वैवाहिक विवादों में अदालती मुकदमों के ट्रांसफर को लेकर पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने आमतौर पर पत्नियों के पक्ष में झुके रहने वाले कानूनी रुख से अलग हटकर, एक पत्नी की केस ट्रांसफर करने की याचिका को खारिज कर दिया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां एक ओर पत्नी पर कोई पारिवारिक या बच्चों की जिम्मेदारी नहीं है, वहीं दूसरी ओर उसका पति गंभीर मानसिक अवसाद (डिप्रेशन) से जूझ रहा है और अकेले यात्रा करने की स्थिति में नहीं है।
यह आदेश जस्टिस निधि गुप्ता की एकल पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने पत्नी की उस याचिका को नामंजूर कर दिया जिसमें उसने अपने पति द्वारा दायर शादी रद्द करने (Annulment) के मुकदमे को पटियाला से जालंधर ट्रांसफर करने की मांग की थी। अदालत ने टिप्पणी की कि दोनों शहरों के बीच की दूरी महज 155 किलोमीटर है, जो बमुश्किल दो घंटे का सफर है और पत्नी को यह दूरी रोज नहीं, बल्कि केवल अदालती तारीखों पर ही तय करनी होगी।
मात्र 16 दिनों में टूट गया वैवाहिक रिश्ता
इस कानूनी विवाद की शुरुआत एक बेहद संक्षिप्त विवाह से हुई। दोनों का विवाह मार्च 2024 में सिख रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था। हालांकि, यह रिश्ता महज 16 से 17 दिनों तक ही चल पाया और दोनों अलग हो गए। इस शादी से उनकी कोई संतान नहीं है। अलग होने के बाद, पति ने पटियाला की सक्षम अदालत में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 12 के तहत विवाह को शून्य (अमान्य) घोषित करने के लिए याचिका दायर की।
इसके जवाब में, अलग रह रही पत्नी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और केस को जालंधर ट्रांसफर करने की मांग की।
पत्नी की दलील: ‘सफर है मुश्किल, साथ जाने के लिए कोई पुरुष नहीं’
पत्नी की ओर से पेश वकील संदीप शर्मा ने अदालत में तर्क दिया कि जालंधर से पटियाला जाकर सुनवाई में शामिल होना उनके लिए एक बड़ी कठिनाई है। उन्होंने दलील दी कि उनके माता-पिता बुजुर्ग हैं और बढ़ती उम्र की बीमारियों से ग्रसित हैं, जिसके कारण परिवार में ऐसा कोई “सक्षम पुरुष सदस्य” नहीं है जो उनके साथ कोर्ट जा सके।
इसके साथ ही, पत्नी ने दावा किया कि वह वर्तमान में बेरोजगार हैं और पूरी तरह से अपने माता-पिता के रहम-ओ-करम पर जी रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके पति पंजाबी फिल्म और संगीत उद्योग में एक निर्देशक के रूप में काम करते हैं और हर महीने 1.5 से 2 लाख रुपये कमाते हैं, लेकिन उन्हें कोई भरण-पोषण (मेंटेनेंस) नहीं दे रहे हैं।
पति की दलील: ‘गंभीर मानसिक बीमारी से है संघर्ष, इलाज जारी’
दूसरी तरफ, पति के वकील नितीश गर्ग ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह से निराधार और मनगढ़ंत करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि मार्च 2024 से ही दोनों अलग रह रहे हैं और शादी केवल दो हफ्ते ही चली थी, इसलिए पत्नी पर किसी प्रकार की पारिवारिक या बच्चों की जिम्मेदारी नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि केस ट्रांसफर की यह याचिका केवल पति को शारीरिक और मानसिक रूप से परेशान करने के उद्देश्य से दायर की गई है।
वकील नितीश गर्ग ने अदालत के समक्ष पति के मेडिकल रिकॉर्ड (एनेक्सचर R-1) पेश किए। इन दस्तावेजों के अनुसार, पति वर्तमान में गंभीर डिप्रेशन, उदासी, भय, घबराहट (Anxiety), सोशल फोबिया और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं और उनका इलाज चल रहा है। रिपोर्ट में साफ लिखा था कि पति अकेले सफर नहीं कर सकते और उन्हें हमेशा अपने माता-पिता के सहारे की जरूरत होती है।
कानूनी मिसाल और हाई कोर्ट का अंतिम फैसला
जस्टिस निधि गुप्ता ने अपने फैसले में स्वीकार किया कि वैवाहिक विवादों से जुड़ी ट्रांसफर याचिकाओं में स्थापित कानूनी स्थिति सामान्यतः पत्नी के पक्ष में झुकी होती है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह कोई पूर्ण या बिना अपवाद का नियम नहीं है। हाई कोर्ट ने रेखांकित किया कि समान परिस्थितियों में देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) और खुद पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट पहले भी पत्नियों को ऐसी राहत देने से इनकार कर चुके हैं।
अदालत ने पाया कि चूंकि पति के पास अकेले यात्रा न कर पाने के पुख्ता चिकित्सकीय प्रमाण हैं, जबकि पत्नी की ओर से ऐसी कोई गंभीर शारीरिक या मानसिक असमर्थता नहीं दर्शाई गई है, इसलिए केस को ट्रांसफर करने का कोई औचित्य नहीं बनता।
हाई कोर्ट ने 14 मई को जारी अपने आदेश में कहा:
“प्रतिवादी (पति) के विपरीत, याचिकाकर्ता-पत्नी पर कोई जिम्मेदारी नहीं है, क्योंकि यह प्रतिवादी (पति) है जो डिप्रेशन आदि से पीड़ित है। उसके मेडिकल रिकॉर्ड (एनेक्सचर R-1) से यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित होता है कि वह अपने माता-पिता की मदद के बिना अकेले यात्रा नहीं कर सकता।”
इस टिप्पणी के साथ अदालत ने शादी रद्द करने की कानूनी कार्यवाही को पटियाला की अदालत में ही जारी रखने का फैसला सुनाया।

