मकान मालिक को यह नहीं बता सकता किरायेदार कि वह किस संपत्ति का उपयोग करे; ‘बोनाफाइड नीड’ साबित करने के लिए मौखिक पारिवारिक व्यवस्था पर भरोसा किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के एक फैसले को पलटते हुए 2007 के बेदखली (eviction) आदेश को बहाल कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किरायेदार को यह तय करने का कोई अधिकार नहीं है कि मकान मालिक को अपनी कौन सी संपत्ति इस्तेमाल करनी चाहिए। इसके साथ ही, अदालत ने कहा कि मकान की वास्तविक जरूरत (bona fide need) साबित करने के लिए परिवार के बीच हुई मौखिक व्यवस्था को एक वैध आधार माना जा सकता है।

जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने मैरिएटा डी’सिल्वा द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए कहा कि वह ‘बॉम्बे रेंट्स, होटल एंड लॉजिंग हाउस रेट्स कंट्रोल एक्ट, 1947’ के तहत सह-मकान मालिक (co-landlord) के रूप में अपनी स्थिति और परिसर की वास्तविक आवश्यकता को साबित करने में सफल रही हैं।

कानूनी मुद्दा

इस मामले में मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या बिना लिखित रिकॉर्ड वाली मौखिक पारिवारिक व्यवस्था कानूनी रूप से मान्य है? इसके अलावा, क्या जमीन के शेयर सर्टिफिकेट रखने वाला सह-मालिक ‘मकान मालिक’ की श्रेणी में आता है? कोर्ट ने माना कि अगर दोनों पक्ष मामले के तथ्यों से अवगत हैं और उन्होंने सबूत पेश किए हैं, तो तकनीकी कमियों के आधार पर बेदखली के मामले को खारिज नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मुंबई के चेंबूर स्थित ‘मेमोरेयर बिल्डिंग’ से जुड़ा है, जिसे अपीलकर्ता के माता-पिता ने बनाया था। 1962 में इस बिल्डिंग के फ्लैट नंबर 2 को अगस्टिन लासेर्डा को किराये पर दिया गया था। मूल किरायेदारों और अपीलकर्ता के पिता की मृत्यु के बाद, इस संपत्ति का स्वामित्व अपीलकर्ता और उसके भाई-बहनों के पास आ गया।

1993 में, अपीलकर्ता ने ‘बोनाफाइड नीड’ और किरायेदारों द्वारा अन्य वैकल्पिक आवास प्राप्त कर लेने के आधार पर बेदखली का मुकदमा दायर किया। स्मॉल कॉज कोर्ट और उसकी अपील बेंच ने मकान मालिक के पक्ष में फैसला सुनाया था, लेकिन जून 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने इन फैसलों को रद्द कर दिया था और किरायेदार को कब्जा वापस दिलाने का निर्देश दिया था।

READ ALSO  दिल्ली हाई कोर्ट ने PWD से DPS मथुरा रोड के पास यू-टर्न लेन खोलने पर निर्णय लेने को कहा

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि वह बिल्डिंग के पांच शेयर सर्टिफिकेट्स में नाम दर्ज होने के कारण सह-मकान मालिक है। उन्होंने बताया कि एक मौखिक पारिवारिक व्यवस्था के तहत, फ्लैट नंबर 5 और 6 उनके भाइयों के लिए तय किए गए थे, जबकि फ्लैट नंबर 2 (विवादित परिसर) उनके स्वयं के उपयोग के लिए रखा गया था।

दूसरी ओर, किरायेदारों (प्रतिवादियों) ने उनकी ‘लोकस स्टैंडी’ (मुकदमा करने का अधिकार) को चुनौती दी। उनका तर्क था कि याचिका में पारिवारिक व्यवस्था या शेयर सर्टिफिकेट का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि अपीलकर्ता अपनी मां के साथ दूसरे फ्लैट में रह रही थी, इसलिए उसे इस फ्लैट की कोई वास्तविक आवश्यकता नहीं है।

READ ALSO  उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कॉर्बेट पार्क निदेशक से नए जिप्सी ऑपरेटरों को बाहर रखने पर स्पष्टीकरण मांगा

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने ‘महत्वपूर्ण तथ्यों’ (facta probanda) और उन्हें साबित करने के लिए ‘साक्ष्यों’ (facta probantia) के बीच के अंतर को स्पष्ट किया।

मकान मालिक की स्वायत्तता और आवश्यकता पर: अदालत ने किरायेदार के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें सुझाव दिया गया था कि मकान मालिक को अन्य उपलब्ध फ्लैटों का उपयोग करना चाहिए।

“यह स्थापित कानून है कि किरायेदार मकान मालिक को यह निर्देश नहीं दे सकता कि उसके लिए कौन सा परिसर उपयुक्त है, और न ही वह इस बात पर जोर दे सकता है कि मकान मालिक किसी अन्य संपत्ति का उपयोग करे।”

पीठ ने कहा कि मुकदमे के दौरान अपीलकर्ता का अस्थायी रूप से अन्य फ्लैटों में रहना उसकी वास्तविक आवश्यकता को खत्म नहीं करता है। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि यदि याचिका में कुछ तकनीकी कमियां थीं भी, तो भी पक्षों को मामले की पूरी जानकारी थी और उन्होंने सबूत पेश किए थे।

मौखिक पारिवारिक व्यवस्था पर: कोर्ट ने भाई-बहनों के बीच हुए मौखिक समझौते को सही ठहराया।

“पारिवारिक व्यवस्थाओं या समझौतों को लागू करने में तकनीकी विचारों को शांति और सद्भाव के लिए छोड़ देना चाहिए… अपीलकर्ता विभाजन की डिक्री न होने के बावजूद भी मौखिक पारिवारिक व्यवस्था पर भरोसा करने की हकदार है।”

मकान मालिक की परिभाषा पर: अदालत ने अधिनियम की धारा 5(3) का हवाला देते हुए कहा कि जो कोई भी किराया प्राप्त करने का हकदार है, वह मकान मालिक है। चूंकि अपीलकर्ता के पास जमीन के शेयर सर्टिफिकेट थे, और ‘ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट’ की धारा 8 के तहत जमीन से जुड़ी इमारत भी उसमें शामिल है, इसलिए वह स्पष्ट रूप से मकान मालिक की श्रेणी में आती है।

तुलनात्मक कठिनाई (Comparative Hardship) पर: पीठ ने पाया कि मूल किरायेदारों ने मुंबई में कई वैकल्पिक आवास हासिल कर लिए थे, जबकि अपीलकर्ता के पास शहर में कोई दूसरा घर नहीं था। कोर्ट ने टिप्पणी की कि एक प्रतिवादी द्वारा मुकदमे के दौरान अपना दूसरा फ्लैट बेचना केवल बेदखली की डिक्री से बचने की कोशिश थी।

READ ALSO  दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल की वकीलों से मुलाकात बढ़ाने की याचिका अस्वीकृत, सप्ताह में दो बार तक सीमित

फैसला

2007 के बेदखली आदेश को बहाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यदि बेदखली से इनकार किया गया, तो मकान मालिक को अधिक कठिनाई होगी। कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और स्मॉल कॉज कोर्ट के आदेश को प्रभावी कर दिया।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: मैरिएटा डी’सिल्वा बनाम रुडोल्फ क्लॉथन लासेर्डा और अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील (SLP(C) No. 31012 of 2025 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा
  • दिनांक: 15 मई, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles