नीतिगत वादों से बचने के लिए ‘उमादेवी’ फैसले की आड़ नहीं ले सकती सरकार: सुप्रीम कोर्ट ने छूटे हुए कर्मचारियों के नियमितीकरण का दिया आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने गुवाहाटी हाईकोर्ट की खंडपीठ के एक फैसले को खारिज करते हुए निर्णय सुनाया है कि असम सरकार उन मस्टर रोल, वर्क चार्ज्ड और कैजुअल कर्मचारियों को नियमितीकरण के लाभ से वंचित नहीं कर सकती, जो केवल लिपिकीय गलतियों (clerical errors) और प्रशासनिक खामियों के कारण वर्ष 2005 की राज्य नीति से बाहर रह गए थे।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार किसी विशेष वर्ग को लाभ पहुंचाने के लिए कोई नीति बनाती है और उसे बहुसंख्यक कर्मचारियों पर लागू कर देती है, तो संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत वह इसे सभी पर समान रूप से लागू करने के लिए बाध्य है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के सिंगल जज द्वारा वर्ष 2013 में दिए गए उस आदेश को बहाल कर दिया है, जिसमें 1 अप्रैल, 1993 से पहले नियुक्त हुए पात्र छूटे हुए कर्मचारियों को नियमित करने और सभी परिणामी पेंशन व सेवानिवृत्ति लाभ देने का निर्देश दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

असम सरकार ने वर्ष 1980 से लोक निर्माण विकास और सड़क रखरखाव जैसे कार्यों के लिए मस्टर रोल कर्मचारियों की नियुक्ति शुरू की थी। बढ़ते कार्यभार को देखते हुए, 23 सितंबर, 1983 को असम कैबिनेट ने निर्णय लिया कि 15 साल की सेवा पूरी करने वाले सभी मस्टर रोल कर्मचारियों को ग्रेड-IV कर्मचारी के रूप में नियमित किया जाएगा।

यद्यपि इसके लिए शुरू में कोई औपचारिक दिशा-निर्देश नहीं बनाए गए थे, लेकिन मुख्य सचिव ने 15 मार्च, 1984 को सूचित किया कि 15 वर्ष की निरंतर सेवा पूरी करने वाले कर्मचारियों को 1 अगस्त, 1984 से नियमित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, पांच वर्ष की सेवा पूरी करने वाले वर्क चार्ज्ड कर्मचारियों को भी नियमित स्थापना के अंतर्गत लाया जाना था।

प्रशासनिक स्तर पर लगातार हो रही देरी के कारण, मुख्य सचिव ने 20 अप्रैल, 1995 को एक कार्यालय ज्ञापन (O.M.) जारी किया, जिसमें सभी विभागों को 1 अप्रैल, 1993 से पहले नियुक्त मस्टर रोल और वर्क चार्ज्ड कर्मचारियों के नियमितीकरण की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया गया। इसके बाद 11 अक्टूबर, 1995 को एक अन्य कार्यालय ज्ञापन जारी कर भविष्य में ऐसे कर्मचारियों की नियुक्ति पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई।

जब गुवाहाटी हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के समक्ष जितेंद्र कलिता बनाम असम राज्य मामले में 1995 के कार्यालय ज्ञापन की वैधता पर विचार चल रहा था, उसी दौरान असम कैबिनेट ने 22 जुलाई, 2005 को एक बार फिर 1 अप्रैल, 1993 से पहले नियुक्त और निरंतर कार्यरत कर्मचारियों को नियमित करने का निर्णय लिया। इस नीति के तहत वित्त विभाग ने 5,892 वर्क चार्ज्ड ग्रेड पदों और 25,069 ग्रेड-IV पदों के सृजन को मंजूरी दी, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 30,000 कर्मचारियों को नियमित किया गया।

हालांकि, 17 मई, 2006 को जितेंद्र कलिता मामले में हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने निर्णय दिया कि 1995 के कार्यालय ज्ञापन के तहत आगे कोई नियमितीकरण नहीं किया जाएगा, लेकिन इस पीठ ने 22 जुलाई, 2005 के कैबिनेट निर्णय की वैधता पर कोई टिप्पणी नहीं की थी।

प्रशासनिक अनदेखी, नामों की वर्तनी (spelling) में लिपिकीय त्रुटियों और असावधानी के कारण कई पात्र कर्मचारी इस नियमितीकरण प्रक्रिया से बाहर रह गए। इसके बाद रमणी डेका बनाम असम राज्य सहित कई याचिकाएं हाईकोर्ट में दायर की गईं। इन मामलों की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने मुख्य सचिव के माध्यम से हलफनामा दायर कर स्वीकार किया कि लगभग 3,720 पात्र कर्मचारी अभी भी नियमितीकरण से छूटे हुए हैं और उनके लिए एक विशेष नीति तैयार की जा रही है।

लेकिन वर्ष 2012 में, राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में एक विविध आवेदन दायर कर यह दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक सचिव, कर्नाटक राज्य बनाम उमादेवी (2006) फैसले के कारण इस नीति को लागू करने में कानूनी बाधा उत्पन्न हो गई है। जब 27 मार्च, 2012 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस पर सहमति देने से इनकार कर दिया, तो वित्त विभाग ने 16 जून, 2012 को एक नया कार्यालय ज्ञापन जारी कर आगे के नियमितीकरण पर पूरी तरह रोक लगा दी।

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अपीलकर्ताओं ने इस 2012 के कार्यालय ज्ञापन को हाईकोर्ट के सिंगल जज के समक्ष चुनौती दी। 20 दिसंबर, 2013 को सिंगल जज ने 2012 के इस ज्ञापन को रद्द कर दिया और कर्मचारियों को नियमित करने का निर्देश दिया। हालांकि, 8 जून, 2017 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने असम राज्य बनाम उपेन दास मामले में सिंगल जज के फैसले को उलट दिया और कहा कि स्वीकृत रिक्त पदों पर नियुक्ति न होने के कारण इन कर्मचारियों को नियमित नहीं किया जा सकता। इसके बाद अपीलकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से:

वरिष्ठ वकील श्री मनीष गोस्वामी और सुश्री अनीता शेनॉय ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि:

  • लगभग 30,000 समान कर्मचारियों को नियमित करने के बाद कुछ कर्मचारियों को नियमितीकरण के लाभ से वंचित करना पूरी तरह से मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
  • अपीलकर्ता 1 अप्रैल, 1993 से पहले सेवा में आए थे और उन्होंने दशकों तक निरंतर सेवा दी है। इस प्रक्रिया से उनका बाहर रह जाना पूरी तरह से राज्य तंत्र की लिपिकीय गलतियों और प्रशासनिक उदासीनता के कारण था।
  • राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के समक्ष हलफनामा देकर छूटे हुए कर्मचारियों के लिए नीति बनाने की प्रतिबद्धता जताई थी, इसलिए वह अब अपनी इस कानूनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती।
  • उमादेवी का फैसला नियमितीकरण पर पूर्ण रोक नहीं लगाता। अपीलकर्ता संविधान के विपरीत किसी पिछले दरवाजे से प्रवेश की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे केवल 2005 की कैबिनेट नीति के समान क्रियान्वयन की मांग कर रहे हैं।
  • एम.एल. केसरी के सिद्धांत के अनुसार, एकमुश्त उपाय (one-time measure) को तब तक अधूरा माना जाना चाहिए जब तक कि प्रशासनिक अनदेखी के कारण छूटे हुए सभी पात्र कर्मचारियों के मामलों पर विचार न कर लिया जाए।

प्रतिवादी (असम राज्य) की ओर से:

राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील श्री जयदीप गुप्ता ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि:

  • अपीलकर्ता कभी भी किसी स्वीकृत रिक्त पद पर नियुक्त नहीं हुए थे और न ही उनकी नियुक्ति कानून द्वारा स्थापित किसी नियमित चयन प्रक्रिया के माध्यम से हुई थी।
  • कैबिनेट के निर्णय या प्रशासनिक निर्देश संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के मूल ढांचे से ऊपर नहीं हो सकते, विशेष रूप से उमादेवी मामले में संविधान पीठ के निर्णय के बाद।
  • उमादेवी फैसले के पैराग्राफ 53 (जैसा कि एम.एल. केसरी में स्पष्ट किया गया है) के तहत मिलने वाली छूट केवल उन ‘अनियमित’ नियुक्तियों के लिए है जहां कर्मचारी स्वीकृत रिक्त पदों पर कम से कम दस वर्षों से बिना किसी अदालती आदेश के संरक्षण के काम कर रहे हों। अपीलकर्ताओं की नियुक्ति ‘अवैध’ श्रेणी में आती है।
  • समानता का सिद्धांत केवल सकारात्मक कानून के संदर्भ में लागू होता है; यदि पूर्व में कुछ गलत नियमितीकरण हुए भी हैं, तो उनके आधार पर नए गलत दावों या नियमितीकरण की मांग को अनुच्छेद 14 के तहत स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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न्यायालय का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की समीक्षा करते हुए स्पष्ट किया कि लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक व्यवस्थाओं में राज्य सरकार की कार्रवाइयों को निष्पक्षता और निरंतरता की कसौटी पर खरा उतरना होगा। जस्टिस संदीप मेहता ने निर्णय में रेखांकित किया:

“लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक व्यवस्थाओं से जुड़े मामलों में, विशेष रूप से जहां राज्य और उसके अंग अपने कार्यों के निष्पादन में कुछ श्रेणियों के श्रमिकों की सेवाओं का उपयोग करते रहते हैं, अदालतों को अक्सर यह जांचना आवश्यक होता है कि क्या कार्यकारी कार्रवाई निष्पक्षता और निरंतरता के संवैधानिक मानकों के अनुरूप है। सार्वजनिक शक्ति का प्रयोग ऐसे श्रमिकों पर निरंतर सरकारी निर्भरता द्वारा पैदा की गई व्यावहारिक वास्तविकताओं से अलग नहीं किया जा सकता है।”

अदालत ने पाया कि अपीलकर्ताओं का मामला उमादेवी के तहत मिलने वाली अदालती छूट का नहीं है, बल्कि यह कैबिनेट की अपनी 2005 की नीति के समान क्रियान्वयन का मामला है:

“यदि कर्मचारियों के दो समूह एक घोषित नीति के तहत नियुक्ति की तारीख, कर्तव्यों की प्रकृति, सेवा की अवधि और पात्रता के मामले में समान स्तर पर हैं, तो राज्य बिना कोई वैध अंतर दिखाए एक बड़े समूह को लाभ नहीं दे सकता और छोटे समूह को इससे वंचित नहीं कर सकता। समानता किसी नीति को चुनिंदा या आंशिक रूप से लागू करने की अनुमति नहीं देती है।”

न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि इन कर्मचारियों का बाहर छूटना उनकी किसी गलती के कारण नहीं बल्कि पूरी तरह राज्य की त्रुटियों के कारण था।

‘मॉडल एम्प्लॉयर’ (आदर्श नियोक्ता) के रूप में राज्य का कर्तव्य

सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार द्वारा 2012 में हाईकोर्ट के समक्ष यह गुहार लगाने की कड़ी आलोचना की कि वह उमादेवी फैसले के कारण अपनी ही नीति लागू नहीं कर पा रही है। कोर्ट ने इसे प्रशासनिक शक्तियों का आत्मसमर्पण माना:

“नियमितीकरण, जहां कानून में स्वीकार्य हो, एक कार्यकारी कार्य है… राज्य द्वारा इस तरह से अनुमति मांगना वास्तव में अपनी कार्यकारी शक्ति के आत्मसमर्पण के समान था। कार्यपालिका अदालत पर बोझ डालकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती…”

न्यायालय ने कहा कि एक आदर्श नियोक्ता के रूप में सरकार को अपने कर्मचारियों के अधिकारों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए:

“संवैधानिक न्यायालय के समक्ष बार-बार वचन देना और उसके बाद उनसे पीछे हट जाना एक आदर्श नियोक्ता से अपेक्षित मानकों के अनुरूप नहीं है। अदालत द्वारा दर्ज किया गया वचन कोई आकस्मिक बयान नहीं है, बल्कि एक गंभीर प्रतिनिधित्व है जिसके आधार पर न्यायिक आदेश पारित किए जाते हैं। राज्य अपनी ही बातों का खंडन और मंडन नहीं कर सकता।”

कोर्ट ने जगगो बनाम भारत संघ (2024), भोला नाथ बनाम झारखंड राज्य (2026), और धर्म सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि उमादेवी निर्णय को कर्मचारियों के शोषण या उनके कानूनी दावों को खारिज करने के लिए एक हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता:

“राज्य ने 1 अप्रैल, 1993 से पहले अपीलकर्ताओं को काम पर रखा, दशकों तक उनकी सेवाओं का लगातार उपयोग किया, और खुद करीब 30,000 समान रूप से स्थित कर्मचारियों को नियमित करने के लिए कैबिनेट नीति बनाकर उसे लागू किया, वह अब उमादेवी (सुप्रीम कोर्ट) के फैसले की संकीर्ण या तकनीकी व्याख्या की आड़ लेकर अपीलकर्ताओं को इस लाभ से बाहर नहीं कर सकता।”

न्यायालय का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं की याचिकाएं स्वीकार करते हुए गुवाहाटी हाईकोर्ट की खंडपीठ के 8 जून, 2017 के फैसले को निरस्त कर दिया और सिंगल जज के 20 दिसंबर, 2013 के आदेश को बहाल कर दिया।

न्यायालय ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. नियमितीकरण का लाभ: अपीलकर्ताओं को 22 जुलाई, 2005 के कैबिनेट निर्णय के तहत उसी तिथि से नियमित माना जाएगा जिस तिथि से पूर्व में 30,000 कर्मचारियों को इसका लाभ दिया गया था।
  2. पदों का सृजन: असम सरकार छूटे हुए पात्र अपीलकर्ताओं की पहचान कर उनका सत्यापन करेगी और यदि आवश्यक हो, तो उनके नियमितीकरण के लिए सुपरन्यूमरेरी पद (अधिसंख्य पद) सृजित करेगी।
  3. परिणामी लाभ: नियमितीकरण के बाद अपीलकर्ता नियमित वेतनमान, सेवा की निरंतरता, और सभी लागू पेंशन व सेवानिवृत्ति लाभों के हकदार होंगे।
  4. सेवानिवृत्त कर्मचारी: सेवानिवृत्त हो चुके अपीलकर्ताओं को परिणामी मौद्रिक लाभों के साथ केवल पेंशन, ग्रेच्युटी और टर्मिनल बकाए की पुनर्गणना के उद्देश्य से प्रासंगिक तिथि से उनके सेवानिवृत्त होने की तारीख तक के लिए सांकेतिक नियमितीकरण (notional regularization) दिया जाएगा।
  5. दिवंगत कर्मचारी: मृत अपीलकर्ताओं के मामले में उनके सभी बकाए और अन्य लाभ कानून के अनुसार उनके वैध कानूनी वारिसों को जारी किए जाएंगे।
  6. समय सीमा: वित्तीय बकाए की गणना और भुगतान सहित पूरी प्रक्रिया को इस निर्णय की तारीख से एक वर्ष के भीतर पूरा किया जाना आवश्यक है।
  7. दायरा: उपरोक्त निर्देशों का लाभ केवल उन अपीलकर्ताओं को मिलेगा जो 22 जुलाई, 2005 के कैबिनेट निर्णय में निर्धारित कट-ऑफ तारीख यानी 1 अप्रैल, 1993 से पहले संबंधित विभागों में कार्यरत थे।
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संबंधित अन्य अपीलें

  • वर्क चार्ज्ड कर्मचारी (सिविल अपील संख्या 4519 और 4520 वर्ष 2025): कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्क चार्ज्ड कर्मचारी मस्टर रोल कर्मचारियों से भिन्न एक अलग श्रेणी हैं। खंडपीठ द्वारा 2017 में उनके खिलाफ की गई टिप्पणियों को खारिज करते हुए कोर्ट ने ‘ऑल असम वर्क चार्ज एम्प्लॉई एसोसिएशन’ के सदस्यों को सरकार के समक्ष अपनी पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति दावों को उठाने की स्वतंत्रता प्रदान की।
  • अंतर्देशीय जल परिवहन कर्मचारी (सिविल अपील संख्या 4523 वर्ष 2025): कोर्ट ने मस्टर रोल ferry कर्मचारियों के पेंशन दावों को खारिज करने वाले हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द कर दिया और उन्हें उचित नीतिगत ढांचे के तहत अपने दावों को संबंधित प्राधिकारी के समक्ष रखने की छूट दी।

केस का विवरण

  • केस का शीर्षक: सुखेंदु भट्टाचार्य और अन्य बनाम असम राज्य और अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 4514 वर्ष 2025 (सिविल अपील संख्या 4515, 4516, 4517, 4518, 4519, 4520, और 4523 वर्ष 2025 के साथ)
  • पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
  • फैसले की तारीख: 21 मई, 2026

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