पत्नी और नाबालिग बच्चों को वित्तीय सहायता देना पति का “पवित्र कर्तव्य”, शारीरिक श्रम करके भी निभाना होगा दायित्व: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक पति द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (revision petition) को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसके तहत उसे अपनी अलग रह रही पत्नी और दो बेटियों को गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति अपने परिवार का भरण-पोषण करने के कानूनी और नैतिक दायित्व से बच नहीं सकता है। कोर्ट ने इसे एक “पवित्र कर्तव्य” (sacrosanct duty) बताया जिसे शारीरिक श्रम करके भी पूरा किया जाना चाहिए।

यह निर्णय जस्टिस सौरभ बनर्जी द्वारा सुनाया गया, जिन्होंने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें याचिकाकर्ता को अपनी पत्नी को ₹11,000 प्रति माह और अपनी दोनों बेटियों में से प्रत्येक को ₹11,000 प्रति माह का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता (पति) और प्रतिवादी संख्या 1 (पत्नी) का विवाह 12 जून 2006 को सीवान, बिहार में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। इस शादी से उनकी दो बेटियों (प्रतिवादी संख्या 2 और 3) का जन्म हुआ।

समय के साथ वैवाहिक संबंधों में कड़वाहट आ गई, जिसके बाद पत्नी अपनी दोनों बेटियों के साथ अपने मायके लौट आई। इसके बाद, पत्नी और बच्चों ने फैमिली कोर्ट में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (Cr.P.C.) की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ते के लिए आवेदन किया। इस मामले पर सुनवाई करते हुए शाहदरा जिला, कड़कड़डूमा कोर्ट, दिल्ली के प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट ने 5 अक्टूबर 2024 को अपना फैसला सुनाया। फैमिली कोर्ट ने पति को निर्देश दिया कि वह पत्नी को उसके जीवित रहने या पुनर्विवाह करने तक ₹11,000 प्रति माह और दोनों बेटियों को उनके बालिग होने, आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने या शादी होने तक ₹11,000-₹11,000 प्रति माह का भुगतान करे।

इस फैसले के खिलाफ पति ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 438/442 के साथ पठित धारा 528 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट में एक पुनरीक्षण याचिका दायर कर इसे रद्द करने की मांग की।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता (पति) की ओर से दलीलें: याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट का फैसला केवल अनुमानों और कयासों पर आधारित है क्योंकि कोर्ट ने उनके द्वारा प्रस्तुत तथ्यों पर उचित ध्यान नहीं दिया। उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित थे:

  • पत्नी बिना किसी उचित कारण या न्यायसंगत आधार के स्वेच्छा से पति के घर से अलग हुई है, जबकि पति ने सुलह के कई प्रयास किए थे।
  • पति अनुबंध (contract) के आधार पर काम कर रहा था और उसकी आय का कोई नियमित स्रोत नहीं था, इसलिए वह गुजारा भत्ता देने की स्थिति में नहीं था।
  • पति तपेदिक (Tuberculosis), मधुमेह (Diabetes) और हृदय संबंधी बीमारियों जैसी कई स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा है। इसके साथ ही उस पर अपनी बुजुर्ग मां की देखभाल करने और कर्ज चुकाने की भी जिम्मेदारी है।
  • पत्नी कॉमर्स में ग्रेजुएट है और पढ़ी-लिखी महिला होने के कारण खुद का भरण-पोषण करने में सक्षम है। उसने पूर्व में एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में काम करने की बात स्वीकार की थी, जिसे उसने अपने आय के हलफनामे में जानबूझकर छुपाया था।
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प्रतिवादियों (पत्नी और बेटियों) की ओर से दलीलें: प्रतिवादियों के वकील ने फैमिली कोर्ट के फैसले का समर्थन किया और तर्क दिया कि:

  • फैमिली कोर्ट का निर्णय पूरी तरह से सुविचारित है और रिकॉर्ड पर मौजूद सभी दस्तावेजों एवं सबूतों का बारीकी से आकलन करने के बाद ही पारित किया गया है।
  • पति द्वारा बीमारी, वित्तीय संकट, कर्ज और मां की जिम्मेदारी से जुड़े दावे फैमिली कोर्ट के समक्ष कभी नहीं रखे गए थे, इसलिए इन दावों को पहली बार पुनरीक्षण याचिका के स्तर पर उठाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां

1. पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार का सीमित दायरा

जस्टिस सौरभ बनर्जी ने रेखांकित किया कि पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार (revisional jurisdiction) में हाईकोर्ट के हस्तक्षेप का दायरा अत्यंत सीमित है। इस संबंध में अमित कपूर बनाम रमेश चंदर एवं अन्य (2012) 9 SCC 460 और पायला मुत्यालम्मा बनाम पायला सूरी देमुदु (2011) 12 SCC 189 के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“जब तक याचिकाकर्ता आदेश में किसी प्रकार की विकृति या अवैधता दिखाने में असमर्थ रहता है, तब तक यह अदालत अनुमान नहीं लगा सकती या ऐसा कोई दृष्टिकोण नहीं अपना सकती जो फैमिली कोर्ट के निर्णय के विपरीत हो।”

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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुनरीक्षण याचिका के तहत उन्हीं मुद्दों को दोबारा नहीं उठाया जा सकता जो पहले ही सुलझाए जा चुके हैं, न ही नए तथ्यों को पेश किया जा सकता है। परिस्थितियों में बदलाव के आधार पर नए तथ्यों को रखने के लिए कानूनन धारा 127 Cr.P.C. के तहत फैमिली कोर्ट में ही आवेदन किया जाना चाहिए।

2. पति का कानूनी और नैतिक दायित्व

वित्तीय लाचारी और अनुबंध पर काम करने के पति के तर्क को सिरे से खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों भुवन मोहन सिंह बनाम मीना (2015) 6 SCC 353 और अंजू गर्ग बनाम दीपक कुमार गर्ग (2022 SCC OnLine SC 1314) का उल्लेख किया। कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा:

“…पति अपनी पत्नी या बच्चों के भरण-पोषण के दायित्व से बच नहीं सकता क्योंकि उनका भरण-पोषण करना पति का कानूनी और नैतिक कर्तव्य है। पत्नी और नाबालिग बच्चों को वित्तीय सहायता प्रदान करना पति का एक पवित्र कर्तव्य है, जिसे शारीरिक श्रम करके भी पूरा किया जाना चाहिए, और वह इस दायित्व से बच नहीं सकता है।”

अतः हाईकोर्ट ने पति के इस तर्क को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया कि नियमित आय का स्रोत न होने के कारण वह गुजारा भत्ता देने में असमर्थ है।

3. पति के वित्तीय दावों में विरोधाभास

कोर्ट ने पाया कि जहां एक तरफ पति ने खुद को कपड़े रंगने का काम करने वाला एक साधारण ठेकेदार बताया और प्रदूषण के कारण पानीपत (हरियाणा) में फैक्ट्री बंद होने से बेरोजगार होने का दावा किया, वहीं उसके अपने ही दस्तावेज इस दावे का खंडन करते हैं:

  • पति ने स्वयं लिखित बयान में स्वीकार किया था कि उसके पास तकनीकी विशेषज्ञता है।
  • फरवरी 2021 से अप्रैल 2021 के वेतन पर्ची (salary slips) के अनुसार उसका सकल मासिक वेतन लगभग ₹40,000 था।
  • बैंक खातों के विवरण से स्पष्ट हुआ कि उसके खाते में लगातार क्रेडिट एंट्रीज थीं, जिसमें 10 मार्च 2022 को ‘अभि होम्स’ से ₹59,975 का क्रेडिट भी शामिल था।
  • पति ने पूर्व में 2016 और 2020 में मध्यस्थता (mediation) समझौतों के दौरान क्रमशः ₹25,000 और ₹30,000 का गुजारा भत्ता देने पर सहमति व्यक्त की थी।
  • उसे नौकरी के ऐसे ऑफर भी मिले थे जिनमें वेतन ₹80,000 से ₹1,00,000 प्रति माह तक प्रस्तावित था।
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पत्नी की शैक्षणिक योग्यता के संबंध में हाईकोर्ट ने माना कि केवल पूर्व रोजगार के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि वह वर्तमान में अपना और अपनी बेटियों का खर्च उठाने में पूरी तरह सक्षम है।

4. गुजारा भत्ते की राशि का निर्धारण

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा प्रत्येक प्रतिवादी को ₹11,000 प्रति माह दिए जाने के निर्णय को सही ठहराया। कोर्ट ने पाया कि यह निर्धारण दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा अन्नुरिता वोहरा बनाम संदीप वोहरा (2004 SCC OnLine Del 192) मामले में प्रतिपादित “फैमिली रिसोर्स केक” (Family Resource Cake) के सिद्धांत के अनुकूल है। इस सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि अदालत को:

“…सबसे पहले पति/परिवार के मुख्य कमाने वाले सदस्य की शुद्ध डिस्पोजेबल आय का निर्धारण करना चाहिए और जहां दूसरा पक्ष भी कमा रहा हो, तो उसकी आय को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। यह सामूहिक आय ‘फैमिली रिसोर्स केक’ बनाती है, जिसे बाद में परिवार के सदस्यों के बीच समान रूप से वितरित किया जाता है, जिसके तहत दो हिस्से पति के लिए और एक-एक हिस्सा अन्य सदस्यों के लिए निर्धारित किया जाता है।”

कोर्ट का निर्णय

दिल्ली हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि फैमिली कोर्ट के 5 अक्टूबर 2024 के आदेश में कोई विकृति, अवैधता, अनियमितता या मनमानापन नहीं है। पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार के सीमित दायरे को ध्यान में रखते हुए, हाईकोर्ट ने इस आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं पाया और पति की पुनरीक्षण याचिका तथा अन्य लंबित आवेदनों को खारिज कर दिया।

केस विवरण

  • केस का शीर्षक: मि. लोकेश कुमार सिंह बनाम एमएस. नीता सिंह एवं अन्य
  • केस संख्या: CRL.REV.P. (MAT.) 177/2024, CRL.M.A. 38813/2024 एवं CRL.M.A. 10432/2025
  • पीठ: जस्टिस सौरभ बनर्जी
  • दिनांक: 20 मई, 2026

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