सुप्रीम कोर्ट ने भाषा की बाधाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए साफ किया है कि देश के किसी भी हिस्से में भाषाई सुगमता को पहले से तय मानकर नहीं चला जा सकता। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने गुरुवार को केरल में “हर कोई अंग्रेजी जानता है” की दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने एक मां को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार देते हुए बच्चे की कस्टडी और तलाक के मामले को केरल से पंजाब के लुधियाना ट्रांसफर करने का आदेश दिया।
‘लोग अंग्रेजी जानते भी हैं, तो बोलना नहीं चाहते’ — कोर्ट की दोटूक
कोर्ट में यह दिलचस्प बहस तब शुरू हुई जब ब्रिटेन (UK) में रह रही पत्नी की ट्रांसफर याचिका पर सुनवाई चल रही थी। पति के वकील, एडवोकेट अल्जो जोसेफ ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि केस को केरल में ही रहने दिया जाना चाहिए क्योंकि वहां भाषा की कोई समस्या नहीं आएगी।
जोसेफ ने तर्क देते हुए कहा, “केरल में हर कोई अंग्रेजी जानता है। केरल एक भाषा-अनुकूल (language-friendly) राज्य है।”
इस दावे पर जस्टिस संदीप मेहता ने कड़ा रुख अपनाया और कहा, “वहां (केरल में) बहुत मुश्किल होती है। हमें मत बताइए। अगर वे अंग्रेजी जानते भी हैं, तो बोलना नहीं चाहते।” पीठ ने जोर देकर कहा कि निष्पक्ष सुनवाई के लिए भाषाई सुगमता बेहद जरूरी है और इसे केवल मानकर नहीं चला जा सकता।
सात समंदर पार फैला कस्टडी का विवाद
इस कानूनी लड़ाई की शुरुआत साल 2017 में हुई जब दोनों की शादी हुई थी। साल 2023 में यह जोड़ा यूनाइटेड किंगडम (UK) चला गया। हालांकि, जल्द ही इनके रिश्ते में दरार आ गई। इसके बाद पति अपने छोटे बच्चे को लेकर भारत लौट आया और उसने केरल की एक अदालत में तलाक और बच्चे की कस्टडी के लिए कई मामले दर्ज करा दिए।
दूसरी ओर, UK में रह रही पत्नी ने इस मुकदमे को पंजाब के लुधियाना ट्रांसफर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। पत्नी के वकील कुणाल आर. चोकसी ने कोर्ट को बताया कि उनकी मुवक्किल भाषा की अड़चन और अन्य व्यावहारिक दिक्कतों की वजह से केरल में अपनी पैरवी ठीक से नहीं कर पा रही हैं। उन्होंने यह भी बताया कि भारत में अपनी बेटी की तरफ से केस लड़ रहीं उनकी मां को भी केरल में गंभीर भाषाई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
बच्चे की सुविधा और निष्पक्ष सुनवाई में संतुलन
पति ने इस ट्रांसफर याचिका का विरोध करते हुए कहा कि बच्चा पिछले तीन साल से केरल में उसके साथ रह रहा है, इसलिए मामले की सुनवाई यहीं होनी चाहिए। उसने यह भी तर्क दिया कि चूंकि पत्नी विदेश में रहती है, इसलिए भारत की किसी भी अदालत में सुनवाई होने से उस पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट इन दलीलों से सहमत नहीं हुआ। पीठ ने कहा कि पत्नी अब तक केरल में चल रही अदालती कार्रवाई में प्रभावी ढंग से हिस्सा नहीं ले पाई है, जो कि बच्चे की कस्टडी जैसे संवेदनशील मामले में बेहद गंभीर मुद्दा है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने बच्चे की यात्रा और उससे जुड़ी व्यावहारिक दिक्कतों पर भी विचार किया। कोर्ट ने कहा कि अगर भविष्य में पीठ को बच्चे से सीधे बातचीत करनी पड़ी, तो उससे बार-बार लंबी दूरी की यात्रा की उम्मीद करना ठीक नहीं होगा।
अंततः, पत्नी के कानूनी और निष्पक्ष बचाव के अधिकार को प्राथमिकता देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली और केरल में लंबित सभी मामलों को पंजाब की लुधियाना कोर्ट में ट्रांसफर करने का आदेश दे दिया।

