सैलरी स्लिप के आधार पर तय होगा मुआवजा, आई-टी रिटर्न कम होने पर भी हाईकोर्ट ने बढ़ाया हर्जाना; परिवार को मिलेंगे ₹1.42 करोड़

मोटर एक्सीडेंट क्लेम के मामलों में आश्रितों के अधिकारों को सुरक्षित करते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए कि इनकम टैक्स (आई-टी) रिटर्न में कर योग्य आय कम दिखाई गई है, सैलरी सर्टिफिकेट और रोजगार के रिकॉर्ड को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि मोटर वाहन अधिनियम (MV Act) और आयकर अधिनियम (Income Tax Act) के उद्देश्य अलग-अलग हैं। कोर्ट के अनुसार, मुआवजे का मुख्य उद्देश्य परिवार को हुए “वास्तविक आर्थिक नुकसान” की भरपाई करना है। इसी आधार पर, जस्टिस बिनोद कुमार द्विवेदी ने 2006 में एक सड़क हादसे में जान गंवाने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर के परिवार को मिलने वाले मुआवजे को ₹34.2 लाख से बढ़ाकर ₹1.42 करोड़ से अधिक कर दिया है।

यह मामला जीई इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (GE India Private Limited) में कार्यरत सॉफ्टवेयर इंजीनियर रूपेश कपूर की मृत्यु से जुड़ा है। 8 सितंबर, 2006 को रूपेश एक टोयोटा टैक्सी से बेंगलुरु से हुगली जा रहे थे, तभी लापरवाही से चलाए जा रहे एक ट्रक ने उनकी गाड़ी को टक्कर मार दी। इस दुर्घटना में रूपेश सहित तीन लोगों की जान चली गई थी।

रूपेश की पत्नी भावना कपूर, उनकी बेटी और माता-पिता ने इंदौर के मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) में मुआवजे के लिए गुहार लगाई थी। अक्टूबर 2008 में ट्रिब्यूनल ने ₹34.20 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने सबूतों के बावजूद रूपेश की वार्षिक आय केवल ₹3 लाख आंकी थी। इस फैसले से असंतुष्ट होकर परिवार ने मुआवजे की राशि बढ़ाने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया।

याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल ने केवल ₹5.86 लाख के आई-टी रिटर्न पर भरोसा करके गलती की है। उन्होंने सैलरी स्लिप और फॉर्म-16 पेश करते हुए बताया कि मृत्यु के समय रूपेश का मासिक वेतन ₹73,312 (लगभग ₹8.3 लाख सालाना) था। दलील दी गई कि वेतनभोगी कर्मचारियों को मिलने वाले कई भत्ते टैक्स के दायरे से बाहर होते हैं, लेकिन वे परिवार के भरण-पोषण के लिए वास्तविक आय का हिस्सा होते हैं।

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वहीं, बीमा कंपनी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि वेतन संबंधी दस्तावेज विरोधाभासी थे। कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि चूंकि मुकदमे के दौरान रूपेश के एक अभिभावक का निधन हो गया, इसलिए व्यक्तिगत खर्चों के लिए कटौती बढ़ाई जानी चाहिए और कुल मुआवजे में कमी की जानी चाहिए।

हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी की आपत्तियों को खारिज कर दिया और “कर योग्य आय” (Taxable Income) व “वास्तविक आय” (Actual Income) के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। जस्टिस द्विवेदी ने कहा:

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“मोटर वाहन अधिनियम का उद्देश्य आर्थिक लाभ के नुकसान की भरपाई करना है, जो आयकर अधिनियम के उद्देश्य से भिन्न है। आयकर अधिनियम के तहत गणना की गई आय उस राशि से अलग हो सकती है जो एक कर्मचारी वास्तव में प्राप्त करता है। इसलिए, मुआवजे के निर्धारण के लिए केवल इनकम टैक्स रिटर्न को ही एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।”

कोर्ट ने आगे कहा कि वेतन में एचआरए (HRA), मेडिकल अलाउंस और पीएफ योगदान जैसे कई घटक शामिल होते हैं। 2006 के आयकर विभाग के एक परिपत्र का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने समझाया कि भले ही कुछ भत्ते टैक्स से मुक्त हों, इसका मतलब यह नहीं है कि वह कर्मचारी की आय का हिस्सा नहीं हैं।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम इंदिरा श्रीवास्तव’ और ‘सुनील शर्मा बनाम विचित्र सिंह’ जैसे फैसलों पर भरोसा करते हुए कहा कि मुआवजा तय करते समय सभी वैधानिक कटौती और आवश्यक भत्तों को आय में शामिल किया जाना चाहिए।

इसके अलावा, कोर्ट ने आश्रित की मृत्यु के आधार पर मुआवजा घटाने की बीमा कंपनी की मांग को भी ठुकरा दिया। ‘कीर्ति बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड’ मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि मुआवजे का अधिकार दुर्घटना की तारीख पर ही तय हो जाता है और बाद की घटनाओं से इसे बदला नहीं जा सकता।

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हाईकोर्ट ने पाया कि रूपेश कपूर (32 वर्ष) की नौकरी स्थायी प्रकृति की थी और उनके वेतन में लगातार वृद्धि हो रही थी। कोर्ट ने उनकी शुद्ध मासिक आय ₹65,045 निर्धारित की। भविष्य की संभावनाओं (Future Prospects) के लिए 50% राशि जोड़ने और उचित मल्टीप्लायर लगाने के बाद कुल मुआवजा ₹1,42,39,720 तय किया गया।

हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह ट्रिब्यूनल द्वारा पहले दी गई राशि के अतिरिक्त ₹1,08,19,720 का भुगतान 6% ब्याज के साथ करे। यह फैसला पीड़ित परिवार के लिए एक बड़ी राहत के रूप में आया है, जिससे उनके मुआवजे में लगभग चार गुना की बढ़ोतरी हुई है।

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