लापता सेना सेवानिवृत्त जवान मामले में हत्या की स्वीकारोक्ति के बावजूद पटना हाईकोर्ट ने मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने से क्यों किया इनकार?

पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 की धारा 13(3) के तहत सक्षम मजिस्ट्रेट के सत्यापन और आदेश के बिना किसी लापता व्यक्ति की मृत्यु का पंजीकरण नहीं किया जा सकता है। इस निर्णय के साथ, कोर्ट ने एक महिला की उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने लापता पति (भारतीय सेना के सेवानिवृत्त कर्मचारी) के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता के पति के लापता होने के मामले में पुलिस जांच के दौरान एक आरोपी ने उनकी हत्या करने की बात स्वीकार की थी, इसके बावजूद कोर्ट ने राहत देने से इनकार कर दिया।

जस्टिस पार्थ सारथी की एकल-सदस्यीय पीठ ने यह आदेश पारित किया। उन्होंने दीवानी अधिकारियों (civil authorities) के फैसले में कोई त्रुटि नहीं पाई, जिन्होंने न्यायिक आदेश के अभाव में प्रमाण पत्र जारी करने से मना कर दिया था।

केस की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता प्रियंका कुमारी, जो आरा (भोजपुर) के करिसथ गांव की रहने वाली हैं, का विवाह दिवंगत राजेश कुमार यादव से हुआ था। राजेश कुमार भारतीय सेना के सेवानिवृत्त कर्मचारी थे और उन्हें भारत सरकार से पेंशन मिलती थी।

याचिकाकर्ता के अनुसार, उनके पति 4 मई 2024 को लापता हो गए थे। लगभग एक सप्ताह तक उनके लापता रहने के बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई, जिसके आधार पर 12 मई 2024 को उदवंतनगर थाने में प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई, जिसकी केस संख्या 193/2024 है।

पुलिस जांच के दौरान, एक आरोपी ने याचिकाकर्ता के पति की हत्या करने का अपराध स्वीकार कर लिया। इस स्वीकारोक्ति के आधार पर, याचिकाकर्ता ने वैशाली के जिला रजिस्ट्रार से मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने का अनुरोध किया। याचिकाकर्ता ने इसे अत्यंत आवश्यक बताते हुए तर्क दिया कि पति के लापता होने के बाद से उनकी पेंशन बंद हो गई है, जो कि उनके गुजारे का एकमात्र साधन थी।

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प्रतिवादी अधिकारियों ने उनके आवेदन को खारिज कर दिया। इसके बाद, नगर परिषद, महनार (वैशाली) के कार्यपालक अधिकारी ने 14 अगस्त 2025 को वैशाली के सूचना का अधिकार (RTI) के नोडल अधिकारी को लिखे एक पत्र में स्पष्ट किया कि लापता व्यक्तियों के मामलों में जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 की धारा 13(3) के तहत सक्षम न्यायालय के आदेश के बाद ही मृत्यु प्रमाण पत्र जारी किया जाता है।

इसके बाद याचिकाकर्ता ने पटना हाईकोर्ट का रुख किया और अधिकारियों को मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश देने तथा 14 अगस्त 2025 के आदेश को रद्द करने के लिए परमादेश रिट (writ of mandamus) की मांग की।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील श्री मनीष कुमार ने तर्क दिया कि चूंकि पुलिस जांच के दौरान एक आरोपी ने याचिकाकर्ता के पति की हत्या करने की बात स्वीकार की है, इसलिए प्रतिवादियों को मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ। हालांकि, राज्य प्रतिवादियों की ओर से दायर जवाबी हलफनामे के माध्यम से जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के प्रासंगिक प्रावधानों को कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया गया था।

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कोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस पार्थ सारथी ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्रियों और जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 की धारा 13 के कानूनी ढांचे का परीक्षण किया, जो जन्म और मृत्यु के विलंबित पंजीकरण को नियंत्रित करता है।

कोर्ट ने अधिनियम की धारा 13(3) के वैधानिक प्रावधान को अपने आदेश में उद्धृत किया:

“13. जन्म और मृत्यु का विलंबित पंजीकरण। — …

(3) कोई भी जन्म या मृत्यु जिसके संबंध में उसके घटित होने के एक वर्ष के बाद रजिस्ट्रार को विलंबित सूचना दी जाती है, वह उस क्षेत्र पर अधिकार क्षेत्र रखने वाले जिला मजिस्ट्रेट (District Magistrate) या उप-मंडलीय मजिस्ट्रेट (Sub-Divisional Magistrate) या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अधिकृत किसी कार्यकारी मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate) द्वारा जन्म या मृत्यु की सत्यता का सत्यापन करने के बाद और निर्धारित शुल्क के भुगतान पर दिए गए आदेश के आधार पर ही पंजीकृत की जाएगी।”

इस वैधानिक नियम को मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के पति के लापता होने के संबंध में 12 मई 2024 को प्राथमिकी दर्ज की गई थी, जबकि वह 4 मई 2024 को लापता हुए थे। उनके गायब होने के बाद से दो साल से अधिक का समय बीत चुका था, और अधिनियम के तहत निर्धारित एक वर्ष की अवधि के भीतर मृत्यु न तो प्रमाणित हुई थी और न ही पंजीकृत की गई थी।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

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“याचिकाकर्ता के पति के गायब होने के बाद से दो साल से अधिक का समय बीत चुका है और मृत्यु की न तो पुष्टि हुई है और न ही एक वर्ष के भीतर पंजीकरण किया गया है, ऐसे में कोर्ट को याचिकाकर्ता को सूचित किए गए प्रतिवादियों के फैसले में कोई त्रुटि नहीं दिखती है कि अधिनियम की धारा 13(3) के आलोक में, मृत्यु का पंजीकरण केवल कोर्ट द्वारा मृत्यु की सत्यता का सत्यापन करने के बाद और निर्धारित शुल्क के भुगतान पर किए गए आदेश पर ही किया जाएगा।”

कोर्ट का निर्णय

रिट याचिका में कोई योग्यता न पाते हुए और प्रतिवादी अधिकारियों द्वारा पारित विवादित आदेश में कोई त्रुटि न पाते हुए, पटना हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।

केस विवरण

  • केस का नाम: प्रियंका कुमारी बनाम बिहार राज्य, मुख्य रजिस्ट्रार, जन्म और मृत्यु पंजीकरण विभाग, बिहार सरकार, पटना एवं अन्य के माध्यम से।
  • केस संख्या: सिविल रिट क्षेत्राधिकार केस संख्या 19241/2025
  • पीठ: जस्टिस पार्थ सारथी
  • तारीख: 14-05-2026

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