भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने देश की लोकतांत्रिक समानता को रेखांकित करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण संदेश दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि देश का संविधान कुछ मुट्ठी भर रईसों या अभिजात वर्ग (कॉस्मोपॉलिटन) की जागीर नहीं है, जो अदालतों में भारी-भरकम खर्च और देश के सबसे महंगे वकीलों की सेवाएं लेने की क्षमता रखते हैं।
चीफ जस्टिस ने जोर देकर कहा कि यह बुनियादी दस्तावेज समाज के हर तबके के लिए है—चाहे वह बड़े शहरों में रहने वाले लोग हों, ग्रामीण क्षेत्रों के नागरिक हों, या फिर समाज के सबसे गरीब और हाशिए पर खड़े लोग।
एक गरिमामयी पुस्तक विमोचन और दूर से भेजा गया संदेश
मुख्य न्यायाधीश ने यह विचार वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह के संस्मरण (मेमोआयर) ‘द कॉन्स्टिट्यूशन इज माई होम: कन्वर्सेशंस ऑन ए लाइफ इन लॉ’ के विमोचन समारोह के दौरान व्यक्त किए।
इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में जस्टिस सूर्यकांत मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित थे। हालांकि, ब्रिक्स (BRICS) देशों के न्यायाधीशों की एक आगामी महत्वपूर्ण बैठक में व्यस्तता के कारण वे व्यक्तिगत रूप से कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके। उन्होंने वीडियो संदेश के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, इंदिरा जयसिंह को बधाई दी और व्यक्तिगत रूप से न पहुंच पाने पर खेद व्यक्त किया।
जयसिंह की पुस्तक के शीर्षक को आधार बनाते हुए सीजेआई ने संविधान को समाज के लिए एक साझा ठिकाना बताया। उन्होंने कहा:
“संविधान वास्तव में हमारा साझा घर है। इस पर न तो केवल जजों का अधिकार है, न वकीलों का और न ही सरकारी संस्थाओं का। इस पर देश के हर नागरिक का बराबर हक है—चाहे वह शहर का हो या गांव का, सबसे गरीब हो या समाज के अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति, जो न्याय की उम्मीद लेकर इस ढांचे पर भरोसा करता है।”
कोर्ट रूम से परे: एक जीवंत और सक्रिय दस्तावेज
CJI सूर्यकांत ने उस सोच को खारिज किया जो संविधान को महज एक अकादमिक या किताबों में बंद रहने वाला दस्तावेज मानती है। उन्होंने इसे भारतीय समाज की रोजमर्रा की जिंदगी में सक्रिय रहने वाली एक जीवंत ताकत के रूप में पेश किया।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भले ही संविधान अदालतों, चैंबरों और कानूनी बहसों का मार्गदर्शन करता है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता केवल कानूनी जीतों से नहीं मापी जा सकती। संविधान का असली असर “आम नागरिकों के जीवन और हमारे लोकतंत्र के चरित्र” में दिखाई देता है।
लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती का सूत्र
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के सुचारू संचालन पर बात करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि संविधानवाद का मूल मंत्र अधिकारों और सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाए रखना है। उन्होंने देश की संस्थाओं को बेहतर ढंग से चलाने के लिए कुछ बुनियादी स्तंभों की वकालत की:
- संतुलन और जवाबदेही (Accountability)
- पारदर्शिता (Transparency)
- मूल संवैधानिक आदर्शों के प्रति निष्ठा
उन्होंने अंत में कहा कि इस नैतिक दिशा-सूचक को बनाए रखकर ही कोई भी लोकतांत्रिक समाज अपनी मूल पहचान और आदर्शों को खोए बिना बदलते समय और परिस्थितियों के अनुकूल खुद को ढाल सकता है।

