दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अग्रिम जमानत याचिका के निपटारे के बाद ट्रायल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाता है और वह ‘फंक्टस ऑफीशियो’ (Functus Officio) हो जाता है। हाईकोर्ट ने साफ किया कि जमानत याचिका पर फैसला आने के बाद निचली अदालतों के पास जांच की निगरानी जारी रखने, पुलिस अधिकारियों को तलब करने या उनके खिलाफ विभागीय जांच (डिपार्टमेंटल इंक्वायरी) का आदेश देने का कोई अधिकार नहीं है।
जस्टिस सौरभ बनर्जी की एकल पीठ ने द्वारका कोर्ट, नई दिल्ली के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एएसजे) (एफटीएससी) (पॉक्सो)-02 द्वारा पारित उन आदेशों की श्रृंखला को खारिज कर दिया, जिसमें जांच में देरी को लेकर कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा गया था और विभागीय कार्रवाई का निर्देश दिया गया था। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ की गई सभी प्रतिकूल टिप्पणियों को भी हटा (expunge) दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 21 जून, 2019 को दर्ज की गई एक एफआईआर से जुड़ा है। यह एफआईआर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 363 के तहत एक नाबालिग लड़की के लापता होने पर उसकी मां की शिकायत पर दर्ज की गई थी। बाद में पीड़ित लड़की को बरामद कर उसका मेडिकल कराया गया और धारा 161 और 164 के तहत बयान दर्ज किए गए। इसके बाद मामले में आईपीसी की धारा 328, 376 और पॉक्सो (POCSO) अधिनियम, 2012 की धारा 4 को जोड़ा गया था।
शुरुआती जांच एएसआई राम लाल ने की थी, जिसके बाद जांच समय-समय पर अलग-अलग जांच अधिकारियों (IO) को सौंपी गई। याचिकाकर्ताओं—CRL.M.C. 5769/2022 में तत्कालीन जांच अधिकारी और CRL.M.C. 1664/2024 में तत्कालीन हेड कांस्टेबल—का कहना था कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कानून के अनुसार अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया और जांच में महत्वपूर्ण प्रगति की थी।
इसी जांच के दौरान, मामले के एक सह-आरोपी ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (एएसजे) के समक्ष अग्रिम जमानत की अर्जी दाखिल की। हालांकि एएसजे ने 22 फरवरी, 2022 को इस जमानत अर्जी का निपटारा कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने जांच की प्रगति पर नजर रखने के लिए मामले की कार्यवाही को जारी रखा। एएसजे ने पूर्व जांच अधिकारी और संबंधित एसएचओ से जांच में देरी के कारणों पर लिखित स्टेटस रिपोर्ट मांगी और उन्हें व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया।
इसके बाद, 12 अप्रैल, 2022 को पारित एक अन्य आदेश में एएसजे ने तत्कालीन एसएचओ इंस्पेक्टर ऐशवीर सिंह और इंस्पेक्टर ज्ञानेंद्र राणा, और तत्कालीन एमएचसीआर पीएस छावला हेड कांस्टेबल सुनील के खिलाफ विभागीय जांच का आदेश दे दिया। इसके अलावा, एएसजे ने उस अवधि के दौरान द्वारका के डीसीपी रहे वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों—श्री अंतो अल्फोंस (IPS), श्री संतोष कुमार मीणा (IPS), और श्री शंकर चौधरी (IPS)—के साथ-साथ तत्कालीन एसीपी कुलबीर सिंह और एसीपी मनोज कुमार मीणा से उनकी ओर से पर्यवेक्षी चूक (supervisory lapses) के लिए स्पष्टीकरण मांगा।
दिल्ली हाईकोर्ट ने 16 दिसंबर, 2022 को एक अंतरिम आदेश के माध्यम से विभागीय जांच के निर्देशों और जांच में तेजी लाने के आदेशों पर रोक लगा दी थी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि निचली अदालत का यह कदम स्पष्ट रूप से “न्यायिक अतिक्रमण” (judicial overreach) का उदाहरण है। उन्होंने दलील दी कि एक बार अग्रिम जमानत याचिका का निपटारा होने के बाद एएसजे ‘फंक्टस ऑफीशियो’ हो गए थे और उनके पास स्टेटस रिपोर्ट मांगने, पुलिस अधिकारियों को समन करने या अनुशासनात्मक कार्रवाई की निगरानी करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था।
वकीलों ने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता इंस्पेक्टर ऐशवीर सिंह को सुनवाई का कोई अवसर दिए बिना उनके खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां करना और विभागीय जांच का निर्देश देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (principles of natural justice) का सीधा उल्लंघन है। इससे अधिकारी के आचरण को पहले ही दोषी मान लिया गया, जिससे कोई भी विभागीय जांच केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाती।
प्राकृतिक न्याय और प्रतिकूल टिप्पणियों के संबंध में अपनी दलीलों के समर्थन में याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया:
- स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल बनाम मीर मोहम्मद उमर (2000) 8 SCC 382
- ओम प्रकाश चौटाला बनाम कंवर भान (2014) 5 SCC 417
- तीस्ता सीतलवाड़ बनाम स्टेट ऑफ गुजरात (2004) 10 SCC 88
- डॉ. दिलीप कुमार डेका बनाम स्टेट ऑफ असम (1996) 6 SCC 234
यह तर्क देने के लिए कि अदालतें पुलिस विभाग के प्रशासनिक कार्यों में दखल देकर विभागीय कार्रवाई का आदेश या उसकी निगरानी नहीं कर सकतीं, उन्होंने निम्नलिखित मामलों का हवाला दिया:
- प्रमोद कुमार झा बनाम स्टेट ऑफ बिहार (क्रिमिनल अपील संख्या 1092/2022)
- स्टेट बनाम योगेंद्र सिंह (2015 SCC OnLine Del 14203)
- राकेश चंद बनाम स्टेट (2015 SCC OnLine Del 14193)
राज्य सरकार की दलीलें
राज्य सरकार के अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) ने भी याचिकाकर्ताओं के तर्कों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही का नतीजा एएसजे के अधिकार क्षेत्र से बाहर का विषय था। राज्य ने सहमति व्यक्त की कि सुनवाई का अवसर दिए बिना सार्वजनिक सेवकों के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करते समय निचली अदालत के अधिकार क्षेत्र की सीमाओं पर ध्यान केंद्रित किया। हाईकोर्ट ने कहा:
“यह कानून का एक सुस्थापित सिद्धांत है कि जमानत की अर्जी पर विचार करते समय अदालत को केवल अपने समक्ष उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर और अपनी संतुष्टि के अनुसार, केवल जमानत देने या खारिज करने का निर्णय लेना होता है।”
अदालत ने न्यायिक अतिक्रमण पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा:
“अदालत को किसी भी परिस्थिति में जमानत अर्जी पर निर्णय लेते समय अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसी चीजों की ओर नहीं झुकना चाहिए जो उसके दायरे में नहीं आती हैं। वास्तव में, जमानत अर्जी पर विचार करते समय अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्देश या सख्त टिप्पणियां पारित करना अदालत का काम नहीं है।”
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय स्टेट बनाम एम. मुरुगेसन (2020) 15 SCC 251 का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि सीआरपीसी की धारा 439 के तहत अदालत का अधिकार क्षेत्र मुकदमे के लंबित रहने के दौरान केवल जमानत देने या न देने तक ही सीमित है।
इन सिद्धांतों को वर्तमान मामले में लागू करते हुए, हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि एक बार जब एएसजे ने अंतिम आदेश के माध्यम से अग्रिम जमानत की अर्जी का निपटारा कर दिया था, तो उसके बाद की सभी कार्रवाइयां पूरी तरह से उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर थीं। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“…एक बार जब एएसजे के समक्ष कार्यवाही समाप्त हो गई, तो उसके बाद उनके पास किसी भी कारण से कुछ भी लंबित नहीं बचा था। इस प्रकार, अग्रिम जमानत की अर्जी का निपटारा करने के बाद एएसजे पूरी तरह से ‘फंक्टस ऑफीशियो’ हो चुके थे।”
हाईकोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच का आदेश देना, उसकी निगरानी करना और अधिकारियों को पक्ष रखने का नोटिस दिए बिना प्रतिकूल टिप्पणियां पारित करना पूरी तरह से अनुचित और अस्वीकार्य था।
जस्टिस बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले मीर मोहम्मद उमर (supra) का जिक्र करते हुए इस बात पर जोर दिया कि अदालतों को पुलिस अधिकारियों की आलोचना करने के लिए जांच की कमियों को खोजने में अपना समय नष्ट नहीं करना चाहिए। अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि वर्तमान व्यवस्था में पुलिस अधिकारियों को समय की कमी, अपर्याप्त उपकरणों और गवाहों की उदासीनता जैसी जमीनी वास्तविकताओं का सामना करना पड़ता है।
इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट ने अपने ही कुछ निर्णयों—अजीत कुमार बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) (2022) और स्टेट (एनसीटी दिल्ली) बनाम नीलेश मिश्रा व अन्य (2025)—का हवाला देते हुए कहा कि न्यायिक आदेशों में दर्ज की गई तीखी टिप्पणियों का अधिकारियों के करियर पर गंभीर प्रभाव पड़ता है:
“तीखी आलोचनात्मक और अपमानजनक टिप्पणियों का संबंधित अधिकारियों की प्रतिष्ठा और करियर पर विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है। ऐसी टिप्पणियां न केवल अनावश्यक हैं बल्कि सार्वजनिक सेवकों के करियर पर इसके गंभीर परिणाम होते हैं।”
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि वह जांच में देरी को लेकर एएसजे द्वारा दिखाई गई चिंता और तत्परता की सराहना करता है, लेकिन जिस तरह से विभागीय जांच का निर्देश दिया गया और उसकी निगरानी की गई, वह पूरी तरह से उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर था।
हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं को स्वीकार करते हुए एएसजे (एफटीएससी) (पॉक्सो)-02, द्वारका कोर्ट द्वारा 22 फरवरी, 2022 को पारित आदेश और उसके बाद के सभी संबंधित निर्देशों को खारिज कर दिया। साथ ही, याचिकाकर्ताओं और अन्य पुलिस अधिकारियों के खिलाफ की गई सभी प्रतिकूल टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटा दिया गया है।
हाईकोर्ट ने यह देखते हुए कि निचली अदालतों द्वारा अक्सर अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसे आदेश पारित किए जाते हैं, इस फैसले की एक प्रति दिल्ली के सभी जिलों के प्रधान और जिला न्यायाधीशों को भेजने का निर्देश दिया। इसे आगे सभी संबंधित न्यायाधीशों को प्रसारित किया जाएगा ताकि वे अग्रिम जमानत और जमानत याचिकाओं की सीमित सीमाओं को ध्यान में रखकर ही कार्य करें।
केस विवरण:
- केस का शीर्षक: ऐशवीर सिंह (इंस्पेक्टर) बनाम राज्य (ज्ञानेंद्र बनाम राज्य के साथ)
- केस संख्या: CRL.M.C. 5769/2022 और CRL.M.C. 1664/2024
- पीठ: जस्टिस सौरभ बनर्जी
- तारीख: 20 मई, 2026

