व्यक्तिगत संबंधों और आपराधिक कानूनी प्रक्रियाओं के बीच संतुलन बनाने वाला एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने शादी का झांसा देकर यौन शोषण करने के आरोपी युवक के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) और उससे जुड़ी सभी कानूनी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया है।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस संदीप शर्मा की एकल पीठ ने टिप्पणी की कि इस पड़ाव पर कानूनी कार्रवाई को आगे बढ़ाने का कोई सार्थक उद्देश्य नहीं रह जाता है। कोर्ट ने कहा कि चूंकि दोनों पक्ष अब शादी के बंधन में बंधने का फैसला कर चुके हैं, इसलिए इस मुकदमे को जारी रखने से उनके बीच की दूरियां और “अनावश्यक रूप से बढ़ेंगी”।
क्या था पूरा मामला?
इस कानूनी विवाद की शुरुआत तब हुई जब शिकायतकर्ता युवती ने याचिकाकर्ता युवक के खिलाफ मामला दर्ज कराया। दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, अगस्त 2024 में दोनों की मुलाकात लदरौर अकादमी (Ladraur Academy) में हुई थी। उस समय युवती वहां पुलिस भर्ती की तैयारी कर रही थी, जबकि युवक सेना (Army) भर्ती की तैयारी के सिलसिले में वहां मौजूद था।
युवती का आरोप था कि मुलाकात के बाद दोनों के बीच बातचीत और मिलना-जुलना शुरू हुआ। इस दौरान आरोपी ने शादी का झांसा देकर युवती की मर्जी के खिलाफ कई बार उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। हालांकि, संबंध बनाने के बाद जब युवक ने शादी करने से इनकार कर दिया, तो पीड़िता ने कानून का दरवाजा खटखटाया। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की और अदालत के समक्ष चार्जशीट भी दाखिल कर दी। लेकिन, इस दौरान दोनों पक्षों ने आपसी बातचीत के बाद इस विवाद को हमेशा के लिए सुलझाने का निर्णय लिया।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
अदालत में सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों की ओर से पेश हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता (Additional Advocate General) राजन कहोल ने पीठ को अवगत कराया कि शिकायतकर्ता युवती ने बिना किसी बाहरी दबाव के और स्वेच्छा से आरोपी के साथ समझौता किया है।
कोर्ट को बताया गया कि यह एफआईआर महज एक “गलतफहमी” का नतीजा थी और युवक ने अपने व्यवहार के लिए माफी मांग ली है। शिकायतकर्ता युवती ने अदालत के समक्ष स्पष्ट किया कि वह इस मामले को अब और आगे नहीं बढ़ाना चाहती है और आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर और संबंधित कानूनी कार्यवाही को रद्द करने पर उसे कोई आपत्ति नहीं है।
कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणी
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के सामने मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर और समाज को प्रभावित करने वाले अपराधों के मामलों में केवल आपसी समझौते के आधार पर एफआईआर को रद्द किया जा सकता है?
इस पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने समाज पर पड़ने वाले इसके प्रभावों को भी रेखांकित किया। जस्टिस संदीप शर्मा ने स्पष्ट किया कि ऐसे गंभीर मामलों में समझौते को आसानी से स्वीकार करना समाज में एक “गलत संदेश” दे सकता है।
लेकिन इसके साथ ही, कोर्ट ने मामले की व्यावहारिक हकीकत, दोनों पक्षों के बीच हुए आपसी समझौते और मुकदमे में दोषसिद्धि (Conviction) की बेहद कम और धुंधली संभावनाओं को भी ध्यान में रखा।
अदालत ने 15 मई को जारी अपने आदेश में कहा:
“चूंकि शिकायतकर्ता ने इस अदालत के समक्ष शपथ पर स्पष्ट रूप से कहा है कि एफआईआर एक गलतफहमी का परिणाम थी और उसकी मर्जी के खिलाफ कुछ भी नहीं हुआ था; और साथ ही याचिकाकर्ता तथा शिकायतकर्ता अब आपस में शादी करना चाहते हैं—ऐसी स्थिति में यदि एफआईआर और संबंधित कार्यवाही को रद्द नहीं किया जाता है, तो इससे कोई सार्थक उद्देश्य पूरा नहीं होगा। उल्टा, यह दोनों पक्षों के बीच की दरार को अनावश्यक रूप से और चौड़ा करेगा।”
हाईकोर्ट का फैसला
यह देखते हुए कि शिकायतकर्ता अब मामले को आगे बढ़ाने में बिल्कुल भी रुचि नहीं रखती है, हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता की याचिका को स्वीकार करने में कोई कानूनी बाधा नहीं है। कोर्ट ने दोनों पक्षों को अपने जीवन में आगे बढ़ने और विवाह के फैसले को अमलीजामा पहनाने का अवसर देते हुए आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर और सभी संबंधित कार्यवाहियों को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया।
संबद्ध संदर्भ: ‘शादी के झूठे वादे’ पर सुप्रीम कोर्ट का रुख
शादी के वादे के टूटने और उसके बाद उत्पन्न होने वाले यौन शोषण के मामलों पर देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने भी हाल ही में विचार किया है। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया है कि क्या कई वर्षों तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने और बच्चे के जन्म के बाद भी ‘शादी के झूठे वादे’ पर यौन शोषण का मामला दर्ज किया जा सकता है?
जस्टिस बी. वी. नागरथना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया था। यह एफआईआर नवगठित भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत दर्ज की गई थी, जिसमें निम्नलिखित धाराएं शामिल थीं:
- धारा 69 (धोखे से या शादी के झूठे वादे के जरिए यौन संबंध बनाना)
- धारा 115(2) (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना)
- धारा 74 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग)
इस मामले में भी महिला ने अपने पूर्व लिव-इन पार्टनर पर शादी का झांसा देकर शोषण करने का आरोप लगाया था। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में नोटिस जारी किया है, जिसकी वापसी तिथि 25 मई तय की गई है। कोर्ट का मुख्य ध्यान दोनों पक्षों के बीच आपसी समझौते की संभावनाओं को तलाशने पर है।

