‘सिर्फ रोना रोने से क्या होगा?’: सरकारी वकीलों की कमी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, राज्यों से पूछा- परीक्षाएं समय पर क्यों नहीं होतीं?

देश की आपराधिक न्याय प्रणाली में मुकदमों के लंबित होने और हो रही देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि अदालतों में मुकदमों की कछुआ चाल का एक बड़ा कारण सरकारी वकीलों (Public Prosecutors) की भारी कमी है। शीर्ष अदालत ने राज्यों को आदेश दिया है कि वे केवल व्यवस्था को कोसने के बजाय खाली पड़े पदों को तुरंत भरने की दिशा में काम करें।

जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भूयान की पीठ ने राज्य प्रशासनों द्वारा भर्ती परीक्षाओं के आयोजन में की जा रही ढिलाई पर गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि एक तरफ योग्य उम्मीदवार नियुक्तियों का इंतजार कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अदालतें स्टाफ की कमी से जूझ रही हैं।

पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए पूछा, “राज्य सरकारें खुद कुछ नहीं कर रही हैं और सिर्फ यह रट लगा रही हैं कि ‘आपराधिक न्याय में देरी हो रही है, देरी हो रही है।’ आखिर समस्या की असली जड़ कहां है? राज्यों का अभियोजन निदेशालय (Directorate of Prosecution) इस गंभीर मुद्दे पर ध्यान क्यों नहीं दे रहा है? आप समय पर अभियोजन परीक्षाएं आयोजित क्यों नहीं करा रहे हैं?”

सुप्रीम कोर्ट की ये महत्वपूर्ण टिप्पणियां नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) अधिनियम के तहत दर्ज एक मामले की सुनवाई के दौरान आईं, जिसमें अदालत ने अंततः आरोपी को जमानत दे दी।

कथनी और करनी में अंतर

अदालत ने राज्य सरकारों के दोहरे रुख को भी रेखांकित किया। पीठ ने कहा कि एक तरफ तो सार्वजनिक मंचों से न्याय में देरी को लेकर चिंता जताई जाती है, लेकिन दूसरी तरफ इस समस्या के सबसे बड़े समाधान—सरकारी वकीलों की रिक्तियों को भरने—पर चुप्पी साध ली जाती है, जबकि यह पूरी तरह से कार्यपालिका (Executive) के अधिकार क्षेत्र का मामला है।

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जस्टिस नागरत्ना ने सवाल उठाया, “हम देखते हैं कि अक्सर बड़े-बड़े बयान दिए जाते हैं कि देश में आपराधिक न्याय वितरण प्रणाली में बहुत देरी हो रही है। लेकिन यह समस्या पैदा कहां से हो रही है?”

पीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका सुचारू रूप से काम करने के लिए रूपरेखा और सुझाव दे सकती है, लेकिन उन्हें जमीन पर लागू करने की पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकारों की ही है। कोर्ट ने कहा, “आप हमसे पूछिए, हम आपको सुझाव देंगे। लेकिन क्या आप उन्हें लागू करेंगे? असली मुद्दा यही है।”

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गर्मियों की छुट्टियों में समाधान निकालने का निर्देश

इस संकट से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यावहारिक रास्ता सुझाया है। अदालत ने सुनवाई के दौरान उपस्थित सभी राज्यों के वकीलों (State Counsel) को निर्देश दिया कि वे इस विषय को अपनी-अपनी सरकारों के समक्ष पूरी गंभीरता से उठाएं।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि आगामी गर्मियों की छुट्टियों के समय का उपयोग इस समस्या के प्रशासनिक समाधान के लिए किया जाना चाहिए।

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जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “राज्य सरकार की ओर से पेश हो रहे सभी वकील कृपया इस मामले को अपने राज्य के कानून मंत्री, महाधिवक्ता (Advocate General) और अभियोजन निदेशक के संज्ञान में लाएं। गर्मियों की छुट्टियों के इस समय का उपयोग करें ताकि इन प्रभावी सुझावों को लागू किया जा सके।” इसके साथ ही उन्होंने राज्यों को सीधे कोर्ट हॉलों में सरकारी वकीलों की नियुक्ति सुनिश्चित करने की सलाह दी।

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