दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में दिल्ली रेस क्लब (Delhi Race Club) के खिलाफ बेदखली की कार्यवाही आगे बढ़ाने का रास्ता साफ कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने केंद्र सरकार की अपील को स्वीकार करते हुए एकल पीठ (सिंगल जज) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने इस प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी।
अदालत ने मंगलवार को फैसला सुनाते हुए कहा, “चर्चा और दिए गए कारणों के आलोक में, अपील को स्वीकार किया जाता है और एकल पीठ के आदेश को खारिज किया जाता है।” हालांकि, कोर्ट के इस आदेश की विस्तृत प्रति (written order) अभी आना बाकी है।
क्या है 53 एकड़ जमीन का यह कानूनी विवाद?
यह पूरा विवाद राजधानी के बेहद पॉश इलाके में स्थित 53.4 एकड़ की बेशकीमती सरकारी जमीन से जुड़ा है। केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए स्थायी वकील आशीष दीक्षित ने सिंगल जज के 24 अप्रैल के फैसले को चुनौती दी थी, जिसने रेस क्लब को अस्थायी राहत दी थी।
दरअसल, 17 अप्रैल 2026 को सरकारी संपदा अधिकारी (Estate Officer) ने लोक परिसर (अप्राधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम की धारा 4(1) और 4(2)(b)(ii) के तहत दिल्ली रेस क्लब को एक ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया था। इस नोटिस में क्लब से पूछा गया था कि इस सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जे को लेकर उनके खिलाफ बेदखली की कार्रवाई क्यों न की जाए। लेकिन 24 अप्रैल को सिंगल जज ने इस पूरी प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी, जिसे अब खंडपीठ ने हटा दिया है।
केंद्र सरकार की दलीलें और कानून का हवाला
खंडपीठ के सामने केंद्र सरकार ने दलील दी कि सिंगल जज का हस्तक्षेप समय से पहले था। सरकार का कहना था कि कानून में इस तरह के भूमि विवादों के निपटारे के लिए पहले से ही एक मजबूत और स्पष्ट वैधानिक तंत्र (statutory mechanism) मौजूद है।
नियमों के तहत, ऐसे मामलों में पहले संपदा अधिकारी के सामने सुनवाई और फैसला होता है, और उसके बाद अधिनियम की धारा 9 के तहत अपील का विकल्प भी मिलता है। सरकार के अनुसार, इस निर्धारित कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार कर सीधे हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर करना उचित नहीं था।
समाप्त हो चुकी है लीज, कब्जा पूरी तरह अनाधिकृत
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि दिल्ली रेस क्लब की लीज (पट्टा) पहले ही समाप्त हो चुकी है। लीज खत्म होने के बाद भी इतनी बड़ी सरकारी जमीन पर क्लब का बने रहना पूरी तरह से गैर-कानूनी और अनाधिकृत है। सरकार का रुख स्पष्ट था कि यदि रेस क्लब के पास वैध कब्जे का कोई भी दावा या दलील है, तो उन्हें सबसे पहले इसे संपदा अधिकारी के समक्ष पेश करना चाहिए।
दिल्ली के प्रतिष्ठित क्लबों पर चौतरफा कार्रवाई
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राजधानी के कई अन्य ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित क्लब भी कानूनी रस्साकशी के दौर से गुजर रहे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि जिस दिन रेस क्लब को लेकर हाई कोर्ट का यह फैसला आया, ठीक उसी दिन अदालत की एक अन्य पीठ दिल्ली के ऐतिहासिक ‘दिल्ली जिमखाना क्लब’ (Delhi Gymkhana Club) को 5 जून तक खाली करने के सरकारी आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर भी सुनवाई करने वाली थी।

