जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने लैंगिक न्याय (gender justice) की दिशा में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए एक बड़े बैंक को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि बैंक अपनी महिला संविदा कर्मचारियों (contractual employees) के खिलाफ अपनी ‘संस्थागत ताकत’ का इस्तेमाल कर उन्हें मातृत्व लाभ (maternity benefits) देने से रोक रहा था, जो कि पूरी तरह असहनीय है।
मुख्य न्यायाधीश अरुण पल्ली और न्यायमूर्ति रजनीश ओसवाल की खंडपीठ ने महिला कर्मचारियों के पक्ष में दिए गए पिछले फैसले को बरकरार रखते हुए बैंक द्वारा दायर की गई दो अपीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि मातृत्व का सम्मान और सहयोग करने के बजाय, इस “बैंकिंग दिग्गज” ने अपनी महिला कर्मचारियों के साथ द्वेषपूर्ण और प्रतिकूल भेदभाव किया।
खंडपीठ ने अपने 20 मई के आदेश में कहा, “मातृत्व लाभ देने से इनकार करना न केवल मातृत्व के इस ‘दोहरे बोझ’ की अनदेखी करना है, बल्कि उन महिलाओं के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने के हमारे संवैधानिक दायित्वों में पूरी तरह विफल होना है जो अगली पीढ़ी के नागरिकों को जन्म देने के लिए सचमुच कड़ा संघर्ष करती हैं।”
विवाद क्या था? दो साल का अनुबंध और ‘असाधारण अवकाश’ की शर्त
यह पूरा मामला दो साल के अनुबंध (contract) पर नियुक्त की गईं महिला कर्मचारियों से जुड़ा है। उनके अनुबंध की शर्तों के अनुसार, दो साल की सेवा अवधि पूरी होने के बाद उनके कार्य मूल्यांकन (performance assessment) के आधार पर उन्हें नियमित (regularisation) किया जाना था।
हालांकि शुरुआती अनुबंध में मातृत्व अवकाश का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था, लेकिन महिला कर्मचारियों के अनुरोध पर बैंक ने उन्हें औपचारिक मातृत्व अवकाश देने के बजाय ‘असाधारण अवकाश’ (extraordinary leave) मंजूर किया। लेकिन इसके साथ एक कड़ी शर्त यह रख दी गई कि कर्मचारी जितने दिनों की छुट्टी लेंगी, उनका दो साल का अनुबंध काल भी उतने ही दिनों के लिए आगे बढ़ा दिया जाएगा।
कर्मचारियों ने शुरुआत में इन शर्तों को स्वीकार कर लिया और छुट्टी ली। लेकिन बाद में उन्होंने अपने नियमितीकरण (regularisation) के आदेश को चुनौती दी, क्योंकि इस आदेश में मातृत्व अवकाश की अवधि को उनकी दो साल की अनिवार्य सेवा अवधि में नहीं जोड़ा गया था। इसके कारण उनका नियमितीकरण टल गया और अंततः वे 2021 में नियमित हो सकीं।
संवैधानिक दायित्व और लैंगिक न्याय
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में जोर देकर कहा कि यदि मातृत्व लाभ से जुड़े नियम अस्पष्ट या मौन हों, तो उनका अर्थ हमेशा कर्मचारियों के कल्याण (beneficial construction) के संदर्भ में ही निकाला जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि इसके विपरीत कोई भी व्याख्या न केवल कानून की मूल भावना को ठेस पहुंचाएगी, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 में निहित लैंगिक न्याय के सिद्धांतों के भी बिल्कुल खिलाफ होगी। कोर्ट ने साफ किया कि मातृत्व लाभों की व्याख्या का एकमात्र उद्देश्य महिला कर्मचारियों के हितों को आगे बढ़ाना होना चाहिए, न कि उन्हें उनके अधिकारों से वंचित करने की कोई योजना रचना।
बैंक के इस तर्क को खारिज करते हुए कि कर्मचारियों ने शुरुआत में छुट्टी की शर्तों पर सहमति जताई थी, कोर्ट ने कहा कि ‘मौन सहमति का सिद्धांत’ (doctrine of acquiescence) एक सुरक्षा कवच है, इसे मौलिक संवैधानिक अधिकारों को खत्म करने का हथियार नहीं बनाया जा सकता।
हाईकोर्ट ने महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने वाले कई संवैधानिक अनुच्छेदों का हवाला दिया:
- अनुच्छेद 15: लिंग के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव को रोकता है।
- अनुच्छेद 15(3): राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान व नीतियां बनाने का अधिकार देता है।
- अनुच्छेद 42: राज्य को काम की न्यायसंगत और मानवीय परिस्थितियां तथा मातृत्व राहत सुनिश्चित करने का निर्देश देता है।
- अनुच्छेद 39: समान आजीविका के अवसर, पुरुषों और महिलाओं को समान काम के लिए समान वेतन और शोषण से सुरक्षा की गारंटी देता है।
अदालत ने याद दिलाया कि इस संवैधानिक परिकल्पना को धरातल पर उतारने और मातृत्व की गरिमा की रक्षा के लिए ही संसद ने मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (Maternity Benefit Act, 1961) लागू किया था। यह अधिनियम सुनिश्चित करता है कि कामकाजी महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान कठिन परिश्रम के लिए मजबूर न होना पड़े और वे अपनी आजीविका से वंचित न हों, जिससे मां और बच्चे दोनों की आर्थिक और स्वास्थ्य सुरक्षा बनी रहे।
कोर्ट ने बैंक के ‘निरंतर सेवा’ वाले तर्क को किया खारिज
उच्च न्यायालय ने बैंक की इस दलील को पूरी तरह दोषपूर्ण करार दिया कि कर्मचारियों के लिए बिना किसी रुकावट के दो साल की निरंतर सेवा (continuous service) अनिवार्य थी। अदालत ने कहा कि जब कर्मचारियों ने अपनी योग्यता साबित कर दी थी, तो मातृत्व के कारण उनके करियर को कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए था। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि संविदा पर काम करने वाले कर्मचारियों के पास सौदेबाजी की ताकत नहीं होती, क्योंकि नियम न मानने पर उन्हें नौकरी से निकाले जाने का सीधा डर रहता है।
अपीलकर्ता बैंक का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता रमन शर्मा और अधिवक्ता कार्तिकेय शर्मा ने दलील दी कि चूंकि कर्मचारियों ने शुरू में अवकाश स्वीकृति पत्रों में लिखी शर्तों को स्वीकार कर लिया था, इसलिए अब वे इस पर आपत्ति दर्ज कराने की हकदार नहीं हैं। वकीलों का तर्क था कि एकल पीठ ने इस महत्वपूर्ण पहलू पर विचार नहीं किया, इसलिए पिछले फैसले को रद्द किया जाना चाहिए।
बैंक की कानूनी टीम ने यह भी दावा किया कि छुट्टियां बिताने के दौरान कोई ‘निरंतर सेवा’ प्रदान नहीं की गई थी, और बैंक ने केवल अनुबंध की शर्तों का पालन किया था। उन्होंने कहा कि बैंक ने कभी भी मातृत्व लाभ देने से “इनकार” नहीं किया, बल्कि उसे असाधारण अवकाश के रूप में स्वीकृत किया था।
इसके अलावा, बैंक के वकीलों ने वेतन से जुड़े लाभों का भी मुद्दा उठाया। सर्कुलर नंबर 725 के तहत, बैंक ने 31 दिसंबर 2020 को कुछ वेतन घटकों (pay components) को फ्रीज कर दिया था, और यह लाभ उन कर्मचारियों के लिए नहीं था जो इस तारीख के बाद नियमित हुए। चूंकि याचिकाकर्ता महिलाएं अवकाश विस्तार के कारण 2021 में नियमित हुईं, इसलिए बैंक ने दलील दी कि वे इन लाभों की पात्र नहीं थीं और कोर्ट ने मातृत्व अवकाश को निरंतर सेवा मानकर उन्हें पिछली तारीख से (retrospective) लाभ देकर गलती की है।
इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए, उच्च न्यायालय ने महिला कर्मचारियों के संवैधानिक अधिकारों का पुरजोर समर्थन किया और देश भर के नियोक्ताओं को यह सख्त संदेश दिया कि मातृत्व अधिकार पूरी तरह से गैर-समझौतावादी (non-negotiable) हैं।

