एक ऐतिहासिक घटनाक्रम में, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धार के विवादित भोजशाला-कमल मौला मस्जिद परिसर को लेकर बड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि पुरातात्विक और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर इस परिसर का वास्तविक स्वरूप ‘वाग्देवी माता सरस्वती’ का मंदिर है। यह निष्कर्ष राजा भोज के काल के ऐतिहासिक साहित्यों और वास्तुकला के गहन विश्लेषण पर आधारित है।
राजा भोज और संस्कृत शिक्षा का केंद्र
हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने अपने आदेश में दर्ज किया कि धार स्थित यह स्मारक परमार वंश के राजा भोज के गौरवशाली इतिहास से जुड़ा है। ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह प्रमाणित होता है कि 11वीं सदी में यह परिसर न केवल एक भव्य मंदिर था, बल्कि संस्कृत शिक्षा का विश्वविख्यात केंद्र भी था। कोर्ट की इस टिप्पणी ने हिंदू पक्ष के उन दावों को नई कानूनी मजबूती दी है, जो दशकों से इसे ‘भोजशाला’ के रूप में पहचान दिलाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
दशकों पुरानी कानूनी जंग और तीन पक्ष
एएसआई (ASI) द्वारा संरक्षित यह स्थल सालों से कानूनी और धार्मिक खींचतान का केंद्र रहा है। मुख्य विवाद ‘भोजशाला’ और ‘कमल मौला मस्जिद’ की पहचान को लेकर है। हालांकि, इस मामले में एक तीसरा पहलू जैन समुदाय का भी है, जिनका दावा है कि यह स्थल मूल रूप से एक मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल था।
2003 की व्यवस्था पर उठते सवाल
वर्तमान में यह परिसर 7 अप्रैल, 2003 को एएसआई द्वारा लागू की गई एक विशेष व्यवस्था के तहत संचालित होता है:
- मंगलवार: हिंदुओं को पूजा का अधिकार।
- शुक्रवार: मुस्लिमों को नमाज की अनुमति।
- अन्य दिन: पर्यटकों के लिए प्रवेश।
हिंदू पक्ष ने इसी व्यवस्था को चुनौती देते हुए कोर्ट से पूजा के विशेष और पूर्ण अधिकार की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जब स्थल का मूल स्वरूप मंदिर है, तो साझा व्यवस्था को खत्म कर उसे उसका वास्तविक अधिकार मिलना चाहिए।

