पीस-रेट पर काम करने वाला भी ‘मज़दूर’ है: दिल्ली हाईकोर्ट का अहम फैसला, दर्जी को 1.25 लाख का मुआवज़ा

दिल्ली हाईकोर्ट ने श्रम अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि उत्पादन के आधार पर (पीस-रेट) भुगतान प्राप्त करने वाला व्यक्ति भी श्रम कानूनों के तहत “कर्मचारी” (Workman) माना जाएगा। यह फैसला 1999 से लंबित एक दर्जी की गैर-कानूनी छंटनी के मामले में आया है।

अदालत ने निचली अदालत के इस निष्कर्ष को सही ठहराया कि दर्जी की छंटनी गैर-कानूनी थी, लेकिन मामले को दो दशक से अधिक समय से खिंचते देख और दर्जी की उम्र को ध्यान में रखते हुए, नौकरी पर वापस रखने (reinstatement) के पुराने आदेश को बदल दिया। जस्टिस शैल जैन ने नियोक्ता ‘संजय गारमेंट्स’ को निर्देश दिया है कि वह दर्जी को 1.25 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवज़ा दे।

क्या था पूरा मामला?

यह विवाद 1999 का है। राकेश कुमार नाम के एक दर्जी ने आरोप लगाया था कि अगस्त 1999 में संजय गारमेंट्स प्रबंधन ने बिना किसी नोटिस, चार्जशीट या जांच के उसे नौकरी से निकाल दिया। यहां तक कि उसे जुलाई 1999 का वेतन भी नहीं दिया गया। दर्जी की ओर से ऑल इंडिया इंजीनियरिंग एंड जनरल मजदूर यूनियन ने 5 अगस्त 1999 को सहायक श्रम आयुक्त के पास शिकायत दर्ज कराई थी।

दर्जी का दावा था कि वह 1988 से काम कर रहा था। पहले वह मेसर्स दयाल संस सिलेक्शन के साथ जुड़ा था और फिर संजय गारमेंट्स के साथ, और दोनों एक ही जगह से काम करते थे। उसका कहना था कि वह प्रबंधन के अधीन एक स्थायी कर्मचारी था।

दूसरी ओर, श्री संजय कुमार के स्वामित्व वाली ‘संजय गारमेंट्स’ ने इन दावों को खारिज कर दिया। कंपनी का कहना था कि दर्जी सिर्फ जुलाई 1998 से अगस्त 1999 तक उनके साथ था, वह भी पीस-रेट (जितने कपड़े सिले, उतना पैसा) के आधार पर। कंपनी ने यह भी कहा कि दयाल संस से उनका कोई लेना-देना नहीं है और दर्जी खुद ही बेहतर नौकरी मिलने पर 2000 रुपये का अंतिम निपटान (full and final settlement) लेकर काम छोड़ कर चला गया था।

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जुलाई 2010 में लेबर कोर्ट ने दर्जी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उसकी छंटनी को गैर-कानूनी माना था और 80% बकाया वेतन के साथ नौकरी पर वापस रखने का आदेश दिया था। इस फैसले के खिलाफ संजय गारमेंट्स 2013 में दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गई।

पीस-रेट बनाम नियंत्रण: अदालत ने क्या कहा?

हाईकोर्ट में संजय गारमेंट्स के वकील परितोष बुद्धिराजा ने दलील दी कि दर्जी नियमित कर्मचारी नहीं था, बल्कि उसे केवल पीस-रेट पर रखा गया था और उसने खुद ही नौकरी छोड़ी थी। वहीं दर्जी के वकील कृष्ण देव पांडे ने तर्क दिया कि पीस-रेट का मतलब यह नहीं है कि नियोक्ता-कर्मचारी (employer-employee) का रिश्ता खत्म हो जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि वैधानिक फायदों की मांग करने पर दर्जी को निकाला गया था।

मामले की सुनवाई के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि केवल पीस-रेट पर काम करने से किसी को श्रम कानूनों की सुरक्षा से बाहर नहीं किया जा सकता। अदालत ने नियोक्ता और कर्मचारी के रिश्ते को तय करने के लिए “नियंत्रण और पर्यवेक्षण” (Control and Supervision) का सिद्धांत लागू किया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस बात की जांच की जानी चाहिए कि क्या नियोक्ता का नियंत्रण सिर्फ काम के अंतिम परिणाम पर है, या फिर काम किस तरह से किया जा रहा है, उस पर भी है।

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जस्टिस जैन ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि दर्जी स्वतंत्र रूप से कहीं और सिलाई का काम करने के लिए आज़ाद था, जैसा कि आम तौर पर एक स्वतंत्र ठेकेदार के मामले में होता है। इन बातों से साबित हुआ कि दर्जी जुलाई 1998 से अगस्त 1999 तक संजय गारमेंट्स के नियंत्रण और देखरेख में ही काम कर रहा था।

1.25 लाख का मुआवज़ा

अदालत ने माना कि दर्जी को गलत तरीके से निकाला गया था। लेकिन, 14 मई को दिए अपने आदेश में अदालत ने कहा कि चूंकि मामला 1999 का है और दर्जी अब रिटायरमेंट की उम्र के करीब है, इसलिए उसे वापस नौकरी पर रखना व्यावहारिक नहीं होगा।

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लिहाज़ा, कोर्ट ने 2010 के लेबर कोर्ट के आदेश को संशोधित करते हुए संजय गारमेंट्स को निर्देश दिया कि वह आठ सप्ताह के भीतर दर्जी को 1,25,000 रुपये का एकमुश्त मुआवज़ा दे। अदालत ने कहा कि यह रकम दर्जी के साबित हो चुके सेवाकाल (जुलाई 1998 से अगस्त 1999) और नौकरी छूटने के बाद से बीते इतने लंबे समय को ध्यान में रखकर तय की गई है।

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