
उच्चतम न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत और उच्च न्यायालय के फैसले साक्ष्यों के सही और उचित मूल्यांकन पर आधारित थे। सह-आरोपियों की दोषसिद्धि और अपीलों के निपटारे को देखते हुए, खंडपीठ ने उपेंद्र खरे की अपील को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।
मामला विवरण
- मामले का शीर्षक: उपेंद्र खरे बनाम मध्य प्रदेश राज्य
- आपराधिक अपील संख्या: 2013 की आपराधिक अपील संख्या 1937
- पीठ: न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले
- फैसले की तिथि: 25 मई, 2026

