हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने वापस लिया अपना पुराना फैसला, 24 जुलाई से सभी याचिकाओं पर नए सिरे से होगी सुनवाई

देश के दक्षिणी राज्यों और पुडुचेरी में हिंदू मंदिरों तथा धार्मिक बंदोबस्तों (Religious Endowments) पर सरकारी नियंत्रण से जुड़े कानूनों को चुनौती देने वाले 13 साल पुराने कानूनी विवाद में एक बड़ा मोड़ आया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सोमवार को एक बड़ा यू-टर्न लेते हुए अपने पिछले फैसले को वापस ले लिया है। अब शीर्ष अदालत इस संवेदनशील और ऐतिहासिक मामले की सभी याचिकाओं पर आगामी 24 जुलाई से नए सिरे से सुनवाई करेगी।

जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस एस. सी. शर्मा की पीठ ने यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया है।

उच्चतम न्यायालय का यह रुख उसके अपने ही 1 अप्रैल, 2025 के आदेश को बदलने के बाद सामने आया है। दरअसल, पिछले साल की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ताओं को संबंधित राज्यों के हाईकोर्ट जाने का निर्देश दिया था। तब अदालत का मानना था कि मंदिर प्रशासन से जुड़े इन कानूनों में स्थानीय मुद्दे शामिल हो सकते हैं, इसलिए राज्य के हाईकोर्ट इन कानूनी पहलुओं का बेहतर आकलन कर सकते हैं।

चुनौती के दायरे में आने वाले प्रमुख कानून हैं:

  • तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त अधिनियम, 1959
  • पुडुचेरी अधिनियम, 1932
  • आंध्र प्रदेश धर्मार्थ और हिंदू धार्मिक बंदोबस्त अधिनियम, 1987
READ ALSO  Loan Moratorium 2021- Supreme Court Indicates that it may not grant further Loan Moratorium

शीर्ष अदालत के इस आदेश के खिलाफ मुख्य याचिका—दयानंद सरस्वती स्वामीजी (मृत) और अन्य बनाम तमिलनाडु राज्य व अन्य—में एक समीक्षा याचिका (Review Petition) दाखिल की गई, जिसके बाद अदालत ने अपने पिछले रुख को पूरी तरह से बदल दिया।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता सुविदत्त सुंदरम ने अदालत के समक्ष पुरजोर दलील दी कि अप्रैल 2025 के आदेश में “रिकॉर्ड के स्तर पर ही एक बुनियादी भूल” थी। अदालत ने मान लिया था कि तीनों राज्यों के कानूनों की रूपरेखा (Scheme) शायद एक-दूसरे से अलग है। समीक्षा याचिका में इस धारणा को पूरी तरह गलत बताते हुए कहा गया कि 13 वर्षों तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित रहने के बाद मामले को वापस राज्यों की अदालतों में भेजना याचिकाकर्ताओं के साथ सरासर अन्याय है।

याचिका में तर्क दिया गया कि इस फैसले से याचिकाकर्ताओं के जीवन के वे महत्वपूर्ण 13 वर्ष कभी वापस नहीं आ सकेंगे, जो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में न्याय की उम्मीद में बिताए हैं। गौरतलब है कि इस मामले की पहली याचिका साल 2012 में दिवंगत आध्यात्मिक गुरु स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा दायर की गई थी।

एडवोकेट सुंदरम ने व्यावहारिक कठिनाइयों को रेखांकित करते हुए कहा कि यदि याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट जाने पर मजबूर किया जाता, तो उन्हें एक जैसे कानूनों को चुनौती देने के लिए तीन अलग-अलग अदालतों—मद्रास हाईकोर्ट, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट और तेलंगाना हाईकोर्ट—का दरवाजा खटखटाना पड़ता। इससे एक ही सवाल को लेकर मुकदमों की बाढ़ आ जाती।

इसके अलावा, राज्यों के विभाजन के कारण याचिकाकर्ताओं को एक ही कानून यानी ‘आंध्र प्रदेश अधिनियम 1987’ को तेलंगाना और आंध्र प्रदेश दोनों के हाईकोर्ट में अलग-अलग चुनौती देनी पड़ती।

READ ALSO  अल्पसंख्यकों के लिए सीयूईटी स्कोर को पूर्ण वेटेज के खिलाफ जेएमसी की याचिका पर 24 मई को सुनवाई करेगा हाईकोर्ट

समीक्षा याचिका में एक बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक बिंदु भी उठाया गया। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाना स्वयं में एक मौलिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिकाकर्ताओं को वापस हाईकोर्ट भेज दिए जाने से उनका यह मौलिक अधिकार पूरी तरह से अर्थहीन हो गया था।

इन सभी दलीलों और कानूनी बारीकियों को स्वीकार करते हुए, जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस एस. सी. शर्मा की पीठ ने सोमवार को अपना पुराना आदेश निरस्त कर दिया। अब आगामी 24 जुलाई से सुप्रीम कोर्ट खुद इन मंदिर प्रशासन कानूनों की संवैधानिक वैधता की समीक्षा करेगा।

READ ALSO  पूरे पुलिस स्टेशन में सीसीटीवी लगा होना चाहिए, पूछताछ कक्ष में भी- हाई कोर्ट का आदेश
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles