“पत्नी को छोड़ना जिम्मेदारी से भागने का बहाना”: कलकत्ता हाई कोर्ट ने पुलिस सुरक्षा में अक्षम महिला को ससुराल भेजने का दिया आदेश

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए एक शारीरिक रूप से अक्षम महिला को पुलिस की मदद से निजी अस्पताल से उसके ससुराल भेजने का आदेश दिया है। अदालत ने गंभीर टिप्पणी करते हुए पत्नी को घर ले जाने से इनकार करने की पति की याचिका को अपनी नैतिक जिम्मेदारियों और कर्तव्यों से बचने की महज एक “चाल” (Ploy) करार दिया।

जस्टिस शम्पा सरकार और जस्टिस अजय कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि कोई भी पति अपनी पत्नी की शारीरिक लाचारी या बीमारी की आड़ लेकर उसे इस तरह बेसहारा नहीं छोड़ सकता। अदालत ने पति की उस अपील को खारिज कर दिया जिसमें उसने निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी थी। डॉक्टरों की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि महिला पूरी तरह से होश में है, उसकी स्थिति स्थिर है और वह घर पर रहने के लिए पूरी तरह फिट है।

क्या है पूरा मामला?

इस पूरे विवाद की शुरुआत कोलकाता के अपोलो मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल्स (Apollo Multispeciality Hospitals) द्वारा दायर एक याचिका से हुई थी। अस्पताल ने अदालती हस्तक्षेप की मांग करते हुए निजी स्वास्थ्य संस्थानों में ठीक हो चुके या स्थिर मरीजों को परिवारों द्वारा लावारिस छोड़ दिए जाने के बढ़ते और चिंताजनक चलन पर चिंता जताई थी।

अस्पताल के अनुसार, इस महिला को 15 सितंबर, 2021 को एक सड़क दुर्घटना के बाद गंभीर स्थिति में आपातकालीन विभाग में भर्ती कराया गया था। वह लगभग चार साल तक अस्पताल में रही, जहां डॉक्टरों और स्टाफ ने लगातार उसकी देखभाल की। अस्पताल का कहना था कि उनकी यह कानूनी लड़ाई केवल बकाया बिलों की वसूली के लिए नहीं, बल्कि उस मरीज की सुरक्षा और भलाई को लेकर उनकी गहरी चिंता के कारण है।

इससे पहले, एक निचली अदालत ने पति को निर्देश दिया था कि वह एक सप्ताह के भीतर अपनी पत्नी को अस्पताल से डिस्चार्ज कराकर घर ले जाए। अदालत ने यह भी व्यवस्था दी थी कि अस्पताल के बकाया बिलों की वसूली पति से न करके, कानून के दायरे में बीमा कंपनी के माध्यम से की जाए। साथ ही, आवश्यकता पड़ने पर महिला को आगे के इलाज के लिए सरकारी अस्पताल ले जाने की भी अनुमति दी गई थी।

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हालांकि, पति ने इन निर्देशों का पालन करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उसने हाई कोर्ट में अपील दायर की।

दोनों पक्षों की दलीलें

  • पति के वकील की दलील: पति की ओर से पेश वकील नबा कुमार दास ने दलील दी कि निचली अदालत ने एक अलग ही रास्ता चुनते हुए उनके मुवक्किल को पत्नी को घर ले जाने और सरकारी अस्पताल में इलाज कराने का आदेश दे दिया। उन्होंने कहा कि अस्पताल की मुख्य याचिका निजी अस्पतालों में मरीजों के लंबे समय तक रुकने की समस्या को लेकर राज्य सरकार द्वारा दिशा-निर्देश बनाने के लिए थी, न कि पति के खिलाफ कोई राहत मांगने के लिए। वकील ने तर्क दिया कि बीमार और दिव्यांग नागरिकों की देखभाल करना अंततः राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। सरकार को ऐसे लोगों के पुनर्वास के लिए आश्रय गृह (shelter homes) बनाने चाहिए और उनके मुवक्किल की इच्छा है कि सरकार उनकी पत्नी को किसी सरकारी आश्रय गृह में रखे। उन्होंने दावा किया कि महिला ‘वेजिटेटिव स्टेट’ (अचेतन अवस्था) में है और घर पर उसकी देखभाल करना मुमकिन नहीं है।
  • अस्पताल की दलील: अपोलो हॉस्पिटल्स का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता जिष्णु चौधरी ने कहा कि निजी अस्पतालों को अक्सर ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है जहां परिवार मरीज को वापस ले जाने से कतराते हैं। ऐसा या तो मरीज को बोझ समझने की वजह से होता है या फिर अस्पताल के बिलों के भुगतान से बचने के लिए। उन्होंने कहा कि इसी लाचारी के चलते अस्पताल को अदालत का रुख करना पड़ा ताकि राज्य सरकार ऐसे मामलों से निपटने के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा तैयार करे, क्योंकि नागरिकों की सुरक्षा करना राज्य का सर्वोपरि कर्तव्य है।
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हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी और रुख

उच्च न्यायालय ने पति के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया कि उसकी पत्नी अचेतन अवस्था (vegetative state) में है। कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट लिखा था कि महिला पूरी तरह होश में है, व्हीलचेयर के सहारे बैठ सकती है, खुद से भोजन कर सकती है और उसे घर पर रखकर आसानी से उसकी देखभाल की जा सकती है।

पति के आचरण की तीखी आलोचना करते हुए खंडपीठ ने कहा:

“यह अपील और कुछ नहीं बल्कि पति द्वारा अपनी दिव्यांग पत्नी के प्रति जिम्मेदारियों से बचने का एक पैंतरा है। वह उसे छोड़ना चाहता है। वह उसे घर ले जाने से सिर्फ इस आधार पर मना कर रहा है कि उसकी देखभाल करना मुश्किल होगा।”

कोर्ट ने पति द्वारा वैवाहिक दायित्वों से पल्ला झाड़ने पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा:

“हम यह समझने में असमर्थ हैं कि जब चिकित्सा विशेषज्ञों ने महिला को स्थिर, सचेत और घर पर देखभाल के लिए उपयुक्त पाया है, तो पति उसे घर ले जाने से इनकार करके अपनी जिम्मेदारियों से कैसे भाग सकता है।”

अदालत ने दृढ़ता से कहा कि महिला को “अपने घर में रहने का पूरा अधिकार है।” जजों ने दंपती के 17 वर्षीय बच्चे के भविष्य का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि यदि महिला को किसी सरकारी आश्रय गृह में छोड़ दिया गया, तो उनका किशोर बेटा अपनी मां के साये और साथ से हमेशा के लिए वंचित हो जाएगा।

आर्थिक पहलू पर बात करते हुए हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोर्ट पहले ही परिवार के हितों की रक्षा कर चुका है, जिसके तहत बकाया अस्पताल बिलों की वसूली कानून सम्मत तरीके से सीधे बीमा कंपनी से करने का निर्देश दिया गया है।

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अदालत के महत्वपूर्ण निर्देश

महिला की सुरक्षा और पुनर्वास सुनिश्चित करने के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट ने निम्नलिखित कड़े निर्देश जारी किए हैं:

  1. पुलिस सहायता से वापसी: पुलिस प्रशासन को आदेश दिया गया है कि वे महिला को अपोलो मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल्स से सुरक्षित उनके ससुराल पहुंचाने में मदद करें। इसके साथ ही पुलिस को समय-समय पर घर का दौरा कर उसकी सुरक्षा और भलाई की निगरानी करने का निर्देश दिया गया है।
  2. चिकित्सीय निगरानी: अपोलो हॉस्पिटल्स को निर्देश दिया गया है कि वह सप्ताह में दो बार एक पैरामेडिक या नर्स को महिला के घर भेजे, जो उनके स्वास्थ्य और शारीरिक स्थिति की जांच कर सके।
  3. आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था: यदि भविष्य में महिला की तबीयत बिगड़ती है और उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराने की आवश्यकता होती है, तो उन्हें बिना किसी शुल्क के इलाज के लिए नामांकित सरकारी अस्पताल में इनडोर मरीज के रूप में भर्ती कराया जाएगा।
  4. कानूनी और सामाजिक सहायता: जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के सचिव को निर्देश दिया गया है कि वे पीड़ित महिला को हर संभव सुरक्षा, सहायता और आवश्यक कानूनी मदद प्रदान करें।
  5. नियमित निरीक्षण: DLSA सचिव को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे समय-समय पर महिला के ससुराल का दौरा करें ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनके साथ वहां अच्छा व्यवहार हो रहा है और वे पूरी तरह सुरक्षित हैं।

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