ड्यूटी खत्म कर जा चुके डॉक्टर नर्स की गलतियों के लिए जिम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ एनेस्थेटिस्ट के खिलाफ आपराधिक मुकदमा रद्द किया

उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अस्पताल से अपनी शिफ्ट पूरी कर जा चुके किसी डॉक्टर को नर्सिंग स्टाफ द्वारा बाद में की गई प्रक्रियात्मक या यांत्रिक गलतियों के लिए आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति प्रसन्न बी. वराले की खंडपीठ ने केरल उच्च न्यायालय के आदेश को खारिज करते हुए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304-A (लापरवाही से मौत) के तहत एक वरिष्ठ एनेस्थेटिस्ट के खिलाफ वर्षों से लंबित आपराधिक मुकदमे को पूरी तरह से रद्द कर दिया।

न्यायालय ने इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि यदि किसी डॉक्टर को समानांतर दीवानी (सिविल या उपभोक्ता) कार्यवाही में गुण-दोष के आधार पर पहले ही बरी कर दिया गया है, तो उन्हीं तथ्यों पर आपराधिक मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है।

मामले की पृष्ठभूमि और तथ्य

यह मामला मरीज के.पी. मुरलीधरन की मृत्यु से जुड़ा है, जिन्हें 28 मई 2002 को कन्नूर के धनलक्ष्मी अस्पताल में बवासीर (पाइल्स) के ऑपरेशन के लिए भर्ती कराया गया था। अपीलकर्ता डॉ. सुप्रिया कुमारी एम.सी. उस अस्पताल में एक वरिष्ठ एनेस्थेटिस्ट के रूप में कार्यरत थीं।

29 मई 2002 को सुबह लगभग 9:30 बजे मरीज का ऑपरेशन सफलतापूर्वक पूरा हुआ, जिसके बाद उन्हें पोस्ट-ऑपरेटिव केयर वार्ड में स्थानांतरित कर दिया गया। अपीलकर्ता शाम 5:00 बजे अपनी शिफ्ट पूरी कर और मरीज की स्थिति स्थिर सुनिश्चित करने के बाद अस्पताल से चली गईं। उसी शाम लगभग 8:00 बजे के बाद मरीज की तबीयत बिगड़ने लगी और अंततः 30 मई 2002 को सुबह लगभग 4:00 बजे उनकी मृत्यु हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि मृतक की बाईं कोरोनरी धमनी में लक्षणहीन 80 प्रतिशत ब्लॉकेज (अवरोध) था और मृत्यु का मुख्य कारण “तीव्र कोरोनरी अपर्याप्तता (acute coronary insufficiency)” था।

मरीज की मौत के बाद, उनके भाई ने कन्नूर टाउन पुलिस स्टेशन में सर्जन डॉ. मुजीब रहमान (आरोपी नंबर 1) के खिलाफ धारा 304-A के तहत प्राथमिकी (FIR No. 432/2002) दर्ज कराई। इस शुरुआती एफआईआर में अपीलकर्ता के खिलाफ कोई आरोप नहीं था।

15 अप्रैल 2004 को पुलिस ने पहला आरोप पत्र दाखिल किया, जिसमें सर्जन के साथ-साथ अपीलकर्ता (आरोपी नंबर 2) और वार्ड नर्स रोसम्मा वर्गीज (आरोपी नंबर 3) को भी आरोपी बनाया गया। केरल उच्च न्यायालय ने बाद में इस आरोप पत्र को तकनीकी आधार पर रद्द कर दिया, लेकिन पुलिस को आगे की जांच की अनुमति दी। इसके बाद गठित चार सदस्यीय विशेषज्ञ मेडिकल पैनल ने 10 जुलाई 2008 को अपनी रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला कि मृत्यु अस्पताल के कर्मचारियों की घोर लापरवाही के कारण हुई और यदि योग्य व्यक्तियों द्वारा उचित रूप से दर्द निवारक (एनाल्जेसिया) दिया जाता, तो इसे रोका जा सकता था।

इसके बाद 9 सितंबर 2008 को दूसरा आरोप पत्र दाखिल किया गया, जिसके आधार पर न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC), कन्नूर ने मामले का संज्ञान लिया (C.C. No. 501/2008)। अपीलकर्ता द्वारा डिस्चार्ज और पुनरीक्षण के लिए दायर की गई याचिकाओं को मजिस्ट्रेट कोर्ट, सत्र न्यायालय और अंततः 16 अक्टूबर 2024 को केरल उच्च न्यायालय ने भी यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इन तर्कों को मुकदमे की सुनवाई (trial) के दौरान उपयुक्त मंच पर उठाया जाना चाहिए।

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इसी बीच, मृतक के परिवार ने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम, कन्नूर में अस्पताल और तीनों आरोपियों के खिलाफ चिकित्सा लापरवाही का दावा (CC No. 123/2004) दायर किया। 17 अप्रैल 2017 को फोरम ने अस्पताल, सर्जन और नर्स को सेवा में कमी के लिए उत्तरदायी ठहराया, लेकिन अपीलकर्ता (डॉ. सुप्रिया) को सभी दायित्वों से पूरी तरह बरी कर दिया। फोरम ने माना कि अपीलकर्ता ने नर्स को इंजेक्शन देने का कोई निर्देश नहीं दिया था। परिवार ने केरल राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के समक्ष इस फैसले को केवल मुआवजे की राशि (जो कि 12 लाख रुपये तय की गई थी) बढ़ाने के उद्देश्य से चुनौती दी, जिससे अपीलकर्ता की दोषमुक्ति को कोई चुनौती नहीं मिली और वह अंतिम हो गई।

पक्षों के मुख्य तर्क

अपीलकर्ता की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री आर. बसंत ने तर्क दिया कि डॉक्टर द्वारा नर्स को मौखिक रूप से इंजेक्शन देने का निर्देश देने का आरोप काफी देरी से लगाया गया और यह विरोधाभासों से भरा है। उन्होंने बताया कि नर्स रोसम्मा ने जांच के दौरान तीन बार अपने बयान बदले—शुरुआत में उसने कहा कि निर्देश सर्जन ने दिए थे, जबकि तीसरे बयान में उसने दावा किया कि अपीलकर्ता ने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर निर्देश दिए थे।

अपीलकर्ता ने यह भी दलील दी कि यदि यह मान भी लिया जाए कि निर्देश फोन पर दिए गए थे, तो भी इसे “लापरवाही या उतावलेपन का कृत्य” नहीं कहा जा सकता। डॉ. सुप्रिया की ड्यूटी शाम 5:00 बजे समाप्त हो चुकी थी और उन्होंने एक सही व चिकित्सकीय रूप से आवश्यक दवा (सेंसरकेन) की सिफारिश की थी। इसके बाद यदि नर्स इसे रीढ़ की हड्डी के सही हिस्से (एपिड्यूरल स्पेस) में इंजेक्ट करने में विफल रही, तो यह पूरी तरह से डॉक्टर के नियंत्रण से बाहर की बात थी।

अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय जैकब मैथ्यूज बनाम पंजाब राज्य का हवाला देते हुए कहा कि आपराधिक लापरवाही साबित करने के लिए दीवानी मुकदमों की तुलना में कहीं अधिक सख्त मानक की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त, राधेश्याम केजरीवाल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि जब उपभोक्ता फोरम द्वारा गुण-दोष के आधार पर राहत मिल चुकी है, तो उसी तथ्य पर आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रह सकती।

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प्रतिवादी (केरल राज्य) की दलीलें

केरल राज्य के वकील ने तर्क दिया कि पोस्टमार्टम और विशेषज्ञ पैनल की रिपोर्ट से चिकित्सा लापरवाही स्पष्ट रूप से स्थापित होती है। राज्य का कहना था कि ऑपरेशन के बाद जब मरीज को तेज दर्द हुआ, तो नर्स ने फोन पर अपीलकर्ता से परामर्श करने के बाद सेंसरकेन इंजेक्शन लगाया। चूंकि इंजेक्शन रीढ़ की हड्डी के सही स्थान तक नहीं पहुंचा—जिसकी पुष्टि पोस्टमार्टम के दौरान सुई के निशान के पास आई सूजन से हुई—इसलिए मरीज का दर्द कम नहीं हुआ। इस तीव्र दर्द के कारण उत्पन्न शारीरिक तनाव ने अंततः हृदय आघात (कार्डियक अरेस्ट) को ट्रिगर किया।

राज्य ने दलील दी कि नर्स के पास केवल एक वर्ष का अनुभव था और वह बिना किसी देखरेख के काम कर रही थी। अपीलकर्ता की यह घोर लापरवाही थी कि उन्होंने स्वयं उपस्थित होकर दवा का सही निष्पादन सुनिश्चित नहीं किया।

न्यायालय का विश्लेषण और कानूनी सिद्धांत

सर्वोच्च न्यायालय ने विशेषज्ञ पैनल की रिपोर्ट, नर्स के बयानों और आपराधिक लापरवाही से जुड़े स्थापित कानूनी सिद्धांतों का विस्तृत विश्लेषण करने के बाद निम्नलिखित महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:

1. आपराधिक लापरवाही और सन्निकट कारण (Proximate Cause) का अभाव

न्यायालय ने पाया कि अपीलकर्ता अपनी ड्यूटी पूरी कर शाम 5:00 बजे ही जा चुकी थीं और उस समय मरीज पूरी तरह स्थिर था। जब रात 8:00 बजे आपातकालीन स्थिति उत्पन्न हुई, तब अस्पताल में अन्य ऑन-ड्यूटी डॉक्टर और एक अन्य एनेस्थेटिस्ट शारीरिक रूप से मौजूद थे।

इंजेक्शन लगाने की प्रक्रिया पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा:

“निर्धारित दवा, सेंसरकेन, निर्विवाद रूप से स्थिति के लिए सही और आवश्यक दर्द निवारक थी। कोई भी दुर्घटना पूरी तरह से नर्स द्वारा इसे एपिड्यूरल स्पेस में ठीक से इंजेक्ट न कर पाने के यांत्रिक निष्पादन में हुई, जो ऑफ-ड्यूटी अपीलकर्ता के भौतिक नियंत्रण से पूरी तरह बाहर थी।”

अदालत ने माना कि किसी ऑफ-ड्यूटी विशेषज्ञ डॉक्टर पर नर्सिंग स्टाफ की प्रक्रियात्मक गलतियों या मरीज की पहले से मौजूद गुप्त हृदय बीमारी के लिए दोष मढ़ना सन्निकट कारण (causa causans) के सिद्धांत का अनुचित विस्तार होगा:

“एक ऑफ-ड्यूटी एनेस्थेटिस्ट पर छिपी हुई, अज्ञात हृदय रोग की स्थिति के लिए आपराधिक दायित्व मढ़ना प्रॉक्सिमेट कॉज (सन्निकट कारण) के कानूनी सिद्धांत की सीमाओं से परे है।”

2. आईपीसी की धारा 304-A के तहत दायित्व की सीमा

जैकब मैथ्यूज बनाम पंजाब राज्य के फैसले को दोहराते हुए कोर्ट ने कहा कि आपराधिक लापरवाही के लिए दीवानी मुकदमों की तुलना में बहुत ऊंचे दर्जे की लापरवाही साबित करनी होती है। कोर्ट ने जैकब मैथ्यूज मामले से उद्धृत किया:

“आपराधिक कानून के तहत लापरवाही के लिए किसी चिकित्सा पेशेवर पर मुकदमा चलाने के लिए यह दिखाया जाना चाहिए कि आरोपी ने कुछ ऐसा किया या कुछ ऐसा करने में विफल रहा जो दी गई परिस्थितियों में कोई भी सामान्य समझ और विवेक वाला चिकित्सा पेशेवर नहीं करता या करने में विफल नहीं होता। आरोपी डॉक्टर द्वारा लिया गया जोखिम ऐसा होना चाहिए जिससे होने वाली क्षति तत्काल संभावित हो।”

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पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि फोन पर एक मानक दर्द निवारक दवा की सलाह देना, भले ही सच मान लिया जाए, एक सामान्य पोस्ट-ऑपरेटिव चिकित्सकीय परामर्श है, न कि कोई गंभीर आपराधिक लापरवाही।

3. सिविल दोषमुक्ति का आपराधिक कार्यवाही पर प्रभाव

अदालत ने उपभोक्ता फोरम द्वारा अपीलकर्ता को दी गई पूर्ण दोषमुक्ति को उनका “सबसे अचूक कानूनी बचाव” माना। राधेश्याम केजरीवाल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य और प्रेम राज बनाम पूनम मेनन जैसे फैसलों का संदर्भ देते हुए पीठ ने कहा:

“…एक बार जब किसी आरोपी को दीवानी कार्यवाही में गुण-दोष के आधार पर दोषमुक्त कर दिया जाता है, तो समान आरोपों पर आपराधिक मुकदमा जारी रखने की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है।”

4. विशेषज्ञ चिकित्सा पैनल में प्रक्रियात्मक दोष

सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के मामले में एक गंभीर प्रक्रियात्मक खामी को भी उजागर किया। कोर्ट ने नोट किया कि गठित चार सदस्यीय विशेषज्ञ पैनल में कोई भी एनेस्थेटिस्ट शामिल नहीं था। किसी विशेषज्ञ समकक्ष (peer specialist) की अनुपस्थिति के कारण यह पैनल एपिड्यूरल एनेस्थीसिया जैसी जटिल तकनीकों के मूल्यांकन के लिए कानूनी रूप से सक्षम नहीं था।

न्यायालय का निर्णय

अपील को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केरल उच्च न्यायालय के 16 अक्टूबर 2024 के आदेश को निरस्त कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी-I, कन्नूर के समक्ष डॉ. सुप्रिया कुमारी एम.सी. के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमा (C.C. No. 501/2008) आधिकारिक रूप से खारिज कर दिया गया और उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।

मामले का विवरण

  • केस का शीर्षक: सुप्रिया कुमारी एम.सी. बनाम केरल राज्य व अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर (2026 की विशेष अनुमति याचिका (क्रिमिनल) नंबर 124/2025 से उत्पन्न)
  • पीठ: न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति प्रसन्न बी. वराले
  • निर्णय की तिथि: 25 मई, 2026

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