इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश के पूर्व विधायकों (MLAs) और पूर्व विधान परिषद सदस्यों (MLCs) को मिलने वाली पेंशन, पारिवारिक पेंशन, चिकित्सा, और मुफ्त यात्रा जैसी सुविधाओं की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया कि पूर्व जनप्रतिनिधियों के लिए सामाजिक सुरक्षा से जुड़े कानून बनाना पूरी तरह से राज्य विधानमंडल (State Legislature) के अधिकार क्षेत्र में आता है। केवल नीतिगत मतभेदों या विचारों की भिन्नता के आधार पर किसी वैध कानून को असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता।
यह कानूनी विवाद ‘लोक प्रहरी’ नामक गैर-सरकारी संगठन (NGO) के महासचिव एस. एन. शुक्ला द्वारा दायर एक जनहित याचिका के जरिए अदालत के सामने आया था।
याचिकाकर्ता ने ‘उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल (सदस्यों के उपलब्धियां, भत्ते और पेंशन) अधिनियम, 1980’ के उन विभिन्न कानूनी प्रावधानों को रद्द करने की मांग की थी, जिसके तहत पूर्व विधायकों और उनके परिवारों को पेंशन, चिकित्सा कवरेज और यात्रा रियायतें जैसी वित्तीय सुविधाएं दी जाती हैं। इसके साथ ही, याचिका में अदालत से यह भी अनुरोध किया गया था कि वह राज्य सरकार को इन भुगतानों और सुविधाओं को तत्काल रोकने का आदेश (Mandamus) जारी करे।
हाईकोर्ट के जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस ए. के. चौधरी की खंडपीठ ने इस मामले में 17 फरवरी को दोनों पक्षों की विस्तृत बहस सुनने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था, जिसे 13 मई को सुनाया गया।
याचिकाकर्ता एस. एन. शुक्ला का तर्क था कि अपना कार्यकाल पूरा कर चुके जनप्रतिनिधियों और उनके परिवारों को जनता के पैसे से पेंशन, मुफ्त चिकित्सा और मुफ्त यात्रा सुविधाएं देना भारत के संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। याचिका में कहा गया कि इस तरह के वित्तीय लाभों को कोई संवैधानिक मंजूरी प्राप्त नहीं है और यह सार्वजनिक धन का मनमाना खर्च है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने इन आरोपों का कड़ा विरोध करते हुए 1980 के इस अधिनियम का बचाव किया। सरकार के वकील ने दलील दी कि:
- ये तमाम प्रावधान राज्य विधानमंडल द्वारा अपनी विधायी शक्तियों के तहत कानूनी रूप से पारित किए गए हैं।
- पूर्व जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली पेंशन या अन्य भत्ते कोई ‘दान’ या ‘खैरात’ (Ex-gratia handout) नहीं हैं।
- ये लाभ वास्तव में उन सेवाओं के सम्मान में दी जाने वाली एक कानूनी सुविधा हैं, जो इन सदस्यों ने अपने कार्यकाल के दौरान जनता और देश की सेवा में दी हैं।
- इसलिए, इस वैधानिक व्यवस्था को मनमाना या असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।
संविधान के विभिन्न पहलुओं का बारीकी से अध्ययन करने के बाद, हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान में ऐसा कोई प्रतिबंध या रुकावट नहीं है जो किसी राज्य सरकार को अपने वर्तमान या पूर्व सदस्यों के कल्याण के लिए कानून बनाने से रोकती हो।
नीतियों पर वैचारिक मतभेद के मुद्दे पर कोर्ट ने जोर देकर कहा कि न्यायपालिका सिर्फ इसलिए किसी कानून को निरस्त नहीं कर सकती क्योंकि वह उस नीति के पीछे के विचारों से सहमत नहीं है। अदालत ने टिप्पणी की:
“संवैधानिक ढांचा राज्य विधानमंडल को विधानसभा (MLA) और विधान परिषद (MLC) के सदस्यों (पूर्व सदस्यों सहित) के पक्ष में पेंशन, भत्तों या अन्य संबद्ध लाभों से जुड़े प्रावधान बनाने से नहीं रोकता है।”
संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार और मनमानेपन के खिलाफ अधिकार) के तहत उठाई गई आपत्तियों को खारिज करते हुए खंडपीठ ने कहा कि मिलने वाले लाभों के स्वरूप या मात्रा में कोई ऐसी विसंगति नहीं है जिससे असंवैधानिकता का कोई मामला बने। पीठ ने रेखांकित किया:
“अपने वर्तमान और पूर्व सदस्यों के लिए सामाजिक सुरक्षा के उपाय लागू करने हेतु कानून बनाने पर राज्य विधानमंडल के ऊपर कोई संवैधानिक रोक (Embargo) नहीं है। इन सुविधाओं का स्वरूप और दायरा किसी भी तरह से ऐसा मनमानापन प्रदर्शित नहीं करता, जिससे संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होता हो।”
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल (सदस्यों के उपलब्धियां, भत्ते और पेंशन) अधिनियम, 1980 के तहत बनाए गए नियम पूरी तरह से राज्य के विधायी अधिकार क्षेत्र के भीतर आते हैं। चूंकि याचिकाकर्ता कानून में किसी भी प्रकार के संवैधानिक उल्लंघन को साबित करने में असमर्थ रहे, इसलिए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने जनहित याचिका को पूरी तरह खारिज करते हुए पूर्व विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को मिलने वाली पेंशन व अन्य सुविधाओं को वैध बनाए रखा।

